Sunday, 13 September 2026

इत्यलम् (मेरी डायरी)


13 सितंबर 2026

प्रसंग : एक Facebook पोस्ट से शुरू हुई स्मृति, AI और वास्तविकता पर छोटी-सी परिचर्चा

आज Facebook पर मेरे एक Philosophy Professor की एक पोस्ट पढ़ी। उन्होंने Utkal University के Department of Philosophy में अपने PG के दिनों की, यानी 1980 के दशक के उत्तरार्ध की, एक पुरानी तस्वीर साझा की थी। AI की सहायता से उस तस्वीर को फिर से जीवंत करते हुए उन्होंने जैसे अपने उस युवा विद्यार्थी-जीवन में लौटने का अनुभव किया था।

पोस्ट पढ़ते हुए लगा—मनुष्य कितना भी आगे बढ़ जाए, अपने अतीत की ओर लौटने की इच्छा शायद कभी समाप्त नहीं होती। कुछ स्मृतियाँ सचमुच पुरानी नहीं होतीं; वे भीतर कहीं सुरक्षित रहती हैं और अवसर मिलते ही फिर जीवित हो उठती हैं।

मैंने उनकी पोस्ट पर टिप्पणी की—

“A beautiful journey back in time, Sir! Some memories never really grow old—they only wait to be brought alive again. Truly, the reel meets the real!”

Professor ने उत्तर दिया—

“Thank you so much for your warm and thoughtful words!”

उनका यह उत्तर अच्छा लगा। विशेषकर “warm and thoughtful” शब्दों ने ध्यान खींचा। लगा कि उन्होंने मेरी टिप्पणी को केवल औपचारिक प्रशंसा के रूप में नहीं, बल्कि उसके भाव और विचार को भी देखा।

लेकिन इसी पोस्ट पर हुई आगे की बातचीत और भी रोचक थी।

किसी ने ओड़िया में टिप्पणी की कि उस समय सीढ़ियों के दोनों ओर रेलिंग नहीं थी।

मैं वहीं ठिठक गया।

यह एक बहुत छोटी-सी बात थी, लेकिन उसमें एक बड़ी बात छिपी थी।

AI अतीत को उपलब्ध तस्वीरों और सूचनाओं के आधार पर कल्पना में फिर से बना सकता है। वह किसी पुराने दृश्य को सुंदर ढंग से प्रस्तुत कर सकता है। लेकिन उस समय वास्तव में वहाँ क्या था—सीढ़ियों पर रेलिंग थी या नहीं, भवन कैसा था, वातावरण कैसा था—इन बातों की सबसे प्रामाणिक जानकारी उस व्यक्ति के पास ही हो सकती है, जिसने उस समय वहाँ स्वयं उपस्थित होकर उसे देखा और जिया हो।

मैंने इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए टिप्पणी की कि AI अतीत को कल्पना में फिर से जीवंत कर सकता है, लेकिन उस समय की वास्तविक स्मृतियाँ तो उन्हीं लोगों के पास होती हैं जो उस समय वहाँ उपस्थित थे। ऐसी स्मृतियाँ AI द्वारा बनाई गई reel को और अधिक वास्तविक बना देती हैं।

Professor ने मेरी बात को समझा और अपने उत्तर में लिखा कि उस समय वहाँ उपस्थित लोगों की ऐसी स्मृतियाँ AI-generated past को अधिक realistic बनाती हैं। उन्होंने यह भी समझाया कि AI उपलब्ध visual material के आधार पर interpolation और extrapolation करता है। चूँकि उस समय की Department की ऐसी पुरानी तस्वीर उपलब्ध नहीं थी जिसमें रेलिंग न हो, इसलिए AI ने वर्तमान तस्वीर को आधार बनाया और कल्पना से उन्हें late 80s में पहुँचा दिया।

यह पढ़कर मन में एक संतोष-सा हुआ।

मेरी छोटी-सी टिप्पणी अब एक परिचर्चा का रूप ले चुकी थी।

Professor ने आगे अपनी एक इच्छा भी बताई—वे अपने उस समय के शिक्षकों के साथ AI की सहायता से एक group photograph बनवाना चाहते हैं। उनके पास उन दिनों की कोई group photograph नहीं है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि शायद किसी पुराने साथी ने ऐसी कोई तस्वीर संभालकर रखी हो।

इस बात ने मुझे और सोचने पर मजबूर किया।

आज AI के पास अतीत के दृश्य को फिर से बनाने की अद्भुत क्षमता है। लेकिन जिस अतीत को हम खो चुके हैं, उसकी एक छोटी-सी वास्तविक तस्वीर पाने के लिए आज भी हमें उन्हीं मनुष्यों की स्मृति की ओर देखना पड़ता है, जिन्होंने वह समय जिया था।

AI अतीत को दिखा सकता है, लेकिन स्मृति ही उसे जीवित करती है।

शायद यही इस छोटी-सी Facebook परिचर्चा का सबसे सुंदर निष्कर्ष है।

एक साधारण-सी पुरानी तस्वीर से शुरू हुई बात स्मृति, वास्तविकता, AI और मानवीय अनुभव तक पहुँच गई।

और मुझे ऐसी बातचीत अच्छी लगती है।

शायद Philosophy भी कुछ ऐसी ही है—सामान्य-सी दिखाई देने वाली किसी बात में छिपे हुए प्रश्न को पकड़ लेना और फिर उसके पीछे थोड़ा दूर तक चलते चले जाना।

                                               ______________


15 सितम्बर 2026

चितहरा रेलवे स्टेशन क्रॉस करते हुए ।              09:14 AM 

मानिकपुर से सतना की ओर — राम की वनभूमि में ।

आज मानिकपुर से सतना की ओर जा रहा हूँ। रास्ते में चारों ओर फैली ये पहाड़ियाँ और जंगल देखकर मन बार-बार उसी युग में चला जाता है, जब श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी ने अपने वनवास के वर्षों में इन वनांचलों में भ्रमण किया था।

मन में एक विचित्र-सा विचार उठता है—ये भूमि कितनी सौभाग्यशाली रही होगी!

इन पहाड़ियों ने कभी राम के चरणों को स्पर्श किया होगा।
इन वृक्षों ने उन्हें अपने बीच से गुजरते देखा होगा।
इन जंगलों ने माता सीता और लक्ष्मण जी की उपस्थिति को अनुभव किया होगा।
और यहाँ की मानव सभ्यताएँ—वे कितनी भाग्यशाली रही होंगी, जिन्हें राम के सान्निध्य का अवसर मिला होगा।

आज हम इन स्थानों से गुजरते हुए केवल पहाड़ और जंगल देखते हैं, लेकिन यदि स्मृति और श्रद्धा की आँखों से देखें तो यही वनभूमि इतिहास, संस्कृति और अध्यात्म की एक जीवित स्मृति बन जाती है।

राम केवल एक आदर्श पुरुष या नायक ही नहीं थे; वे योद्धा भी थे। उन्होंने जिन राक्षसों का सामना किया, उन्हें केवल किसी एक जाति या समुदाय के रूप में देखना शायद उस कथा के व्यापक अर्थ को सीमित कर देना होगा। वे उन कुप्रवृत्तियों और अत्याचारों के प्रतीक भी हैं, जिनसे किसी भूमि और समाज को मुक्त करना आवश्यक होता है।

और फिर माता सीता...

