इस डायरी में, कुछ स्मृतियाँ संजोकर रखना चाहता हूँ अंशु के लिए, ताकि जब वो बड़ा हो और उसे स्वयं को जानने की अभीप्सा हो तो अपने अतीत की ओर मुड़ सके और अतीत को शब्दों में जीते हुए अपने वर्तमान को सुनिश्चित कर सके । स्वयं को पहचान कर अपना मार्ग प्रशस्त कर सके ।
09 मार्च 2024, शनिवार | 4:30 AM | पुरानी वरदान हॉस्पिटल
मैं अपने बेटे अंशु को लेके आज वरदान हॉस्पिटल में हूं । दो दिन ही जन्म लिये हुआ है और पीलिया हो गई है अंशु को ।
डॉ शब्द सिंह यादव जी ने बताया कि यह सामान्य है बच्चों में पीलिया हो जाना । अंशु को मां का दूध भी नहीं निकल रहा था और जो बच्चों के डॉ आए थे 07 मार्च को अंशु के पैदा होने पर देखने, उन्होंने कोई अल्टरनेट पाउडर भी पिलाने को नहीं लिखा । सो कमजोरी भी लग रही थी उसे, इसीलिए और शिकस्त हो गया है अंशु।
अंशु को नर्सरी में फोटोथेरेपी में रखे हैं ।
मैं जहाॅं हूॅं वहाॅं एक परिवार में अभी-अभी बालक का जन्म हुआ है ।
सब खुश हैं, बच्चे का चाचा जो कि अभी लगभग 20 वर्ष का होगा, उसका नाम किसन है । वो अभी अपनी माॅं को बता रहा था की लल्ला हुआ!
कितने उमंग से बता रहा था!
वो बहुत प्रसन्न है ।
मैंने कहा - चाचा बन गए, बधाई हो! कहने लगा, सबको मिठाई खिलाऊॅंगा, आपको तो ढूॅंढ़ कर खिलाऊॅंगा!
मैं मुस्कुरा दिया ।
मेरे मन में यह बात उठी कि शायद यही आत्मीयता भारतीय जनजीवन की सबसे बड़ी पूँजी है।"
दिनाँक : 27 नवंबर,2024
अंशू ननिहाल में हैं । आज अंशु से वीडियो कॉल में बात हुई तो मुझे देख कर रोने लगा। । मेरे पास आना चाह रहा था, क्योंकि इधर उसका विशेष स्नेह हो गया है मुझसे । इसका कारण यह है की उसे मैं गोद में लेके घुमाता हूं । उसे घूमना, तरह तरह की चीजें देखना पसंद है । मेरे साथ वह थोड़ी शरारत भी कर सकता था जैसे फ्रिज कवर को खींचना, जाली से प्लेट, कटोरी अपने से लेले लेना आदि..
उस दिन जब मैं किचेन में प्यूरी बना रहा था उसके लिए तब, पहली बार अंशू क्रॉलिंग करते हुए रूम से किचेन तक का सफर स्वयं तय किया ! यह दिन था 20 नवंबर 2024 दिन के लगभग 11 बजे ।
यह दिन ऐतिहासिक था उसके लिए । अभी तक एक दो कदम ही क्रोलिंग करता था । अब वह दोनो कमरों और किचन में तो पहुंचता ही रहता है ।
फर्श की टाइल्स काफी ठंडी रहती है इसलिए हमें उसे दस्ताने पहनाने पड़ते हैं जो उसे अच्छे नहीं लगते, मुझे भी अच्छा नहीं लगता उसका ‘अच्छा न लगना’ ।
तुम्हारे स्वास्थ्य के लिए यह आवश्यक है इसलिए तुम्हे पहनना ही होगा मेरे आत्मज ।
अंशू शायद समझ गया है कि इसे पहनना ही होगा ।
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दिनाँक 09/12/2024
अंशू के लिए आज वॉकर लाया । अंशू देखकर बहुत खुश हुआ ।
मैं वॉकर के पहिए साज रहा था और अंशू उन्हें निगरानी करते हुए घुमा-घुमा कर देख रहा था । और सजने के बाद तो सवारी का लुत्फ खूब उठाया अंशू ने ।
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दिनाँक 12/12/2024
अंशू अब वॉकर को अपने पैर से चलाने लगा है । दोनो कमरे, किचन और बालकनी वॉकर के पहिए की गड़गड़ाहट से गुलजार रहती है । उसे चलाना अच्छा लगने लगा है, उस समय उसकी मुस्कुराहट देखते बनती है ।
अब मुझे भी थोड़ा आराम मिलने लगा है । क्योंकि गोद में लिए रहने का टाइम कम हो गया है । दोपहर मे अंशू के जगने के बाद छत ले जाता हूं जिससे दो कार्य सिद्ध होते हैं - पहला तो यह की धूप लगने लगती है और दूसरा अंशू क्रालिंग कर लेते हैं छत में ।
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दिनाँक 1 मार्च,2025
प्रिय आत्मज के लिए -
अंशू आज अपने ननिहाल चला गया मौसी की सगाई में ।
सुबह उठा तो ठीक था किंतु जब मुझे न देखा और घर भी बदला सा लगा तो रोने लगा ।
सुनीता बताई कि किसी तरह रोना बंद किया । फिर वीडियो कॉल में जैसे ही मुझे देखा फिर बहुत रोने लगा ।
परसों सुबह जाऊंगा तो निस्संदेह बहुत खुश होगा!
और मैं यहाँ चाय पीते हुए अपने छज्जे में बैठे कबूतरों और गौरैया के कृत्यों को देख कर कहने लगा -
ओ कबूतरों!
तुम्हारा दृष्टा चला गया ननिहाल।
जो देखता था
तुम्हारी क्रियाओं को कौतूहल से
आश्चर्य करता और खिलखिलाता
तुम्हारी उड़ान से ।
ओ गौरैया!
