सुनो! शाश्वत-हिम गिरि, मैं जरूर आऊँगा..
मैंने नहीं देखा है हिमालय । मैं उस दृश्य का साक्षी नहीं बना हूँ, जब दिन में हिमशिखरों से बादल हटते हैं और दिखता है सूर्य-रश्मियों से सज्जित स्वर्ण-शिखर । मैंने तो कसौनी भी नहीं देखा, और न ही रानीखेत । मैंने स्याह सड़कों पर जमी बर्फ ‛ ब्लैक-आइस’ नहीं देखी । मैंने देखा है तो अपने गाँव में ऊँचा पहाड़ और जब भी उसे बादल से घिरते देखता हूँ, तो अनायास ही कल्पना करता हूँ कि, अब बादल हटेंगे और दिखेगा पहाड़ का मुकुट हिममयी । तब, मैं कहता हूँ हिमालय से, सुनो! शाश्वत-हिम गिरि, मैं जरूर आऊँगा, मैं आऊँगा अपने लिए तुम्हें देखने । तब क्या तुम मुझे दिखाओगे अपनी सौंदर्यता? अपनी मोहकता?, क्या दोगे तुम मुझे शून्यता? क्या दे सकोगे मुझे वह परम रहस्य, जो नचिकेता ने जानना चाहा था, मृत्यु के देवता से ? हे मेरे मीत हिमालय! मैं अभी मैदान की सपाटता के सौंदर्य को जी रहा हूँ, मैं अभी गवाह बन रहा हूँ गङ्गा और यमुना के मिलन का । मैं पूर्णिमा में चन्द्र की श्वेत-किरणों को गङ्गा के कछार में पड़ते ही, रेत से प्रकीर्णित आभा के दृश्य का सौंदर्य चख रहा हूँ । ...