उनकी रसोई और उनकी उदारता की कल्पना ही मन को छू जाती है। वनवास में भी उनका जीवन केवल अपने लिए नहीं था। उनके हाथों से बना भोजन और उसमें निहित आत्मीयता शायद यह सिखाती है कि अभाव के बीच भी उदारता संभव है और साधारण-सी रसोई भी प्रेम का तीर्थ बन सकती है।

इन्हीं विचारों में डूबा हुआ आगे बढ़ता हूँ तो मानिकपुर के बाद ट्रेन जैतवारा स्टेशन पर रुकती है। यहाँ से अगला स्टेशन सतना है।

अब दृश्य कुछ बदल जाता है। वही धरती, वही क्षेत्र—लेकिन सामने आज का मनुष्य है।

जैतवारा से ट्रेन में तरह-तरह के यात्री चढ़ते-उतरते हैं। कोई छात्र है, जो पढ़ाई के लिए जा रहा है। कोई महिला डॉक्टर को दिखाने जा रही है, कोई किसी दूसरे आवश्यक काम से। कुछ लोग अपने कार्यालय की ड्यूटी के लिए यात्रा कर रहे हैं। इनके बीच प्रौढ़ और बुजुर्ग यात्री भी हैं।

वास्तव में, यह बड़ा विविधतापूर्ण यात्री स्टेशन है।

किसी की यात्रा शिक्षा के लिए है, किसी की स्वास्थ्य के लिए, किसी की रोज़गार के लिए और किसी की जीवन की दूसरी आवश्यकताओं के लिए। सबके अपने-अपने उद्देश्य हैं, अपनी-अपनी चिंताएँ हैं और अपनी-अपनी मंजिलें हैं।

कुछ क्षणों के लिए लगता है—कभी इसी धरती पर राम अपने वनवास की यात्रा कर रहे थे और आज इसी धरती पर असंख्य सामान्य मनुष्य अपनी-अपनी छोटी-बड़ी जीवन-यात्राओं पर निकले हुए हैं।

युग बदल गया, यात्री बदल गए, यात्राओं के उद्देश्य बदल गए—
पर यात्रा अब भी जारी है।

और शायद यही इस भूमि की सबसे बड़ी विशेषता है—
यह केवल राम की स्मृतियों को ही नहीं सँजोए हुए है, बल्कि आज भी असंख्य मनुष्यों के जीवन की यात्राओं की साक्षी बनी हुई है।

ट्रेन अब सतना की ओर बढ़ रही है।...

- विनय शंकर तिवारी

Sunday, 5 July 2026

अंशू का मुंडन संस्कार

24 जून 2026

आज का दिन अंशू  के जीवन के प्रथम संस्कारों में से एक—उसके मुंडन संस्कार—का पावन अवसर था। घर में कई दिनों से इसकी तैयारी थी और आज वह शुभ घड़ी भी आ गई। हम सब प्रातः ही मैहर देवी माँ के दर्शन और अंशू के संस्कार के लिए निकल पड़े। आशा दी, गुड़िया दीदी, भाभी, रिंकू और आयुष, पवन जीजा, प्रमोद, उनकी मम्मी (भाभी) तथा जर्मई वाली भाभी—सभी साथ थे। इतने अपने एक साथ हों तो यात्रा केवल स्थान परिवर्तन नहीं रहती, वह अपनेपन का चलता-फिरता उत्सव बन जाती है।

किन्तु इस उल्लास के बीच कुछ रिक्त स्थान भी थे, जो बार-बार मन को छू जाते थे। पापा और मम्मी इस यात्रा में साथ नहीं आ सके। पापा की ओपन हार्ट सर्जरी के बाद अब भी लंबी यात्राएँ उनके लिए कष्टदायक हो जाती हैं, और मम्मी को यात्रा में उल्टियों की इतनी समस्या होती है कि पहुँचते-पहुँचते ही उनका स्वास्थ्य बिगड़ जाता है। मन बार-बार चाहता था कि वे भी अंशू के इस प्रथम संस्कार के साक्षी बनते, पर जीवन में हर इच्छा तत्काल पूर्ण हो जाए, ऐसा कहाँ होता है?

गुड्डू भइया का न आ पाना भी भीतर कहीं खलता रहा। मन में आशा थी कि यदि संजय भइया की जमानत हो जाती तो वे भी आ जाते, किंतु न्यायालय में सुनवाई ही टल गई। कुछ प्रतीक्षाएँ मनुष्य करता है, कुछ प्रतीक्षाएँ समय स्वयं कराता है। शायद ईश्वर ने अभी उस मिलन का समय सुरक्षित रखा है।

देवी का मंदिर पर्वत-शिखर पर स्थित है। वहाँ तक पहुँचने के लिए लगभग एक सहस्त्र सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। हमारे साथ कुछ ऐसे लोग थे जिनके लिए इतनी लंबी चढ़ाई कठिन होती, इसलिए निश्चय हुआ कि सभी लोग रोप-वे से ही ऊपर जाएँगे।

रोप-वे की लंबी कतार को देखकर लगा कि आज का मनुष्य सुविधा के अधिक निकट और श्रम के कुछ दूर खड़ा हो गया है। शायद यह समय की माँग भी है; जीवन की दौड़ ने उसे विश्राम का अभिलाषी बना दिया है। मैं किसी के चुनाव का निर्णय नहीं करता, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की अपनी परिस्थितियाँ होती हैं। किंतु अपने मन की बात कहूँ तो जब तक शरीर स्वस्थ और समर्थ है, पर्वत की सीढ़ियाँ मुझे प्रार्थना का ही विस्तार लगती हैं। प्रत्येक पग मानो अहंकार को थोड़ा-थोड़ा पीछे छोड़ता हुआ श्रद्धा के और निकट ले जाता है। जिस चित्-शक्ति के मूर्त स्वरूप के दर्शन के लिए हम जा रहे हों, वहाँ तक पहुँचने में यदि तन का थोड़ा श्रम भी लग जाए, तो वह श्रम नहीं, भक्ति का मौन अर्घ्य बन जाता है। वृद्धावस्था आएगी तो उसका भी सम्मान करूँगा, क्योंकि वह काल का विधान है; पर आज जब पैरों में सामर्थ्य है, तब सीढ़ियाँ मुझे रोप-वे से कहीं अधिक आत्मीय प्रतीत होती हैं।


आज मुंडन का बड़ा मुहूर्त था। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो आने वाला प्रत्येक तीसरा व्यक्ति अपने बच्चे का मुंडन कराने ही आया हो। हम प्रातः नौ बजे ही मंदिर की पार्किंग में पहुँच गए थे, किंतु रोप-वे का समय एक से दो बजे का मिला। फिर बीच में दर्शन कुछ समय के लिए बंद हो गए, जिससे और विलंब हुआ। अंततः लगभग चार बजे हमें रोप-वे में बैठने का अवसर मिला और साढ़े चार बजे तक माता के दर्शन सम्पन्न हुए।

इतनी प्रतीक्षा के कारण अनेक परिवारों ने रोप-वे में जाने से पहले ही अपने बच्चों का मुंडन करवा लिया था। एक क्षण को हमने भी ऐसा करने का विचार किया, किंतु सुनीता ने बड़े सहज भाव से कहा—"हम मुंडन संस्कार के लिए ही आए हैं, इसलिए अंशू पहले अपनी झालर सहित माता के दर्शन करेगा, उसके बाद ही उसके केश उतारे जाएँगे।" उसके इस आग्रह में श्रद्धा की ऐसी सरलता थी कि फिर कोई दूसरा विचार मन में आया ही नहीं। सच ही है, संस्कार केवल कर्मकाण्ड से नहीं, भावना से पूर्ण होते हैं।