तुम्हारी फुर्र सी उड़ान गुदगुदाती थी उसे
तुम्हारे तिनका उठाने से सीखता है जो कर्म ।
वह फिर आएगा
तुम्हारी अठखेलियों पर खिलखिलाने
तुम्हारे साथ जीवन का उत्सव मनाने ।
विनय शंकर तिवारी
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दिनाँक 19 जुलाई 2025,शनिवार
समयभाव के कारण बहुत दिनों से लिख नहीं पाया । अंशु अब दीवाल पकड़ कर या तीन पहिए वाली गाड़ी (जो इनके नाना ने भेजवाया है ) को पकड़ कर चलने लगे हैं । क्रोलिंग तो रफ़्तार से करते हैं ।
अब अंशू के प्राइवेट लैंग्वेज की शुरुआत भी हो चुकी है ।
अब आपके मन में प्रश्न उठेगा कि प्राइवेट लैंग्वेज क्या है ? तो बच्चों की प्राइवेट लैंग्वेज (Private Language) का अर्थ होता है वह भाषा या संकेत प्रणाली जो बच्चे खुद अपने लिए विकसित करते हैं, और जिसे केवल वही समझते हैं — अन्य लोग नहीं।
विकासात्मक मनोविज्ञान (Developmental Psychology) मानता है कि बच्चे जब बहुत छोटे होते हैं, तो वे बोलने से पहले या बोलना सीखते समय कुछ विशेष ध्वनियाँ, इशारे या शब्दों का प्रयोग करते हैं जो दूसरों को समझ में नहीं आता। यह उनकी प्रारंभिक संप्रेषण प्रणाली होती है।
फिर धीरे-धीरे अपने परिवेश की भाषा सीखने लगते हैं और फिर आहिस्ता-आहिस्ता अपनी प्राइवेट लैंग्वेज की अलविदा कर देते हैं ।
अंशू के लिए एक बिजी क्यूब और ज्योमेट्रिकल शेप मैचिंग ऑर्डर किया हूँ ताकि इनकी मोटर स्किल एवं Eye & Hand कॉन्टैक्ट अच्छा हो सके ।
दो तीन दिन पहले पापा मम्मी आए थे तो अंशु धीरे - धीरे पहचानने लगे थे दो तीन दिन ही रुके वो लोग । आखिरी दिन अंशू पापा की यानि अपने बब्बा की गोद में गए ।
ऐसे ही जब मम्मी ( अंशू की नानी) आई थीं एक डेढ़ महीना पहले तो अंशू बहुत रम गए थे नानी से । नानी अंशू को घुमा- घुमा के खिलाती थीं, साथ में घूमती थीं । फिर चली गईं । उन्हें अंशुल एक दो दिन मिस किए फिर पुनश्च पहले जैसे हो गए।
उनके आने के बाद अंशू थोड़ा मोटे हो गए थे पर अभी जुकाम सर्दी में दो तीन दिन एक एक चम्मच खाए तो स्वास्थ्य थोड़ा डाउन हो गया है । फिलहाल अब स्वस्थ हैं अंशु ।
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02 मई 2026
रात्रि की यह यात्रा आज साधारण यात्रा न रहकर मानो एक जीवंत साहित्यिक अनुभूति में परिणत हो गया है। बस की पारदर्शी खिड़की से बाहर दृष्टि जाती है तो आकाश अपने विराट, धवल, जलमय स्वरूप में किसी दिव्य गंगा-प्रवाह सा प्रतीत होता है—और उस अनंत आकाश-गंगा में चंद्रमा एक उज्ज्वल, सौम्य तीर्थयात्री की भाँति स्नानरत दिखाई देता है। पर यह स्नान स्थिर नहीं; उसमें बालसुलभ चंचलता है, सलोनी अठखेलियाँ हैं, एक स्वच्छंद क्रीड़ा है। कभी वह बादलों की धुंधली ओट में स्वयं को छिपा लेता है, मानो लज्जा से घिर गया हो; फिर अगले ही क्षण उन्हीं मेघखंडों को अपने कंठ का हार बनाकर पुनः प्रकट होता है। कभी दो समानांतर बादलों की पट्टियों के मध्य से ऐसे निकलता है, जैसे किसी दिव्य घाट की संगमरमरी सीढ़ियों के बीच उतरता-चढ़ता कोई देवबालक हो।
मेरी उस स्थिति की प्रतीकात्मक तस्वीर
आकाश के इस विराट घाट पर आज अन्य कोई उपस्थिति नहीं—न कोई तारा, न कोई विघ्न, न कोई और आलोक। समूचा पूर्व दिशा का विस्तार केवल चंद्र के लिए आरक्षित जान पड़ता है। यह सचमुच एक ‘चन्द्रघाट’ है—जहाँ केवल वही है, और हैं उसकी स्निग्ध, कोमल, शीतल किरणें, जो पृथ्वी पर दया, माधुर्य और शांति का नीरव अभिषेक कर रही हैं।
ऐसे क्षण में वेगड़ जी की वह अद्भुत कल्पना स्मृति में कौंधती है कि चंद्रमा के पास कोई ऐसा जामन है, जिसमें सूर्य की तीक्ष्ण, प्रखर, उष्ण किरणें डुबकी लगाकर अपनी दाहकता विसर्जित कर देती हैं। वे वहीं अपनी कठोरता त्यागती हैं, और फिर चंद्र-किरण बनकर शीतल, सौम्य और करुणामयी होकर पृथ्वी पर उतरती हैं। सचमुच, आज इस दृश्य को देखकर लगता है कि प्रकाश का भी संस्कार होता है—सूर्य का तेज जब चंद्र के संस्पर्श से गुजरता है, तो वह तपन से माधुर्य में रूपांतरित हो जाता है।
बस अपनी गति से मार्ग को चीरती चली जा रही है, किन्तु भीतर समय जैसे ठहर गया है। बाहर का दृश्य मन में ऐसी तरलता भर रहा है कि यह यात्रा केवल स्थानांतरण नहीं रह जाती—यह भावों की यात्रा बन जाती है। मैं जा रहा हूँ अपने बेटे को लेने—अपने जीवन के उस छोटे, सलोने चंद्र को घर वापस लाने। बाह्य आकाश में विहार करता यह पूर्ण, धवल चंद्र और मेरे अंतर्मन में बसा मेरा पुत्र—दोनों आज एक-दूसरे के प्रतीक से प्रतीत होते हैं। जैसे प्रकृति ने स्वयं इस रात्रि को इस मिलन के लिए सजाया हो।
