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अंशू का मुंडन संस्कार

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24 जुलाई 2026 आज का दिन अंशू  के जीवन के प्रथम संस्कारों में से एक—उसके मुंडन संस्कार —का पावन अवसर था। घर में कई दिनों से इसकी तैयारी थी और आज वह शुभ घड़ी भी आ गई। हम सब प्रातः ही मैहर देवी माँ के दर्शन और अंशू के संस्कार के लिए निकल पड़े। आशा दी, गुड़िया दीदी, भाभी, रिंकू और आयुष, पवन जीजा, प्रमोद, उनकी मम्मी (भाभी) तथा जर्मई वाली भाभी—सभी साथ थे। इतने अपने एक साथ हों तो यात्रा केवल स्थान परिवर्तन नहीं रहती, वह अपनेपन का चलता-फिरता उत्सव बन जाती है। किन्तु इस उल्लास के बीच कुछ रिक्त स्थान भी थे, जो बार-बार मन को छू जाते थे। पापा और मम्मी इस यात्रा में साथ नहीं आ सके। पापा की ओपन हार्ट सर्जरी के बाद अब भी लंबी यात्राएँ उनके लिए कष्टदायक हो जाती हैं, और मम्मी को यात्रा में उल्टियों की इतनी समस्या होती है कि पहुँचते-पहुँचते ही उनका स्वास्थ्य बिगड़ जाता है। मन बार-बार चाहता था कि वे भी अंशू के इस प्रथम संस्कार के साक्षी बनते, पर जीवन में हर इच्छा तत्काल पूर्ण हो जाए, ऐसा कहाँ होता है? गुड्डू भइया का न आ पाना भी भीतर कहीं खलता रहा। मन में आशा थी कि यदि संजय भइया की जमानत हो जाती तो ...

एक काली चिड़िया और मेरे भीतर का द्वंद्व

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रात के लगभग आठ बजे का समय था। घर में एक शांत-सा सन्नाटा पसरा हुआ था। दिन का शोर थम चुका था और रात की स्थिरता धीरे-धीरे कमरे में उतर रही थी। तभी अचानक एक छोटी-सी चिड़िया मेरे कमरे में आ गई। आकार में वह गौरैया जैसी थी, पर उसका रंग काला था—जैसे वह उजाले से नहीं, किसी छाया से बनी हो। वह घबराई हुई थी। कभी पंख फड़फड़ाती, कभी दीवार की ओर उड़ती, कभी खिड़की के पास आकर ठहर जाती। ऐसा लग रहा था मानो वह कमरे में नहीं, किसी अनजाने डर में भटक रही हो। पहले ही क्षण मेरे भीतर करुणा जागी। लगा—यह कोई बेचारी प्राणी है जो गलती से मेरे संसार में आ गई है और अब बाहर जाने का रास्ता खोज रही है। मैंने उसके सामने थोड़ा-सा फल रखा, एक कटोरी में पानी भी रख दिया। लेकिन उसी समय मेरे छोटे से बेटे का ख्याल मन में आया। वह अभी इतना नन्हा है कि किसी भी डर को समझ नहीं सकता। इसलिए मैंने उसे धीरे से दूसरे कमरे में कर दिया—जैसे पहले उसके भय को सुरक्षित कर दूँ और फिर उस चिड़िया के लिए कुछ क्षण छोड़ दूँ। कुछ देर तक मैं चुपचाप खड़ा रहा। चिड़िया सामने रखे फल और पानी को देखती रही, पर शायद वह इतनी घबराई हुई थी कि वह कुछ भी ग्रहण ...

रफ़्ता रफ़्ता वो मिरी हस्ती का सामाँ हो गए...

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इस डायरी में, कुछ स्मृतियाँ संजोकर रखना चाहता हूँ अंशुल के लिए, ताकि जब वो बड़ा हो और उसे स्वयं को जानने की अभीप्सा हो तो अपने अतीत की ओर मुड़ सके और अतीत को शब्दों में जीते हुए अपने वर्तमान को सुनिश्चित कर सके । स्वयं को पहचान कर अपना मार्ग प्रशस्त कर सके । दिनाँक : 27 नवंबर,2021 अंशू ननिहाल में हैं । आज अंशु से वीडियो कॉल में बात हुई तो मुझे देख कर रोने लगा। । मेरे पास आना चाह रहा था, क्योंकि इधर उसका विशेष स्नेह हो गया है मुझसे । इसका कारण यह है की उसे मैं गोद में लेके घुमाता हूं । उसे घूमना, तरह तरह की चीजें देखना पसंद है । मेरे साथ वह थोड़ी शरारत भी कर सकता था जैसे फ्रिज कवर को खींचना, जाली से प्लेट, कटोरी अपने से लेले लेना आदि.. उस दिन जब मैं किचेन में प्यूरी बना रहा था उसके लिए तब, पहली बार अंशू क्रॉलिंग करते हुए रूम से किचेन तक का सफर स्वयं तय किया ! यह दिन था 20 नवंबर 2024 । यह दिन ऐतिहासिक था उसके लिए । अभी तक एक दो कदम ही क्रोलिंग करता था । अब वह दोनो कमरों और किचन में तो पहुंचता ही रहता है । फर्श की टाइल्स काफी ठंडी रहती है इसलिए हमें उसे दस्ताने पहनाने पड़ते हैं जो उसे अच्...

विदा छिन्दवाड़ा!