दर्शन के पश्चात् अंशू का मुंडन सम्पन्न हुआ। आश्चर्य यह कि उसने तनिक भी रोना नहीं। वह पूरे समय कौतूहल से इधर-उधर देखता रहा। रिंकू ने उसके हाथ में मोबाइल दे दिया और देखते-देखते पूरा संस्कार बड़ी सहजता से संपन्न हो गया।

मुंडन के बाद जब मैंने उसे देखा तो लगा जैसे उसका सौंदर्य और अधिक उज्ज्वल हो उठा हो। उसका निर्मल मस्तक किसी नवोदित चन्द्रमा की शीतल आभा बिखेर रहा था। तभी मन में एक सुंदर कल्पना उभरी—शायद अंशू का जन्म महाशिवरात्रि से एक दिन पूर्व इसलिए हुआ कि वह भगवान शिव के जटाजूट में सुशोभित शशांक की भाँति इस संसार में अपनी निष्कलुष मुस्कान से प्रकाश फैलाए। उस क्षण उसका मुख सचमुच चन्द्र-कला-सा शांत और मोहक लग रहा था।

संस्कार के उपरांत हम सबने साथ बैठकर भोजन किया। पूड़ियाँ गाँव में बनी थीं और सब्ज़ी रीवा में। घर से आया हुआ भोजन केवल स्वाद नहीं देता, वह अपने लोगों का स्नेह भी साथ लेकर आता है। खुले आकाश के नीचे, परिवार के बीच बैठकर किया गया वह साधारण भोजन भी किसी राजभोज से कम नहीं लगा।

संध्या ढलते-ढलते विदा का समय आ गया। लगभग नौ बजे हम रीवा लौट आए। मन की इच्छा थी कि मैं, सुनीता और अंशू गाँव भी चले जाएँ, ताकि पापा-मम्मी का आशीर्वाद अंशू को मिल सके। किंतु छह तारीख को मेरी परीक्षा है। सुनीता ने व्यावहारिक पक्ष सामने रखा—अभी जाने पर दो छुट्टियाँ लेनी पड़ेंगी, और यदि भइया की जमानत हो गई तो गाँव जाना ही होगा।

इसलिए आज की रात एक छोटी-सी प्रार्थना के साथ समाप्त हो रही है। ईश्वर से यही निवेदन है कि पापा शीघ्र पूर्ण स्वस्थ हों, मम्मी प्रसन्न रहें, भइया के जीवन में भी शुभ समाचार आए और परिवार के सभी बिखरे हुए क्षण पुनः एक साथ बैठ सकें। यदि परमात्मा की कृपा से ऐसा हो गया, तो आज का यह संस्कार केवल अंशू के जीवन का ही नहीं, पूरे परिवार के जीवन का भी एक पूर्ण मंगल अध्याय बन जाएगा।

आज का दिन स्मृतियों में चिरस्थायी हो गया। समय के साथ अंशू के सिर पर फिर केश आ जाएँगे, पर आज उसकी निष्कलुष मुस्कान, माता के चरणों में उसका प्रथम संस्कार और परिवार के प्रेम से भरा यह दिन मेरे हृदय की डायरी में सदैव उज्ज्वल बना रहेगा।

विनय

Tuesday, 31 March 2026

एक काली चिड़िया और मेरे भीतर का द्वंद्व

रात के लगभग आठ बजे का समय था। घर में एक शांत-सा सन्नाटा पसरा हुआ था। दिन का शोर थम चुका था और रात की स्थिरता धीरे-धीरे कमरे में उतर रही थी। तभी अचानक एक छोटी-सी चिड़िया मेरे कमरे में आ गई।

आकार में वह गौरैया जैसी थी, पर उसका रंग काला था—जैसे वह उजाले से नहीं, किसी छाया से बनी हो। वह घबराई हुई थी। कभी पंख फड़फड़ाती, कभी दीवार की ओर उड़ती, कभी खिड़की के पास आकर ठहर जाती। ऐसा लग रहा था मानो वह कमरे में नहीं, किसी अनजाने डर में भटक रही हो।

पहले ही क्षण मेरे भीतर करुणा जागी। लगा—यह कोई बेचारी प्राणी है जो गलती से मेरे संसार में आ गई है और अब बाहर जाने का रास्ता खोज रही है। मैंने उसके सामने थोड़ा-सा फल रखा, एक कटोरी में पानी भी रख दिया।

लेकिन उसी समय मेरे छोटे से बेटे का ख्याल मन में आया। वह अभी इतना नन्हा है कि किसी भी डर को समझ नहीं सकता। इसलिए मैंने उसे धीरे से दूसरे कमरे में कर दिया—जैसे पहले उसके भय को सुरक्षित कर दूँ और फिर उस चिड़िया के लिए कुछ क्षण छोड़ दूँ।

कुछ देर तक मैं चुपचाप खड़ा रहा। चिड़िया सामने रखे फल और पानी को देखती रही, पर शायद वह इतनी घबराई हुई थी कि वह कुछ भी ग्रहण नहीं कर सकी। उस मौन में मुझे लगा—कभी-कभी दया देना आसान होता है, पर दया को स्वीकार करना उतना ही कठिन।

फिर वह क्षण आया जब मुझे निर्णय लेना पड़ा। करुणा और जिम्मेदारी दोनों मेरे सामने खड़ी थीं—एक कहती थी “उसे रहने दो”, दूसरी कहती थी “पहले अपने बच्चे की सुरक्षा देखो।”

और आखिरकार मैंने उसे सावधानी से कमरे से बाहर निकाल दिया।

मैंने उसे भगाया नहीं, बस धीरे-धीरे दरवाज़े की ओर कर दिया—जैसे किसी भटके हुए यात्री को रास्ता दिखाया जाता है। वह बाहर उड़ गई, और कमरे में फिर वही शांति लौट आई, पर मेरे भीतर एक गहरा मौन रह गया।


उसके जाने के बाद मैंने अपने आप से पूछा—क्या वह केवल एक चिड़िया थी? या वह मेरे भीतर छिपे उस मनुष्य को दिखाने आई थी, जो एक साथ दयालु भी है और डरा हुआ भी?

शायद वह कोई संकेत नहीं थी, कोई दैवीय घटना भी नहीं। लेकिन वह एक दर्पण जरूर थी—जिसमें मैंने अपने भीतर के दो चेहरे देखे। एक जो हर जीव के लिए पिघल जाता है, और दूसरा जो अपने प्रिय की रक्षा के लिए कठोर भी हो सकता है।

आज मुझे लगा कि मनुष्य होना शायद इसी संतुलन का नाम है—करुणा और भय के बीच, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी के बीच, और प्रेम और सुरक्षा के बीच।

रात के उस छोटे-से क्षण में एक काली चिड़िया आई थी, पर जाते-जाते वह मेरे भीतर एक गहरा प्रश्न छोड़ गई—
क्या दया और जिम्मेदारी साथ-साथ चल सकती हैं?