बस की खिड़की अब केवल काँच की पारदर्शिता नहीं रही; वह मानो संवेदनाओं की एक खुली चौखट बन गई है, जिसके पार ब्रह्मांड अपनी काव्यात्मकता में मुखर है। इस क्षण में पितृत्व, प्रकृति और काव्य—तीनों एकाकार हो उठे हैं। चंद्र की शीतलता बाहर फैल रही है, और पुत्र-स्मृति की ऊष्मा भीतर। इसी अद्भुत संतुलन में यात्रा का प्रत्येक क्षण एक साहित्यिक डायरी के पृष्ठ पर स्वयं को लिखता चला जा रहा है।
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24 जून 2026
आज का दिन अंशू के जीवन के प्रथम संस्कारों में से एक—उसके मुंडन संस्कार—का पावन अवसर था। घर में कई दिनों से इसकी तैयारी थी और आज वह शुभ घड़ी भी आ गई। हम सब प्रातः ही देवी माँ के दर्शन और अंशू के संस्कार के लिए निकल पड़े। आशा दी, गुड़िया दीदी, भाभी, रिंकू और आयुष, पवन जीजा, प्रमोद, उनकी मम्मी (भाभी) तथा जर्मई वाली भाभी—सभी साथ थे। इतने अपने एक साथ हों तो यात्रा केवल स्थान परिवर्तन नहीं रहती, वह अपनेपन का चलता-फिरता उत्सव बन जाती है।
किन्तु इस उल्लास के बीच कुछ रिक्त स्थान भी थे, जो बार-बार मन को छू जाते थे। पापा और मम्मी इस यात्रा में साथ नहीं आ सके। पापा की ओपन हार्ट सर्जरी के बाद अब भी लंबी यात्राएँ उनके लिए कष्टदायक हो जाती हैं, और मम्मी को यात्रा में उल्टियों की इतनी समस्या होती है कि पहुँचते-पहुँचते ही उनका स्वास्थ्य बिगड़ जाता है। मन बार-बार चाहता था कि वे भी अंशू के इस प्रथम संस्कार के साक्षी बनते, पर जीवन में हर इच्छा तत्काल पूर्ण हो जाए, ऐसा कहाँ होता है?
गुड्डू भइया का न आ पाना भी भीतर कहीं खलता रहा। मन में आशा थी कि यदि संजय भइया की जमानत हो जाती तो वे भी आ जाते, किंतु न्यायालय में सुनवाई ही टल गई। कुछ प्रतीक्षाएँ मनुष्य करता है, कुछ प्रतीक्षाएँ समय स्वयं कराता है। शायद ईश्वर ने अभी उस मिलन का समय सुरक्षित रखा है।
देवी का मंदिर पर्वत-शिखर पर स्थित है। वहाँ तक पहुँचने के लिए लगभग एक सहस्त्र सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। हमारे साथ कुछ ऐसे लोग थे जिनके लिए इतनी लंबी चढ़ाई कठिन होती, इसलिए निश्चय हुआ कि सभी लोग रोप-वे से ही ऊपर जाएँगे।
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मंदिर जाते हुए सुनीता, मैं और अंशु
रोप-वे की लंबी कतार को देखकर लगा कि आज का मनुष्य सुविधा के अधिक निकट और श्रम के कुछ दूर खड़ा हो गया है। शायद यह समय की माँग भी है; जीवन की दौड़ ने उसे विश्राम का अभिलाषी बना दिया है। मैं किसी के चुनाव का निर्णय नहीं करता, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की अपनी परिस्थितियाँ होती हैं। किंतु अपने मन की बात कहूँ तो जब तक शरीर स्वस्थ और समर्थ है, पर्वत की सीढ़ियाँ मुझे प्रार्थना का ही विस्तार लगती हैं। प्रत्येक पग मानो अहंकार को थोड़ा-थोड़ा पीछे छोड़ता हुआ श्रद्धा के और निकट ले जाता है। जिस चित्-शक्ति के मूर्त स्वरूप के दर्शन के लिए हम जा रहे हों, वहाँ तक पहुँचने में यदि तन का थोड़ा श्रम भी लग जाए, तो वह श्रम नहीं, भक्ति का मौन अर्घ्य बन जाता है। वृद्धावस्था आएगी तो उसका भी सम्मान करूँगा, क्योंकि वह काल का विधान है; पर आज जब पैरों में सामर्थ्य है, तब सीढ़ियाँ मुझे रोप-वे से कहीं अधिक आत्मीय प्रतीत होती हैं।
आज मुंडन का बड़ा मुहूर्त था। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो आने वाला प्रत्येक तीसरा व्यक्ति अपने बच्चे का मुंडन कराने ही आया हो। हम प्रातः नौ बजे ही मंदिर की पार्किंग में पहुँच गए थे, किंतु रोप-वे का समय एक से दो बजे का मिला। फिर बीच में दर्शन कुछ समय के लिए बंद हो गए, जिससे और विलंब हुआ। अंततः लगभग चार बजे हमें रोप-वे में बैठने का अवसर मिला और साढ़े चार बजे तक माता के दर्शन सम्पन्न हुए।
मुंडन के कुछ दिन उपरांत गोपाल बाग, गोविंदगढ़ में अंशु
इतनी प्रतीक्षा के कारण अनेक परिवारों ने रोप-वे में जाने से पहले ही अपने बच्चों का मुंडन करवा लिया था। एक क्षण को हमने भी ऐसा करने का विचार किया, किंतु सुनीता ने बड़े सहज भाव से कहा—"हम मुंडन संस्कार के लिए ही आए हैं, इसलिए अंशू पहले अपनी झालर सहित माता के दर्शन करेगा, उसके बाद ही उसके केश उतारे जाएँगे।" उसके इस आग्रह में श्रद्धा की ऐसी सरलता थी कि फिर कोई दूसरा विचार मन में आया ही नहीं। सच ही है, संस्कार केवल कर्मकाण्ड से नहीं, भावना से पूर्ण होते हैं।