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विदा, छिंदवाड़ा! छिंदवाड़ा मुझे अकस्मात मिला । कोई उम्मीद नहीं थी कि मैं कभी छिंदवाड़ा जाऊॅंगा, पर मिलना था सो मिले । यह जून 2023 था जब मैं यहाँ पहुँचा । पहले पहल उत्सुकता और अनभिज्ञता हर नए शहर में होती है सो हुई, किंतु जब रहने पहुँचा तो शहर ने आकंठ भर लिया । छिंदवाड़ा, मध्य प्रदेश का दक्षिणी जिला है जो नागपुर से ठीक उत्तर अवस्थित है । इसका शहरी क्षेत्रफल कम ही है किन्तु है शानदार शहर! यहाॅं का मौसम, स्वच्छता, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठता यहाॅं की सौंदर्यमणियाॅं हैं । इसे प्रकृति ने अपनी छत्र-छाया में रखा है, ठीक जैसे पचमढ़ी को । यद्यपि यहाँ कोई नदी का तटीय क्षेत्र नहीं है, फिर भी स्वाभाविक खुलापन है इस शहर में, जिसके कारण मन आनंदित रहता है । वस्तुत यह खुलापन इस शहर में ही व्याप्त है, इसके मोहल्लों में, सड़कों में, सब्जी मंडी में हर जगह । इस शहर का मौसम यहाॅं का कीर्तिस्तंभ है, ग्रीष्म में भी तापमान  38 से 40° सेल्सियस पहुॅंचते ही उमड़ पड़ते हैं बादल और फिर लुढ़का देते हैं तापमान को नीचे । यहाॅं कॉफ़ी हाउस का डोसे, श्री राधे टावर के पास वीआईपी रोड की तंदूरी चाय, हरे माधव की फुल्की क...

डायरी 16 अगस्त 2024 - संकल्प स्वातंत्र्य की सीमितता ।

जब भाग्य में नहीं होता तो मिली वस्तु नहीं मिलती ।यह बात चरितार्थ हुई सुनीता के साथ । उसे वैढ़न से रीवा आने के लिए मैने  फ्लाइट बुक किया था । उसके पास पहली बार फ्लाइट चढ़ने का अवसर था लेकिन भाग्य में नहीं लिखा तो क्योंकर आए? भाग्य में तो कार से ही आना लिखा था वो भी सोई हुई आधी रात में! भाग्य ऐसे ही काम करता है, जब जो नियत है वही होगा । यही बातें नियति को मान कर चलने में विश्वास दृढ़ करती हैं । अगर कोई यह कहे की यह भाग्य नहीं उसके चुनने की स्वतंत्रता या संकल्प स्वातंत्र्य था तो आखिर उसने वही क्यों चुना ? यदि इस प्रश्न पर गौर किया जाए तो फिर वही बात आ जाती है और जो प्रकट होता है वह यही कि परिस्थितियाँ ही ऐसी बनी । उसी दिन उसका ‘नेउरी नमय’ का व्रत फंसना, उसकी रक्षाबंधन तक रुकने की इच्छा बलवती होना आदि.. परंतु रक्षाबंधन मायके में मानना कहां लिखा था वो तो लिखा था गाँव में, सो BMO का आदेश आ गया और आना पड़ा । यहीं मानव का संकल्प स्वातंत्र्य की सीमितता का बोध होता है । विनय 16 अगस्त 2024

डायरी : 11 मार्च 2024

मैं अभी वरदान हॉस्पिटल रीवा में हूॅं यहाॅं एक परिवार में अभी-अभी बालक का जन्म हुआ है । सब खुश हैं, बच्चे का चाचा जो कि अभी लगभग 20 वर्ष का होगा, उसका नाम किसन है । वो अभी अपनी माॅं को फोन में बता रहा था की लल्ला हुआ! बड़ी उमंग से बता रहा था! वो बहुत प्रसन्न है । मैंने कहा - चाचा बन गए, बधाई हो! कहने लगा, सबको मिठाई खिलाऊॅंगा, आपको तो ढूॅंढ़ कर खिलाऊॅंगा!  भारतीय जनमानस में यही खास बात है जो हमें अपरिचित होते हुए भी जोड़े रखती है ।  - विनय शंकर तिवारी   11 मार्च, 2024   वरदान हॉस्पिटल, रीवा

छिंदवाड़ा डायरी - 25 जनवरी 2024

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छिंदवाड़ा डायरी - 25 जनवरी 2024                         चित्र: प्रतीकात्मक आज पौष मास के शुक्ल पक्ष के पूर्णिमा की रात्रि चंद्रमा इतना प्रोज्ज्वल था की बिना किसी अन्य प्रकाश के इस धरित्री और नभ के इस शीतयुक्त सौंदर्य को आँखभर निहारा जा सकता था। इस समय मैं दक्षिणी मध्य प्रदेश में हूॅं इसीलिए इस सुख से लाभान्वित हो पा रहा हूं क्योंकि उत्तरी मध्य प्रदेश सहित समूचा उत्तरी भारत इस समय भीषण शीत और कोहरे से ढंका हुआ है । वहाँ तो इस सौंदर्य का स्वादन करना अभी कहाँ संभव है ? वहाँ ऐसा आनंद ग्रीष्म में ही मिलता है जब चांदनी रातें फाल्गुन से ज्येष्ठ तक निरंतर प्रोज्जवल होती चली जाती है । चंद्र का यह नव प्रकाश धरित्री को धवल चंद्र प्रभा से विभोर कर देती है । यह सुख तो आत्मविभोर करने वाला है ही किन्तु शीत में चंद्र प्रभा का सौंदर्य देखना उत्तर भारत में बहुधा कम ही होता है । यह चाॅंदनी चाहे शिशिर ऋतु की हो या ग्रीष्म ऋतु की, होती बड़ी मनमोहक है और साथ रहता है विकीर्ण एकान्त । अमृतलाल वेगड़ जी यूँ ही नहीं कहते कि चन्द्रमा के पास ऐस...