शायद हाँ।
क्योंकि आज मैंने उसे भगाया नहीं, बल्कि उसे सुरक्षित बाहर जाने का रास्ता दिया—और अपने भीतर के मनुष्य को भी थोड़ा और समझ लिया। 🌿🌙

- विनय

30 मार्च 2026, 08:30 PM




Sunday, 20 July 2025

मेरे आत्मज... (डायरी)




इस डायरी में, कुछ स्मृतियाँ संजोकर रखना चाहता हूँ अंशु के लिए, ताकि जब वो बड़ा हो और उसे स्वयं को जानने की अभीप्सा हो तो अपने अतीत की ओर मुड़ सके और अतीत को शब्दों में जीते हुए अपने वर्तमान को सुनिश्चित कर सके । स्वयं को पहचान कर अपना मार्ग प्रशस्त कर सके ।



09 मार्च 2024, शनिवार | 4:30 AM | पुरानी वरदान हॉस्पिटल 

मैं अपने बेटे अंशु को लेके आज वरदान हॉस्पिटल में हूं । दो दिन ही जन्म लिये हुआ है और पीलिया हो गई है अंशु को ।
डॉ शब्द सिंह यादव जी ने बताया कि यह सामान्य है बच्चों में पीलिया हो जाना । अंशु को मां का दूध भी नहीं निकल रहा था और जो बच्चों के डॉ आए थे 07 मार्च को अंशु के पैदा होने पर देखने, उन्होंने कोई अल्टरनेट पाउडर भी पिलाने को नहीं लिखा । सो कमजोरी भी लग रही थी उसे, इसीलिए और शिकस्त हो गया है अंशु। 
अंशु को नर्सरी में फोटोथेरेपी में रखे हैं ।

मैं जहाॅं हूॅं वहाॅं एक परिवार में अभी-अभी बालक का जन्म हुआ है ।
सब खुश हैं, बच्चे का चाचा जो कि अभी लगभग 20 वर्ष का होगा, उसका नाम किसन है । वो अभी अपनी माॅं को बता रहा था की लल्ला हुआ!
कितने उमंग से बता रहा था!
वो बहुत प्रसन्न है ।
मैंने कहा - चाचा बन गए, बधाई हो! कहने लगा, सबको मिठाई खिलाऊॅंगा, आपको तो ढूॅंढ़ कर खिलाऊॅंगा! 
मैं मुस्कुरा दिया ।
 मेरे मन में यह बात उठी कि शायद यही आत्मीयता भारतीय जनजीवन की सबसे बड़ी पूँजी है।"


दिनाँक : 27 नवंबर,2024

अंशू ननिहाल में हैं । आज अंशु से वीडियो कॉल में बात हुई तो मुझे देख कर रोने लगा। । मेरे पास आना चाह रहा था, क्योंकि इधर उसका विशेष स्नेह हो गया है मुझसे । इसका कारण यह है की उसे मैं गोद में लेके घुमाता हूं । उसे घूमना, तरह तरह की चीजें देखना पसंद है । मेरे साथ वह थोड़ी शरारत भी कर सकता था जैसे फ्रिज कवर को खींचना, जाली से प्लेट, कटोरी अपने से लेले लेना आदि..
उस दिन जब मैं किचेन में प्यूरी बना रहा था उसके लिए तब, पहली बार अंशू क्रॉलिंग करते हुए रूम से किचेन तक का सफर स्वयं तय किया ! यह दिन था 20 नवंबर 2024 दिन के लगभग 11 बजे ।
यह दिन ऐतिहासिक था उसके लिए । अभी तक एक दो कदम ही क्रोलिंग करता था । अब वह दोनो कमरों और किचन में तो पहुंचता ही रहता है ।
फर्श की टाइल्स काफी ठंडी रहती है इसलिए हमें उसे दस्ताने पहनाने पड़ते हैं जो उसे अच्छे नहीं लगते, मुझे भी अच्छा नहीं लगता उसका ‘अच्छा न लगना’ ।
तुम्हारे स्वास्थ्य के लिए यह आवश्यक है इसलिए तुम्हे पहनना ही होगा मेरे आत्मज ।
अंशू शायद समझ गया है कि इसे पहनना ही होगा । 
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दिनाँक 09/12/2024

अंशू के लिए आज वॉकर लाया । अंशू देखकर बहुत खुश हुआ ।
मैं वॉकर के पहिए साज रहा था और अंशू उन्हें निगरानी करते हुए  घुमा-घुमा कर देख रहा था । और सजने के बाद तो सवारी का लुत्फ खूब उठाया अंशू ने ।
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 दिनाँक 12/12/2024

अंशू अब वॉकर को अपने पैर से चलाने लगा है । दोनो कमरे, किचन और बालकनी वॉकर के पहिए की गड़गड़ाहट से गुलजार रहती है । उसे चलाना अच्छा लगने लगा है, उस समय उसकी मुस्कुराहट देखते बनती है ।

अब मुझे भी थोड़ा आराम मिलने लगा है । क्योंकि गोद में लिए रहने का टाइम कम हो गया है । दोपहर मे अंशू के जगने के बाद छत ले जाता हूं जिससे दो कार्य सिद्ध होते हैं - पहला तो यह की धूप लगने लगती है और दूसरा अंशू क्रालिंग कर लेते हैं छत में ।
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 दिनाँक 1 मार्च,2025

प्रिय आत्मज के लिए - 
अंशू आज अपने ननिहाल चला गया मौसी की सगाई में ।
सुबह उठा तो ठीक था किंतु जब मुझे न देखा और घर भी बदला सा लगा तो रोने लगा ।
सुनीता बताई कि किसी तरह रोना बंद किया । फिर वीडियो कॉल में जैसे ही मुझे देखा फिर बहुत रोने लगा । 
परसों सुबह जाऊंगा तो निस्संदेह बहुत खुश होगा!
और मैं यहाँ चाय पीते हुए अपने छज्जे में बैठे कबूतरों और गौरैया के कृत्यों को देख कर कहने लगा - 

ओ कबूतरों!
तुम्हारा दृष्टा चला गया ननिहाल।
जो देखता था 
तुम्हारी क्रियाओं को कौतूहल से
आश्चर्य करता और खिलखिलाता 
 तुम्हारी उड़ान से ।
ओ गौरैया!
तुम्हारी फुर्र सी उड़ान गुदगुदाती थी उसे
तुम्हारे तिनका उठाने से सीखता है जो कर्म ।
वह फिर आएगा
तुम्हारी अठखेलियों पर खिलखिलाने
तुम्हारे साथ जीवन का उत्सव मनाने ।
 
विनय शंकर तिवारी
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 दिनाँक 19 जुलाई 2025,शनिवार 

समयभाव के कारण बहुत दिनों से लिख नहीं पाया । अंशु अब दीवाल पकड़ कर या तीन पहिए वाली गाड़ी (जो इनके नाना ने भेजवाया है ) को पकड़ कर चलने लगे हैं । क्रोलिंग तो रफ़्तार से करते हैं ।
अब अंशू के प्राइवेट लैंग्वेज की शुरुआत भी हो चुकी है ।
अब आपके मन में प्रश्न उठेगा कि प्राइवेट लैंग्वेज क्या है ? तो बच्चों की प्राइवेट लैंग्वेज (Private Language) का अर्थ होता है वह भाषा या संकेत प्रणाली जो बच्चे खुद अपने लिए विकसित करते हैं, और जिसे केवल वही समझते हैं — अन्य लोग नहीं।
विकासात्मक मनोविज्ञान (Developmental Psychology) मानता है कि बच्चे जब बहुत छोटे होते हैं, तो वे बोलने से पहले या बोलना सीखते समय कुछ विशेष ध्वनियाँ, इशारे या शब्दों का प्रयोग करते हैं जो दूसरों को समझ में नहीं आता। यह उनकी प्रारंभिक संप्रेषण प्रणाली होती है।
फिर धीरे-धीरे अपने परिवेश की भाषा सीखने लगते हैं और फिर आहिस्ता-आहिस्ता अपनी प्राइवेट लैंग्वेज की अलविदा कर देते हैं  ।
अंशू के लिए एक बिजी क्यूब और ज्योमेट्रिकल शेप मैचिंग ऑर्डर किया हूँ ताकि इनकी मोटर स्किल एवं Eye & Hand कॉन्टैक्ट अच्छा हो सके ।