दर्शन के पश्चात् अंशू का मुंडन सम्पन्न हुआ। आश्चर्य यह कि उसने तनिक भी रोना नहीं। वह पूरे समय कौतूहल से इधर-उधर देखता रहा। रिंकू ने उसके हाथ में मोबाइल दे दिया और देखते-देखते पूरा संस्कार बड़ी सहजता से संपन्न हो गया।
मुंडन के बाद जब मैंने उसे देखा तो लगा जैसे उसका सौंदर्य और अधिक उज्ज्वल हो उठा हो। उसका निर्मल मस्तक किसी नवोदित चन्द्रमा की शीतल आभा बिखेर रहा था। तभी मन में एक सुंदर कल्पना उभरी—शायद अंशू का जन्म महाशिवरात्रि से एक दिन पूर्व इसलिए हुआ कि वह भगवान शिव के जटाजूट में सुशोभित शशांक की भाँति इस संसार में अपनी निष्कलुष मुस्कान से प्रकाश फैलाए। उस क्षण उसका मुख सचमुच चन्द्र-कला-सा शांत और मोहक लग रहा था।
संस्कार के उपरांत हम सबने साथ बैठकर भोजन किया। पूड़ियाँ गाँव में बनी थीं और सब्ज़ी रीवा में। घर से आया हुआ भोजन केवल स्वाद नहीं देता, वह अपने लोगों का स्नेह भी साथ लेकर आता है। खुले आकाश के नीचे, परिवार के बीच बैठकर किया गया वह साधारण भोजन भी किसी राजभोज से कम नहीं लगा।
संध्या ढलते-ढलते विदा का समय आ गया। लगभग नौ बजे हम रीवा लौट आए। मन की इच्छा थी कि मैं, सुनीता और अंशू गाँव भी चले जाएँ, ताकि पापा-मम्मी का आशीर्वाद अंशू को मिल सके। किंतु छह तारीख को मेरी परीक्षा है। सुनीता ने व्यावहारिक पक्ष सामने रखा—अभी जाने पर दो छुट्टियाँ लेनी पड़ेंगी, और यदि भइया की जमानत हो गई तो गाँव जाना ही होगा।
इसलिए आज की रात एक छोटी-सी प्रार्थना के साथ समाप्त हो रही है। ईश्वर से यही निवेदन है कि पापा शीघ्र पूर्ण स्वस्थ हों, मम्मी प्रसन्न रहें, भइया के जीवन में भी शुभ समाचार आए और परिवार के सभी बिखरे हुए क्षण पुनः एक साथ बैठ सकें। यदि परमात्मा की कृपा से ऐसा हो गया, तो आज का यह संस्कार केवल अंशू के जीवन का ही नहीं, पूरे परिवार के जीवन का भी एक पूर्ण मंगल अध्याय बन जाएगा।
आज का दिन स्मृतियों में चिरस्थायी हो गया। समय के साथ अंशू के सिर पर फिर केश आ जाएँगे, पर आज उसकी निष्कलुष मुस्कान, माता के चरणों में उसका प्रथम संस्कार और परिवार के प्रेम से भरा यह दिन मेरे हृदय की डायरी में सदैव उज्ज्वल बना रहेगा।
- विनय शंकर तिवारी
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03 अगस्त 2026
अंशू और उनका “हॉफ पांडा” 😂
आज अंशू काजल की डिब्बी खोलकर अपनी दायीं आँख से लेकर कान तक पूरा स्याह रंग में रंग चुके थे। 😂
यह करीब 12 बजे दोपहर की बात है।
मैं दाल फ्राई करके चावल चढ़ा रहा था और अंशू बेडरूम में खेल रहे थे। एक बार जाकर देखा तो बड़े आराम से ब्लॉक्स खेल रहे थे। मैं निश्चिंत होकर चावल चढ़ाने चला गया।
लेकिन वापस आया तो माजरा ही बदल चुका था! 😂
अंशू ने पता नहीं कब काजल की डिब्बी ढूँढ़ निकाली और अपनी एक तरफ की शक्ल ऐसी बना ली कि उन्हें देखते ही मेरे मन में पहला ख्याल आया—
“ये हॉफ पांडा कहाँ से आ गया?” 😂🐼
पहले तो उनकी हालत देखकर हँसी आई, फिर सोचा कि इस ऐतिहासिक रूप को कैमरे में कैद कर लेना चाहिए। 😄
फिर कुछ तस्वीरें ली गईं और उसके बाद शुरू हुआ—
अंशू का फेसवॉश कार्यक्रम। 😂
काजल तो साफ हो गया, लेकिन अंशू का वह “हॉफ पांडा” वाला रूप शायद आज की सबसे प्यारी याद बन गया। ❤️
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अगस्त 8, 2026
आज भाभी (प्रमोद की मम्मी) हमारे कमरे में घूमने आई थीं। अंशू उन्हें बहुत अच्छी तरह पहचानते हैं। उन्हें देखते ही अंशू बहुत खुश हो गए और अपने सारे खिलौने उन्हें दिखाने लगे—ABC वाला सेट, अपने बाकी खिलौने और न जाने क्या-क्या।
आज अंशू के चेहरे पर एक अलग ही खुशी थी। उन्होंने बड़ी मम्मी के पैर छुए और उन्हें “बड़ी मम्मी” कहकर बुलाते रहे। जब मैं कमरे में आया तो बड़ी उत्सुकता से मुझे भी बताया—“बड़ी मम्मी आई हैं।”
उन्हें अपने लोगों को पहचानते, उनसे जुड़ते और अपनी छोटी-सी दुनिया उन्हें दिखाते देखकर मन बहुत खुश हुआ। ❤️
कल से अंशू ने एक और नई चीज़ सीख ली है—प्लाई वाली चारपाई से नीचे रखे गद्दे पर अकेले जंप करना।
जंप तो अंशू पहले भी कर लेते थे, लेकिन तब मेरा हाथ पकड़े रहते थे। मैं चाहता था कि धीरे-धीरे वे अपने आप जंप करना सीखें और उनकी physical activity भी बढ़े।
तो मैंने उनसे कहा—“मैं वीडियो बनाता हूँ, तुम जंप करो!”