               

दो तीन दिन पहले पापा मम्मी आए थे तो अंशु धीरे - धीरे पहचानने लगे थे दो तीन दिन ही रुके वो लोग । आखिरी दिन अंशू पापा की यानि अपने बब्बा की गोद में गए ।

ऐसे ही जब मम्मी ( अंशू की नानी) आई थीं एक डेढ़ महीना पहले तो अंशू बहुत रम गए थे नानी से । नानी अंशू को घुमा- घुमा के खिलाती थीं, साथ में घूमती थीं । फिर चली गईं । उन्हें अंशुल एक दो दिन मिस किए फिर पुनश्च पहले जैसे हो गए।
उनके आने के बाद अंशू थोड़ा मोटे हो गए थे पर अभी जुकाम सर्दी में दो तीन दिन एक एक चम्मच खाए तो स्वास्थ्य थोड़ा डाउन हो गया है । फिलहाल अब स्वस्थ हैं अंशु ।

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02 मई 2026


रात्रि की यह यात्रा आज साधारण यात्रा न रहकर मानो एक जीवंत साहित्यिक अनुभूति में परिणत हो गया है। बस की पारदर्शी खिड़की से बाहर दृष्टि जाती है तो आकाश अपने विराट, धवल, जलमय स्वरूप में किसी दिव्य गंगा-प्रवाह सा प्रतीत होता है—और उस अनंत आकाश-गंगा में चंद्रमा एक उज्ज्वल, सौम्य तीर्थयात्री की भाँति स्नानरत दिखाई देता है। पर यह स्नान स्थिर नहीं; उसमें बालसुलभ चंचलता है, सलोनी अठखेलियाँ हैं, एक स्वच्छंद क्रीड़ा है। कभी वह बादलों की धुंधली ओट में स्वयं को छिपा लेता है, मानो लज्जा से घिर गया हो; फिर अगले ही क्षण उन्हीं मेघखंडों को अपने कंठ का हार बनाकर पुनः प्रकट होता है। कभी दो समानांतर बादलों की पट्टियों के मध्य से ऐसे निकलता है, जैसे किसी दिव्य घाट की संगमरमरी सीढ़ियों के बीच उतरता-चढ़ता कोई देवबालक हो।


              मेरी उस स्थिति की प्रतीकात्मक तस्वीर 

आकाश के इस विराट घाट पर आज अन्य कोई उपस्थिति नहीं—न कोई तारा, न कोई विघ्न, न कोई और आलोक। समूचा पूर्व दिशा का विस्तार केवल चंद्र के लिए आरक्षित जान पड़ता है। यह सचमुच एक ‘चन्द्रघाट’ है—जहाँ केवल वही है, और हैं उसकी स्निग्ध, कोमल, शीतल किरणें, जो पृथ्वी पर दया, माधुर्य और शांति का नीरव अभिषेक कर रही हैं।

ऐसे क्षण में वेगड़ जी की वह अद्भुत कल्पना स्मृति में कौंधती है कि चंद्रमा के पास कोई ऐसा जामन है, जिसमें सूर्य की तीक्ष्ण, प्रखर, उष्ण किरणें डुबकी लगाकर अपनी दाहकता विसर्जित कर देती हैं। वे वहीं अपनी कठोरता त्यागती हैं, और फिर चंद्र-किरण बनकर शीतल, सौम्य और करुणामयी होकर पृथ्वी पर उतरती हैं। सचमुच, आज इस दृश्य को देखकर लगता है कि प्रकाश का भी संस्कार होता है—सूर्य का तेज जब चंद्र के संस्पर्श से गुजरता है, तो वह तपन से माधुर्य में रूपांतरित हो जाता है।

बस अपनी गति से मार्ग को चीरती चली जा रही है, किन्तु भीतर समय जैसे ठहर गया है। बाहर का दृश्य मन में ऐसी तरलता भर रहा है कि यह यात्रा केवल स्थानांतरण नहीं रह जाती—यह भावों की यात्रा बन जाती है। मैं जा रहा हूँ अपने बेटे को लेने—अपने जीवन के उस छोटे, सलोने चंद्र को घर वापस लाने। बाह्य आकाश में विहार करता यह पूर्ण, धवल चंद्र और मेरे अंतर्मन में बसा मेरा पुत्र—दोनों आज एक-दूसरे के प्रतीक से प्रतीत होते हैं। जैसे प्रकृति ने स्वयं इस रात्रि को इस मिलन के लिए सजाया हो।

बस की खिड़की अब केवल काँच की पारदर्शिता नहीं रही; वह मानो संवेदनाओं की एक खुली चौखट बन गई है, जिसके पार ब्रह्मांड अपनी काव्यात्मकता में मुखर है। इस क्षण में पितृत्व, प्रकृति और काव्य—तीनों एकाकार हो उठे हैं। चंद्र की शीतलता बाहर फैल रही है, और पुत्र-स्मृति की ऊष्मा भीतर। इसी अद्भुत संतुलन में यात्रा का प्रत्येक क्षण एक साहित्यिक डायरी के पृष्ठ पर स्वयं को लिखता चला जा रहा है।

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24 जून 2026

आज का दिन अंशू के जीवन के प्रथम संस्कारों में से एक—उसके मुंडन संस्कार—का पावन अवसर था। घर में कई दिनों से इसकी तैयारी थी और आज वह शुभ घड़ी भी आ गई। हम सब प्रातः ही देवी माँ के दर्शन और अंशू के संस्कार के लिए निकल पड़े। आशा दी, गुड़िया दीदी, भाभी, रिंकू और आयुष, पवन जीजा, प्रमोद, उनकी मम्मी (भाभी) तथा जर्मई वाली भाभी—सभी साथ थे। इतने अपने एक साथ हों तो यात्रा केवल स्थान परिवर्तन नहीं रहती, वह अपनेपन का चलता-फिरता उत्सव बन जाती है।

किन्तु इस उल्लास के बीच कुछ रिक्त स्थान भी थे, जो बार-बार मन को छू जाते थे। पापा और मम्मी इस यात्रा में साथ नहीं आ सके। पापा की ओपन हार्ट सर्जरी के बाद अब भी लंबी यात्राएँ उनके लिए कष्टदायक हो जाती हैं, और मम्मी को यात्रा में उल्टियों की इतनी समस्या होती है कि पहुँचते-पहुँचते ही उनका स्वास्थ्य बिगड़ जाता है। मन बार-बार चाहता था कि वे भी अंशू के इस प्रथम संस्कार के साक्षी बनते, पर जीवन में हर इच्छा तत्काल पूर्ण हो जाए, ऐसा कहाँ होता है?

गुड्डू भइया का न आ पाना भी भीतर कहीं खलता रहा। मन में आशा थी कि यदि संजय भइया की जमानत हो जाती तो वे भी आ जाते, किंतु न्यायालय में सुनवाई ही टल गई। कुछ प्रतीक्षाएँ मनुष्य करता है, कुछ प्रतीक्षाएँ समय स्वयं कराता है। शायद ईश्वर ने अभी उस मिलन का समय सुरक्षित रखा है।

देवी का मंदिर पर्वत-शिखर पर स्थित है। वहाँ तक पहुँचने के लिए लगभग एक सहस्त्र सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। हमारे साथ कुछ ऐसे लोग थे जिनके लिए इतनी लंबी चढ़ाई कठिन होती, इसलिए निश्चय हुआ कि सभी लोग रोप-वे से ही ऊपर जाएँगे।

।              मंदिर जाते हुए सुनीता, मैं और अंशु 
   
रोप-वे की लंबी कतार को देखकर लगा कि आज का मनुष्य सुविधा के अधिक निकट और श्रम के कुछ दूर खड़ा हो गया है। शायद यह समय की माँग भी है; जीवन की दौड़ ने उसे विश्राम का अभिलाषी बना दिया है। मैं किसी के चुनाव का निर्णय नहीं करता, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की अपनी परिस्थितियाँ होती हैं। किंतु अपने मन की बात कहूँ तो जब तक शरीर स्वस्थ और समर्थ है, पर्वत की सीढ़ियाँ मुझे प्रार्थना का ही विस्तार लगती हैं। प्रत्येक पग मानो अहंकार को थोड़ा-थोड़ा पीछे छोड़ता हुआ श्रद्धा के और निकट ले जाता है। जिस चित्-शक्ति के मूर्त स्वरूप के दर्शन के लिए हम जा रहे हों, वहाँ तक पहुँचने में यदि तन का थोड़ा श्रम भी लग जाए, तो वह श्रम नहीं, भक्ति का मौन अर्घ्य बन जाता है। वृद्धावस्था आएगी तो उसका भी सम्मान करूँगा, क्योंकि वह काल का विधान है; पर आज जब पैरों में सामर्थ्य है, तब सीढ़ियाँ मुझे रोप-वे से कहीं अधिक आत्मीय प्रतीत होती हैं।

आज मुंडन का बड़ा मुहूर्त था। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो आने वाला प्रत्येक तीसरा व्यक्ति अपने बच्चे का मुंडन कराने ही आया हो। हम प्रातः नौ बजे ही मंदिर की पार्किंग में पहुँच गए थे, किंतु रोप-वे का समय एक से दो बजे का मिला। फिर बीच में दर्शन कुछ समय के लिए बंद हो गए, जिससे और विलंब हुआ। अंततः लगभग चार बजे हमें रोप-वे में बैठने का अवसर मिला और साढ़े चार बजे तक माता के दर्शन सम्पन्न हुए।

                                                                                                                  मुंडन के कुछ दिन उपरांत गोपाल बाग, गोविंदगढ़ में अंशु 


इतनी प्रतीक्षा के कारण अनेक परिवारों ने रोप-वे में जाने से पहले ही अपने बच्चों का मुंडन करवा लिया था। एक क्षण को हमने भी ऐसा करने का विचार किया, किंतु सुनीता ने बड़े सहज भाव से कहा—"हम मुंडन संस्कार के लिए ही आए हैं, इसलिए अंशू पहले अपनी झालर सहित माता के दर्शन करेगा, उसके बाद ही उसके केश उतारे जाएँगे।" उसके इस आग्रह में श्रद्धा की ऐसी सरलता थी कि फिर कोई दूसरा विचार मन में आया ही नहीं। सच ही है, संस्कार केवल कर्मकाण्ड से नहीं, भावना से पूर्ण होते हैं।

दर्शन के पश्चात् अंशू का मुंडन सम्पन्न हुआ। आश्चर्य यह कि उसने तनिक भी रोना नहीं। वह पूरे समय कौतूहल से इधर-उधर देखता रहा। रिंकू ने उसके हाथ में मोबाइल दे दिया और देखते-देखते पूरा संस्कार बड़ी सहजता से संपन्न हो गया।

मुंडन के बाद जब मैंने उसे देखा तो लगा जैसे उसका सौंदर्य और अधिक उज्ज्वल हो उठा हो। उसका निर्मल मस्तक किसी नवोदित चन्द्रमा की शीतल आभा बिखेर रहा था। तभी मन में एक सुंदर कल्पना उभरी—शायद अंशू का जन्म महाशिवरात्रि से एक दिन पूर्व इसलिए हुआ कि वह भगवान शिव के जटाजूट में सुशोभित शशांक की भाँति इस संसार में अपनी निष्कलुष मुस्कान से प्रकाश फैलाए। उस क्षण उसका मुख सचमुच चन्द्र-कला-सा शांत और मोहक लग रहा था।

संस्कार के उपरांत हम सबने साथ बैठकर भोजन किया। पूड़ियाँ गाँव में बनी थीं और सब्ज़ी रीवा में। घर से आया हुआ भोजन केवल स्वाद नहीं देता, वह अपने लोगों का स्नेह भी साथ लेकर आता है। खुले आकाश के नीचे, परिवार के बीच बैठकर किया गया वह साधारण भोजन भी किसी राजभोज से कम नहीं लगा।

संध्या ढलते-ढलते विदा का समय आ गया। लगभग नौ बजे हम रीवा लौट आए। मन की इच्छा थी कि मैं, सुनीता और अंशू गाँव भी चले जाएँ, ताकि पापा-मम्मी का आशीर्वाद अंशू को मिल सके। किंतु छह तारीख को मेरी परीक्षा है। सुनीता ने व्यावहारिक पक्ष सामने रखा—अभी जाने पर दो छुट्टियाँ लेनी पड़ेंगी, और यदि भइया की जमानत हो गई तो गाँव जाना ही होगा।

इसलिए आज की रात एक छोटी-सी प्रार्थना के साथ समाप्त हो रही है। ईश्वर से यही निवेदन है कि पापा शीघ्र पूर्ण स्वस्थ हों, मम्मी प्रसन्न रहें, भइया के जीवन में भी शुभ समाचार आए और परिवार के सभी बिखरे हुए क्षण पुनः एक साथ बैठ सकें। यदि परमात्मा की कृपा से ऐसा हो गया, तो आज का यह संस्कार केवल अंशू के जीवन का ही नहीं, पूरे परिवार के जीवन का भी एक पूर्ण मंगल अध्याय बन जाएगा।

आज का दिन स्मृतियों में चिरस्थायी हो गया। समय के साथ अंशू के सिर पर फिर केश आ जाएँगे, पर आज उसकी निष्कलुष मुस्कान, माता के चरणों में उसका प्रथम संस्कार और परिवार के प्रेम से भरा यह दिन मेरे हृदय की डायरी में सदैव उज्ज्वल बना रहेगा।

- विनय शंकर तिवारी


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03 अगस्त  2026

अंशू और उनका “हॉफ पांडा” 😂

आज अंशू काजल की डिब्बी खोलकर अपनी दायीं आँख से लेकर कान तक पूरा स्याह रंग में रंग चुके थे। 😂
यह करीब 12 बजे दोपहर की बात है।

मैं दाल फ्राई करके चावल चढ़ा रहा था और अंशू बेडरूम में खेल रहे थे। एक बार जाकर देखा तो बड़े आराम से ब्लॉक्स खेल रहे थे। मैं निश्चिंत होकर चावल चढ़ाने चला गया।
लेकिन वापस आया तो माजरा ही बदल चुका था! 😂

अंशू ने पता नहीं कब काजल की डिब्बी ढूँढ़ निकाली और अपनी एक तरफ की शक्ल ऐसी बना ली कि उन्हें देखते ही मेरे मन में पहला ख्याल आया—

“ये हॉफ पांडा कहाँ से आ गया?” 😂🐼


पहले तो उनकी हालत देखकर हँसी आई, फिर सोचा कि इस ऐतिहासिक रूप को कैमरे में कैद कर लेना चाहिए। 😄