अंशू ने पहली बार अकेले जंप किया। फिर तुरंत मेरे पास आए और अपना वीडियो देखा। वीडियो देखकर उन्हें इतना मज़ा आया कि फिर क्या था—
“ले जंप… 1, 2, 3… जंप!” 😄
बस फिर अंशू बार-बार जंप करने लगे। अपने किए हुए काम को वीडियो में देखकर उन्हें जो खुशी मिली, वह देखने लायक थी।
बच्चे भी न जाने कितने सरल तरीकों से अपने भीतर का आत्मविश्वास खोज लेते हैं। ❤️
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तीन चार दिन पहले सुबह-सुबह की बात है। अंशू की नींद खुल चुकी थी और वे अपनी मम्मा के साथ लेटे हुए थे। मैं उन्हें लेने के लिए आया। मुझे देखते ही शायद अंशू ने सोचा कि अब तो उठना पड़ेगा।
तभी तपाक से बोले—
“काऊ दुद्धा पियू!” 😂
मतलब, “गाय का दूध पियूँगा।”
अब दूध बनाने के लिए मुझे जाना पड़ेगा, और तब तक अंशू को मम्मा के पास थोड़ी देर और लेटने का समय मिल जाएगा।
चालाकियाँ सीख रहा है, बच्चा! 😀
कभी-कभी उसकी ऐसी छोटी-छोटी तरकीबें देखकर लगता है कि अंशू धीरे-धीरे बड़ा ही नहीं हो रहा, बल्कि अपनी छोटी-सी बुद्धि से हमें भी खूब समझने लगा है।
बचपन की यही छोटी-छोटी बातें तो बाद में सबसे बड़ी यादें बनती हैं। ❤️
- विनय शंकर तिवारी
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09 अगस्त 2026
अंशू और आटे की बारिश 😂
आज अंशू ने थाली से आटा उठाकर फेंकना शुरू कर दिया है। 😂
आटे की बारिश कर रहे हैं अंशू!
पता नहीं आजकल अंशू को क्या-क्या नए प्रयोग सूझ रहे हैं। कभी काजल से हॉफ पांडा बन जाते हैं, तो कभी आटे से पूरा कमरा रंगने की तैयारी! 😂
थाली में रखा आटा अंशू के हाथ लगा और फिर क्या था—उठाया और फेंका… फिर उठाया और फेंका…
बस, अंशू की अपनी ही आटा-वर्षा चल रही थी। 😄
मैं देख रहा था और सोच रहा था कि बच्चे को खेलने के लिए खिलौने चाहिए या घर में रखा सामान ही पर्याप्त है! 😂
अंशू के लिए तो हर चीज़ एक नया खेल है।
और हमारे लिए… हर खेल के बाद एक नया सफाई अभियान! 😂❤️
- विनय शंकर तिवारी
13 अगस्त 2026 | 09:15 PM
आज जब सुनीता रसोई में रोटी बना रही थी। मैं और अंशु पानी पीने के लिए रसोई में गए।
अंशु ने RO का नल चलाया और गिलास में पानी भरकर एक घूँट पिया। तभी उसकी नजर पास रखे मटके पर पड़ी। मटके को देखकर बड़े सहज भाव से बोला—
“मटक है!!” 😂
हम दोनों हँस पड़े। हमें हँसता देखकर अंशु भी हँसने लगा। उसकी वह मासूम-सी हँसी देखकर हमारी हँसी और बढ़ गई।
फिर मैंने उसे बताया—
“मटक नहीं, मटका।”
मैंने पूछा—
“आ... आ से?”
अंशु ने तुरंत कहा—
“आम!” 😂
बस, इतनी-सी बात थी।
लेकिन बचपन शायद ऐसी ही छोटी-छोटी बातों से बनता है—अधूरे शब्द, अपनी बनाई हुई भाषा, और उन शब्दों पर पूरे घर की हँसी।
आज अंशु ने “मटका” को “मटक” कहा और “आ” से “आम” बताया।
शायद कुछ वर्षों बाद उसे यह बात याद भी न रहे।
इसलिए लिख रहा हूँ—ताकि जब वह बड़ा होकर ‘मेरे आत्मज’ पढ़े, तो अपने उस छोटे-से रूप को इन पन्नों में फिर से पा सके।
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15 अगस्त 2026, शनिवार | 06:00 AM | श्री श्याम छाया भवन, रीवा
कल से अंशु को जुकाम हो गया है।
शायद मौसम के बदलने के कारण हुआ हो, या फिर शाम को फ्रिज से निकला नींबू चाटने के कारण। कल शाम से ही लग रहा था कि अंशु को जुकाम होने वाला है। इसलिए रात में उसे हल्दी वाला दूध भी पिलाया था, लेकिन जुकाम ने आखिर अपना असर दिखा ही दिया।
रात करीब 4 बजे अंशु अचानक उठकर रोने लगे। देखा तो हल्का बुखार भी था। उसे बुखार की दवा दी। नाक भी बंद थी, इसलिए नाक में ड्रॉप डाली। वह ड्रॉप नाक तो खोल देती है, लेकिन डालने के बाद काफी देर तक अंदर जलन भी करती है।
फिर उसके माथे पर, नाक के पास, गले पर, छाती पर और हाथ-पैर के तलवों पर विक्स लगाया। उसके बाद अंशु को गोद में लेकर काफी देर तक थपकाते हुए टहलता रहा। काफी देर बाद जाकर अंशु फिर सो पाया और फिर सुबह 9 बजे तक सोता रहा।
सुबह करीब साढ़े चार बजे से बारिश भी शुरू हो गई थी। अंशु तो मेरे पास सो गया, लेकिन मेरी नींद फिर नहीं आई। सुनीता ने अंशु को सुलाने के साथ थोड़ी-बहुत झपकी ले ली थी, क्योंकि सुबह उसे स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम में हॉस्पिटल भी जाना है । लेकिन मेरी आँखों से नींद जैसे दूर ही हो गई थी। देखते-देखते सुबह हो गई।
अंशु को जुकाम-बुखार तो है, लेकिन उसे गोद में लेकर सुला देने के बाद जब वह चैन से सोता है, तो लगता है जैसे रात की सारी थकान उसी क्षण थोड़ी कम हो गई ।
विनय शंकर तिवारी
नागपंचमी | 17 अगस्त 2026 | 10:27 PM
आज नागपंचमी है।
लोग इस दिन नाग देवता के दर्शन को शुभ मानते हैं। नागपंचमी पर सपेरे भी सर्पों को लेकर गली-गली, मोहल्लों-मोहल्लों में घूमते हैं।
आज एक सपेरा हमारी कॉलोनी में भी आया। उसने बीन बजाकर लोगों को इकट्ठा किया। मैं और अंशु भी सर्प को देखने चले गए।
अंशु ने सर्प को देखते ही उसे पहचान लिया और तुरंत बोला—
“स्नेक!”
मैं मुस्कुरा दिया। 😊
हम दोनों काफी देर तक वहाँ खड़े रहे। सपेरे की बीन की आवाज और बीच-बीच में सर्प की फुफकार सुनते रहे। अंशु बड़े ध्यान से उसे देखता रहा।
कुछ देर बाद हम वापस आ गए।
लेकिन लौटते समय मन में एक बात रह गई। सपेरे ने बताया कि उन्होंने सर्प के विषदंत तोड़ दिए हैं। यह सुनकर मुझे उस सर्प के लिए दुख हुआ।
सोचा—उस पर क्या गुजरी होगी?
सपेरे अपनी सुरक्षा के लिए ऐसा करते होंगे, यह बात समझ में आती है। लेकिन उस सर्प की सुरक्षा का क्या?
सपेरे ने बताया कि कल वे इसे जंगल में छोड़ देंगे।
अच्छी बात है कि कम-से-कम उसे जंगल में छोड़ने की बात तो कही।
लेकिन मन में एक प्रश्न फिर भी रह गया—
विषदंतों के बिना उस कोबरा का जीवन कैसा होगा?
आज अंशु ने बस एक साँप देखा और कहा—“स्नेक।”
लेकिन मेरे लिए आज का वह साँप एक और प्रश्न छोड़ गया—
क्या मनुष्य की सुरक्षा के लिए किसी दूसरे जीव की स्वाभाविक शक्ति छीन लेना उचित है?
नागपंचमी के दिन सपेरा और सर्प को देखते अंशु का वीडियो
फ़न फैलाए सर्प और बैठा सपेरा ।
18 अगस्त 2022 | रीवा | 08:54 PM
आज संजय भइया को बेल मिल गई!
उस परम प्रभु, सच्चिदानंद स्वरूप के आशीर्वाद का ही फल है। मन अत्यंत प्रसन्न है, आह्लादित हूँ।
चार वर्षों बाद भइया हमारे साथ होंगे, हमारे बीच होंगे।
अंशू पहली बार अपने बड़े पापा से मिलेगा।
और उससे भी अधिक—भइया पहली बार अंशू को देखेंगे, उसके तीसरे वर्ष में।
पापा भी बहुत प्रसन्न हुए। उनका मन भी आज आनंदित होगा।
मम्मा की तो जैसे आँखें ही तरस रही थीं कि कब आएँ—संजय!
बड़े भइया तो प्रसन्न हैं ही।
उन्होंने ही कोर्ट का पूरा काम संभाला है—वकील से मिलना-जुलना और बाकी आवश्यक कार्य भी।
हम तीनों भी बहुत प्रसन्न हैं।
हालाँकि अंशू को इस बात की पूरी समझ नहीं है।
मैंने उसे बताया कि “बड़े पापा कल आएँगे”, तो वह इस बात से ही प्रसन्न है कि बड़े पापा आ रहे हैं।
अब वह बड़े पापा के रूप में बड़े भइया को सोच रहा है,
या उसे वीडियो कॉल वाले बड़े पापा याद आ गए हैं—
ये तो वही जाने! 😊
लेकिन कल जब सचमुच बड़े पापा उसके सामने होंगे, तब शायद अंशू की आँखों में भी उस रिश्ते की पहचान धीरे-धीरे उतरने लगेगी।
चार वर्षों की दूरी के बाद घर में एक अपना फिर लौट रहा है।
आज मन सचमुच बहुत प्रसन्न है। ❤️
24 अगस्त 2026 | रीवा | 1:05 रात्रि (25 अगस्त)
संजय भइया को देखने हम उनके आने के दूसरे दिन ही गए।
उनके आने के दिन, यानी 19 अगस्त की शाम से ही पूरी रात और अगले दिन दोपहर तक पुरजोर बारिश होती रही। पूरा रीवा शहर तो जलमग्न था ही—हाँ, कहीं कम, कहीं ज्यादा। आसपास के जिले भी इस बारिश में डूब चुके थे। नदियाँ उफान पर थीं, सड़कें डूबी हुई थीं और खेतों में उगी धान तथा अन्य फसलें भी पानी में डूब चुकी थीं।
बारिश लगभग 1 बजे दोपहर में जाकर रुकी।
हम 3 बजे की बस से निकले और लगभग 6:30 बजे शाम तक घर पहुँच गए। बड़े भइया हमें लेने सड़क तक आए थे। हम बस से अतरैला तक ही आए, वहाँ से ऑटो लिया और घर पहुँचे।
अंशु के पहुँचते ही घर जैसे गुलज़ार हो उठा।
इनकी चहल-कदमियों से घर जैसे फिर भर गया।
संजय भइया से भी अंशु ने तुरंत ही पहचान बना ली। बड़े भइया को तो अंशु अपना मानते ही हैं।
एक दिन अंशु सीढ़ी से गिर गए। बहुत साफ बच गए, ज्यादा चोट नहीं लगी।
जैसे ही गिरकर उठे, अपने आप ही बोल पड़े—
“बच गया...”