फिर कुछ तस्वीरें ली गईं और उसके बाद शुरू हुआ—

अंशू का फेसवॉश कार्यक्रम। 😂

काजल तो साफ हो गया, लेकिन अंशू का वह “हॉफ पांडा” वाला रूप शायद आज की सबसे प्यारी याद बन गया। ❤️
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अगस्त 8, 2026

आज भाभी (प्रमोद की मम्मी) हमारे कमरे में घूमने आई थीं। अंशू उन्हें बहुत अच्छी तरह पहचानते हैं। उन्हें देखते ही अंशू बहुत खुश हो गए और अपने सारे खिलौने उन्हें दिखाने लगे—ABC वाला सेट, अपने बाकी खिलौने और न जाने क्या-क्या।

आज अंशू के चेहरे पर एक अलग ही खुशी थी। उन्होंने बड़ी मम्मी के पैर छुए और उन्हें “बड़ी मम्मी” कहकर बुलाते रहे। जब मैं कमरे में आया तो बड़ी उत्सुकता से मुझे भी बताया—“बड़ी मम्मी आई हैं।”
उन्हें अपने लोगों को पहचानते, उनसे जुड़ते और अपनी छोटी-सी दुनिया उन्हें दिखाते देखकर मन बहुत खुश हुआ। ❤️

कल से अंशू ने एक और नई चीज़ सीख ली है—प्लाई वाली चारपाई से नीचे रखे गद्दे पर अकेले जंप करना।
जंप तो अंशू पहले भी कर लेते थे, लेकिन तब मेरा हाथ पकड़े रहते थे। मैं चाहता था कि धीरे-धीरे वे अपने आप जंप करना सीखें और उनकी physical activity भी बढ़े।

तो मैंने उनसे कहा—“मैं वीडियो बनाता हूँ, तुम जंप करो!”

अंशू ने पहली बार अकेले जंप किया। फिर तुरंत मेरे पास आए और अपना वीडियो देखा। वीडियो देखकर उन्हें इतना मज़ा आया कि फिर क्या था—

“ले जंप… 1, 2, 3… जंप!” 😄


बस फिर अंशू बार-बार जंप करने लगे। अपने किए हुए काम को वीडियो में देखकर उन्हें जो खुशी मिली, वह देखने लायक थी।

बच्चे भी न जाने कितने सरल तरीकों से अपने भीतर का आत्मविश्वास खोज लेते हैं। ❤️

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तीन चार दिन पहले सुबह-सुबह की बात है। अंशू की नींद खुल चुकी थी और वे अपनी मम्मा के साथ लेटे हुए थे। मैं उन्हें लेने के लिए आया। मुझे देखते ही शायद अंशू ने सोचा कि अब तो उठना पड़ेगा।

तभी तपाक से बोले—

“काऊ दुद्धा पियू!” 😂

मतलब, “गाय का दूध पियूँगा।”

अब दूध बनाने के लिए मुझे जाना पड़ेगा, और तब तक अंशू को मम्मा के पास थोड़ी देर और लेटने का समय मिल जाएगा।

चालाकियाँ सीख रहा है, बच्चा! 😀

कभी-कभी उसकी ऐसी छोटी-छोटी तरकीबें देखकर लगता है कि अंशू धीरे-धीरे बड़ा ही नहीं हो रहा, बल्कि अपनी छोटी-सी बुद्धि से हमें भी खूब समझने लगा है।

बचपन की यही छोटी-छोटी बातें तो बाद में सबसे बड़ी यादें बनती हैं। ❤️

- विनय शंकर तिवारी
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09 अगस्त 2026

अंशू और आटे की बारिश 😂

आज अंशू ने थाली से आटा उठाकर फेंकना शुरू कर दिया है। 😂

आटे की बारिश कर रहे हैं अंशू!

पता नहीं आजकल अंशू को क्या-क्या नए प्रयोग सूझ रहे हैं। कभी काजल से हॉफ पांडा बन जाते हैं, तो कभी आटे से पूरा कमरा रंगने की तैयारी! 😂

थाली में रखा आटा अंशू के हाथ लगा और फिर क्या था—उठाया और फेंका… फिर उठाया और फेंका…

बस, अंशू की अपनी ही आटा-वर्षा चल रही थी। 😄

मैं देख रहा था और सोच रहा था कि बच्चे को खेलने के लिए खिलौने चाहिए या घर में रखा सामान ही पर्याप्त है! 😂

अंशू के लिए तो हर चीज़ एक नया खेल है।
और हमारे लिए… हर खेल के बाद एक नया सफाई अभियान! 😂❤️


- विनय शंकर तिवारी 


13 अगस्त 2026 | 09:15 PM

आज जब सुनीता रसोई में रोटी बना रही थी। मैं और अंशु पानी पीने के लिए रसोई में गए।

अंशु ने RO का नल चलाया और गिलास में पानी भरकर एक घूँट पिया। तभी उसकी नजर पास रखे मटके पर पड़ी। मटके को देखकर बड़े सहज भाव से बोला—

“मटक है!!” 😂

हम दोनों हँस पड़े। हमें हँसता देखकर अंशु भी हँसने लगा। उसकी वह मासूम-सी हँसी देखकर हमारी हँसी और बढ़ गई।

फिर मैंने उसे बताया—

“मटक नहीं, मटका।”

मैंने पूछा—
“आ... आ से?”

अंशु ने तुरंत कहा—

“आम!” 😂

बस, इतनी-सी बात थी।

लेकिन बचपन शायद ऐसी ही छोटी-छोटी बातों से बनता है—अधूरे शब्द, अपनी बनाई हुई भाषा, और उन शब्दों पर पूरे घर की हँसी।

आज अंशु ने “मटका” को “मटक” कहा और “आ” से “आम” बताया।
शायद कुछ वर्षों बाद उसे यह बात याद भी न रहे।
इसलिए लिख रहा हूँ—ताकि जब वह बड़ा होकर ‘मेरे आत्मज’ पढ़े, तो अपने उस छोटे-से रूप को इन पन्नों में फिर से पा सके।

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15 अगस्त 2026, शनिवार | 06:00 AM | श्री श्याम छाया भवन, रीवा


कल से अंशु को जुकाम हो गया है।

शायद मौसम के बदलने के कारण हुआ हो, या फिर शाम को फ्रिज से निकला नींबू चाटने के कारण। कल शाम से ही लग रहा था कि अंशु को जुकाम होने वाला है। इसलिए रात में उसे हल्दी वाला दूध भी पिलाया था, लेकिन जुकाम ने आखिर अपना असर दिखा ही दिया।

रात करीब 4 बजे अंशु अचानक उठकर रोने लगे। देखा तो हल्का बुखार भी था। उसे बुखार की दवा दी। नाक भी बंद थी, इसलिए नाक में ड्रॉप डाली। वह ड्रॉप नाक तो खोल देती है, लेकिन डालने के बाद काफी देर तक अंदर जलन भी करती है।

फिर उसके माथे पर, नाक के पास, गले पर, छाती पर और हाथ-पैर के तलवों पर विक्स लगाया। उसके बाद अंशु को गोद में लेकर काफी देर तक थपकाते हुए टहलता रहा। काफी देर बाद जाकर अंशु फिर सो पाया और फिर सुबह 9 बजे तक सोता रहा।

सुबह करीब साढ़े चार बजे से बारिश भी शुरू हो गई थी। अंशु तो मेरे पास सो गया, लेकिन मेरी नींद फिर नहीं आई। सुनीता ने अंशु को सुलाने के साथ थोड़ी-बहुत झपकी ले ली थी, क्योंकि सुबह उसे स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम में हॉस्पिटल भी जाना है । लेकिन मेरी आँखों से नींद जैसे दूर ही हो गई थी। देखते-देखते सुबह हो गई।

अंशु को जुकाम-बुखार तो है, लेकिन उसे गोद में लेकर सुला देने के बाद जब वह चैन से सोता है, तो लगता है जैसे रात की सारी थकान उसी क्षण थोड़ी कम हो गई ।

विनय शंकर तिवारी



नागपंचमी | 17 अगस्त 2026 | 10:27 PM 


आज नागपंचमी है। 

लोग इस दिन नाग देवता के दर्शन को शुभ मानते हैं। नागपंचमी पर सपेरे भी सर्पों को लेकर गली-गली, मोहल्लों-मोहल्लों में घूमते हैं।

आज एक सपेरा हमारी कॉलोनी में भी आया। उसने बीन बजाकर लोगों को इकट्ठा किया। मैं और अंशु भी सर्प को देखने चले गए।

अंशु ने सर्प को देखते ही उसे पहचान लिया और तुरंत बोला—

स्नेक!