सब हँसने लगे।
सबको हँसता देखकर अंशु भी हँसने लगे। 😂
बच्चे शायद ऐसे ही होते हैं—अपनी छोटी-सी घटना में भी पूरे घर के लिए हँसी छोड़ जाते हैं।
रविवार की शाम जब वापस आने लगे तो सबका मन भारी था। अंशु की उपस्थिति ने इन कुछ दिनों में सबको जैसे मोह लिया था। जाते-जाते सबके पैर छुए और सबसे विदाई ली। दादी ने 500 रुपये दिए, बड़ी मम्मी ने 100 और बड़े भइया ने 500 रुपये।
जब गाड़ी में बैठने लगे तो घर के लगभग सभी लोग बाहर खड़े थे—विदा करने के लिए।
मन सबका ही भरा हुआ था।
तभी अंशु ने हाथ हिलाते हुए कहा—
“ सबको बाय !” 😂
और सब हँस दिए।
शायद उसे क्या पता था कि जिस क्षण सबकी आँखों में विदाई का भाव था, उसके एक छोटे-से “बाय सबको” ने उस भारी मन में फिर से मुस्कान भर दी।
हम लोग चल दिए—पुनः अपनी कर्मस्थली की ओर।
पीछे रह गया एक भरा-पूरा घर, कुछ दिनों की हँसी, और अंशु की चहल-कदमियों से जीवंत हुई ढेर सारी स्मृतियाँ।
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15 सितंबर 2026 10 :15 AM
कैमा रेलवे स्टेशन
आज अंशु के लिए ट्रेन में एक प्रोजेक्टर कैमरा खरीदा।
दरअसल मैं दिल्ली से वापस आ रहा था। मानिकपुर में ट्रेन में एक खिलौने बेचने वाला आया। उसके पास यह कैमरा देखा तो मुझे अंशु के लिए पसंद आ गया।
बंद लाइट में इस कैमरे से दीवार या फर्श पर जानवरों के चित्र दिखाई देते हैं। इसमें कई तरह की तस्वीरें हैं और बटन दबाने पर एक-एक करके तस्वीरें बदलती रहती हैं।
सोचा, अंशु को अच्छा लगेगा।
अब देखते हैं, जब उसे दूँगा तो उसकी प्रतिक्रिया कैसी रहती है।
कल अंशु प्रमोद के यहाँ गए थे। वहाँ बड़े भइया से भी मुलाकात हुई। फिर अंशु बाइक पर घूमे होंगे, चॉकलेट वगैरह भी खाई ही होगी। बब्बू भइया की लाइसेंस वाली बंदूक लेकर तरह-तरह के पोज में फोटो भी खिंचवाई ।
रात करीब 9 बजे घर वापस आए।
और घर आने की वजह?
पॉटी! 😂
सुनीता बता रही थी कि प्रमोद के यहाँ अंशु ने पॉटी की ही नहीं। जब पॉटी आई तो बोला—
“अपने घर चलो!” 😂
अंशु को शायद अपना घर ही सबसे सुरक्षित और सुविधाजनक जगह लगता है—यहाँ तक कि पॉटी के लिए भी!
अंशू की बंदूक के साथ की तस्वीरें ________________________
28 सितंबर 2026, 11: 55 PM, रीवा
अंशु में अब छोटी-छोटी अलग-अलग चीजों को जोड़कर उनसे कोई नई चीज बना लेने की उनकी समझ धीरे-धीरे विकसित हो रही है।
अब अंशु अपने खिलौने इधर-उधर से उठाते हैं—कभी कोई छोटा खिलौना, कभी एबीसीडी का अक्षर, कभी 1, 2, 3, 5 का अंक—और सबको एक-दूसरे के पीछे लगाते चले जाते हैं।
थोड़ी देर बाद जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो उनकी बनाई हुई चीज ट्रेन होती है।
उनके लिए एबीसीडी का कोई अक्षर, कोई नंबर या कोई खिलौना अब सिर्फ अपने-अपने रूप में नहीं रह गया है। वे उन्हें जोड़कर अपने मन में एक नया रूप बना लेते हैं।
कभी ट्रेन लंबी होती जाती है, कभी उसमें कोई डिब्बा आगे-पीछे हो जाता है, फिर अंशु उसे ठीक करते हैं और अपनी बनाई हुई ट्रेन को बड़े ध्यान से देखते हैं।
मुझे यह सब देखकर लगता है कि उनके खेल में अब केवल खिलौनों से खेलना नहीं है, बल्कि चीजों को जोड़कर कुछ नया बनाने की कल्पना भी आकार लेने लगी है।
और सबसे मजेदार यह कि उनकी इस ट्रेन में यह जरूरी नहीं कि डिब्बे एक जैसे हों—एक डिब्बा खिलौना हो सकता है, दूसरा कोई अक्षर, तीसरा कोई नंबर और चौथा कुछ और। 😊
अंशु की अपनी ट्रेन है, उनके अपने डिब्बे हैं और शायद उनकी अपनी ही दुनिया भी।
अंशु के खेल में इन दिनों एक और सुंदर परिवर्तन दिखाई दे रहा है। अब वे अपने टेडी बियर को केवल खिलौना नहीं मानते, बल्कि उसके साथ ऐसे व्यवहार करते हैं जैसे वह सचमुच कोई जीवित बच्चा हो। उसे खाना खिलाते हैं, दवाई पिलाते हैं, सुसु करवाते हैं और उसकी देखभाल करते हैं।
बाल-मनोविज्ञान की भाषा में इसे मुख्यतः Symbolic Play या Pretend Play (प्रतीकात्मक/काल्पनिक खेल) कहा जाता है। अंशु अपने मन में टेडी को एक जीवित पात्र का रूप दे देते हैं और फिर उसके साथ उसी भूमिका के अनुसार व्यवहार करते हैं।
इसमें Role Play भी दिखाई देता है—टेडी बच्चा है और अंशु उसकी देखभाल करने वाले बन जाते हैं।
इसके साथ इसमें Animistic Thinking (जीवात्मवादी चिंतन) का भी सुंदर उदाहरण दिखाई देता है। Piaget के अनुसार प्रारंभिक बाल्यावस्था में बच्चे निर्जीव वस्तुओं को जीवित प्राणी जैसी विशेषताएँ दे देते हैं। अंशु का टेडी को भूख लगना, दवाई की जरूरत होना या सुसु करना जैसी आवश्यकताओं वाला मानना इसी प्रवृत्ति से जुड़ा हुआ है।
अंशु की उम्र में यह बिल्कुल स्वाभाविक विकास का हिस्सा है। वास्तव में, इस तरह के खेल में उनकी कल्पना, प्रतीकात्मक सोच, सामाजिक भूमिकाओं की समझ और देखभाल की भावना—कई चीजें एक साथ खेल के माध्यम से व्यक्त हो रही हैं।
अंशु की भाषा में भी अब धीरे-धीरे विस्तार आ रहा है। पहले जहाँ छोटे-छोटे शब्दों में अपनी बात कहते थे, अब कुछ बड़े वाक्य भी बोलने लगे हैं । जैसे—
“बड़े पापा, जल्दी आइए...”
उनके सामाजिक संबंधों में भी विस्तार हो रहा है।
इधर अंशु का अपने छोटे-बड़े पापा, यानी संजय भइया, से भी इंटरेक्शन बढ़ता जा रहा है। अब अपनी छोटी-छोटी उपलब्धियाँ उन्हें भी दिखाना चाहते हैं ।
जब अंशु ब्लॉक्स से कोई बिल्डिंग बनाते हैं और मैं उनसे कहता हूँ—
“यह तो शानदार हाउस बनाया है अंशु ने!”
तो वह उसे केवल मेरे साथ साझा करके संतुष्ट नहीं होते । वह छोटे-बड़े पापा को वीडियो कॉल करवाते हैं और उन्हें भी दिखाते हैं—
“सेट कर दिया!”
शायद अंशु के लिए अपनी बनाई हुई चीज़ को दिखाना भी खुशी का हिस्सा बन गया है।
अब दादी से, बाबा से, उधर नानी और नाना से भी अंशु बातें करने लगे हैं। धीरे-धीरे उनका अपना संसार और बड़ा होता जा रहा है।
लेकिन इन सबके बीच बड़े पापा और देवकेश का स्थान अभी भी अंशु के लिए कुछ अलग और विशिष्ट है। 😊
रिश्ते शायद बच्चों के लिए किसी परिभाषा से नहीं बनते। वे साथ बिताए समय, अपनापन और छोटी-छोटी स्मृतियों से बनते जाते हैं।
अंशु की दुनिया भी अब धीरे-धीरे बड़ी हो रही है—खिलौनों से कल्पना तक, शब्दों से वाक्यों तक और अपने छोटे-से संसार से रिश्तों की एक बड़ी दुनिया तक।
अंशु के ब्लॉक्स से बनी बिल्डिंग्स और अंशु
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03 अक्टूबर ,2026. 11:08 PM
रीवा
आज अंशु को रोटी-जैम दे रहा था तो अनायास ही रसखान जी की ये पंक्तियाँ याद आ गईं—
धूरि भरे अति सोभित श्यामजू तैसी बनी सिर सुंदर चोटी।
खेलत खात फिरै अंगना पग पैजनी बाजति पीरी कछोटी॥
वा छवि को रसखानि बिलोकत वारत काम कला निधि कोटी।
काग के भाग बड़े सजनी हरि-हाथ सों लै गयौ माखन-रोटी॥
कितना मनोहर चित्रण है!
अंशु को रोटी खाते देखते-देखते मन सीधे उस बाल-कृष्ण की छवि तक पहुँच गया—आँगन में खेलते, खाते, पैरों में पैंजनियाँ बजाते हुए नन्हे कृष्ण।
सोचता हूँ, इस दृश्य की कल्पना करने वाले रसखान के मन में वह बाल-कृष्ण कितना सजीव और कितना विह्वल करने वाला रहा होगा! उन्होंने केवल एक बालक को खाते हुए नहीं देखा होगा, बल्कि उस दृश्य को भीतर तक महसूस किया होगा। तभी तो सदियों बाद भी उनकी कल्पना हमारे सामने उसी बाल-कृष्ण को जीवित कर देती है।
आज अंशु को रोटी-जैम खिलाते हुए जाने क्यों लगा कि बच्चों का बचपन शायद समय बदलने पर भी अपनी मूल सुंदरता में बहुत नहीं बदलता। तब कृष्ण के हाथ में माखन-रोटी थी, आज अंशु के हाथ में रोटी-जैम।
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अंशु कल से पेंसिल पकड़कर लिखने में भी रुचि लेने लगे हैं।
पहले पेंसिल पकड़ने का एक छोटा-सा ‘पायलट प्रोग्राम’ किया था। तब उन्हें पेंसिल पकड़ना और उससे कुछ बनाना सिखाया था। शायद उसी का थोड़ा-सा प्रतिफल अब दिखाई दे रहा है—अब स्वयं पेंसिल उठाने और उससे कुछ करने में उनकी रुचि जगने लगी है।
आज उन्होंने Scribbling करते हुए पहले ओवल शेप फिर गोलाकार आकृतियाँ बनाईं और उन्हें बनाकर बहुत प्रसन्न हुए।
फिर मेरे साथ मिलकर स्टार, कार, बस और हेलीकॉप्टर भी बनाए।
उनके लिए अभी ये आकृतियाँ शायद केवल रेखाएँ और आकार हैं, लेकिन मेरे लिए इनमें अंशु की एक नई दुनिया का आरंभ दिखाई दे रहा है।
कल तक जो हाथ केवल खिलौने पकड़ते थे, अब वही हाथ पेंसिल पकड़कर रेखाओं को अपनी इच्छा के अनुसार चलाने की कोशिश कर रहे हैं।
शायद लिखने से पहले बच्चे ऐसे ही रेखाएँ खींचते हैं—और उन रेखाओं में धीरे-धीरे उनकी कल्पना अपना आकार लेने लगती है।
-- विनय शंकर तिवारी
फोटो; स्क्रिबलिंग करते हुए अंशु