मैं मुस्कुरा दिया। 😊


हम दोनों काफी देर तक वहाँ खड़े रहे। सपेरे की बीन की आवाज और बीच-बीच में सर्प की फुफकार सुनते रहे। अंशु बड़े ध्यान से उसे देखता रहा।

कुछ देर बाद हम वापस आ गए।

लेकिन लौटते समय मन में एक बात रह गई। सपेरे ने बताया कि उन्होंने सर्प के विषदंत तोड़ दिए हैं। यह सुनकर मुझे उस सर्प के लिए दुख हुआ।

सोचा—उस पर क्या गुजरी होगी?

सपेरे अपनी सुरक्षा के लिए ऐसा करते होंगे, यह बात समझ में आती है। लेकिन उस सर्प की सुरक्षा का क्या?

सपेरे ने बताया कि कल वे इसे जंगल में छोड़ देंगे।

अच्छी बात है कि कम-से-कम उसे जंगल में छोड़ने की बात तो कही।

लेकिन मन में एक प्रश्न फिर भी रह गया—

विषदंतों के बिना उस कोबरा का जीवन कैसा होगा?

आज अंशु ने बस एक साँप देखा और कहा—“स्नेक।”

लेकिन मेरे लिए आज का वह साँप एक और प्रश्न छोड़ गया—

क्या मनुष्य की सुरक्षा के लिए किसी दूसरे जीव की स्वाभाविक शक्ति छीन लेना उचित है?


नागपंचमी के दिन सपेरा और सर्प को देखते अंशु का वीडियो



                फ़न फैलाए सर्प और बैठा सपेरा ।




18 अगस्त 2022 | रीवा | 08:54 PM 

आज संजय भइया को बेल मिल गई!

उस परम प्रभु, सच्चिदानंद स्वरूप के आशीर्वाद का ही फल है। मन अत्यंत प्रसन्न है, आह्लादित हूँ।
चार वर्षों बाद भइया हमारे साथ होंगे, हमारे बीच होंगे।

अंशू पहली बार अपने बड़े पापा से मिलेगा।
और उससे भी अधिक—भइया पहली बार अंशू को देखेंगे, उसके तीसरे वर्ष में।

पापा भी बहुत प्रसन्न हुए। उनका मन भी आज आनंदित होगा।

मम्मा की तो जैसे आँखें ही तरस रही थीं कि कब आएँ—संजय!

बड़े भइया तो प्रसन्न हैं ही।
उन्होंने ही कोर्ट का पूरा काम संभाला है—वकील से मिलना-जुलना और बाकी आवश्यक कार्य भी।

हम तीनों भी बहुत प्रसन्न हैं।
हालाँकि अंशू को इस बात की पूरी समझ नहीं है।

मैंने उसे बताया कि “बड़े पापा कल आएँगे”, तो वह इस बात से ही प्रसन्न है कि बड़े पापा आ रहे हैं।

अब वह बड़े पापा के रूप में बड़े भइया को सोच रहा है,
या उसे वीडियो कॉल वाले बड़े पापा याद आ गए हैं—

ये तो वही जाने! 😊

लेकिन कल जब सचमुच बड़े पापा उसके सामने होंगे, तब शायद अंशू की आँखों में भी उस रिश्ते की पहचान धीरे-धीरे उतरने लगेगी।

चार वर्षों की दूरी के बाद घर में एक अपना फिर लौट रहा है।

आज मन सचमुच बहुत प्रसन्न है। ❤️


24 अगस्त 2026 | रीवा | 1:05 रात्रि (25 अगस्त)

संजय भइया को देखने हम उनके आने के दूसरे दिन ही गए।

उनके आने के दिन, यानी 19 अगस्त की शाम से ही पूरी रात और अगले दिन दोपहर तक पुरजोर बारिश होती रही। पूरा रीवा शहर तो जलमग्न था ही—हाँ, कहीं कम, कहीं ज्यादा। आसपास के जिले भी इस बारिश में डूब चुके थे। नदियाँ उफान पर थीं, सड़कें डूबी हुई थीं और खेतों में उगी धान तथा अन्य फसलें भी पानी में डूब चुकी थीं।

बारिश लगभग 1 बजे दोपहर में जाकर रुकी।

हम 3 बजे की बस से निकले और लगभग 6:30 बजे शाम तक घर पहुँच गए। बड़े भइया हमें लेने सड़क तक आए थे। हम बस से अतरैला तक ही आए, वहाँ से ऑटो लिया और घर पहुँचे।

अंशु के पहुँचते ही घर जैसे गुलज़ार हो उठा।

इनकी चहल-कदमियों से घर जैसे फिर भर गया।

संजय भइया से भी अंशु ने तुरंत ही पहचान बना ली। बड़े भइया को तो अंशु अपना मानते ही हैं।

एक दिन अंशु सीढ़ी से गिर गए। बहुत साफ बच गए, ज्यादा चोट नहीं लगी।

जैसे ही गिरकर उठे, अपने आप ही बोल पड़े—

“बच गया...”

सब हँसने लगे।

सबको हँसता देखकर अंशु भी हँसने लगे। 😂

बच्चे शायद ऐसे ही होते हैं—अपनी छोटी-सी घटना में भी पूरे घर के लिए हँसी छोड़ जाते हैं।

रविवार की शाम जब वापस आने लगे तो सबका मन भारी था। अंशु की उपस्थिति ने इन कुछ दिनों में सबको जैसे मोह लिया था। जाते-जाते सबके पैर छुए और सबसे विदाई ली। दादी ने 500 रुपये दिए, बड़ी मम्मी ने 100 और बड़े भइया ने 500 रुपये।

जब गाड़ी में बैठने लगे तो घर के लगभग सभी लोग बाहर खड़े थे—विदा करने के लिए।

मन सबका ही भरा हुआ था।

तभी अंशु ने हाथ हिलाते हुए कहा—

“ सबको बाय !” 😂

और सब हँस दिए।

शायद उसे क्या पता था कि जिस क्षण सबकी आँखों में विदाई का भाव था, उसके एक छोटे-से “बाय सबको” ने उस भारी मन में फिर से मुस्कान भर दी।

हम लोग चल दिए—पुनः अपनी कर्मस्थली की ओर।

पीछे रह गया एक भरा-पूरा घर, कुछ दिनों की हँसी, और अंशु की चहल-कदमियों से जीवंत हुई ढेर सारी स्मृतियाँ।


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15 सितंबर 2026                  10 :15 AM 

कैमा रेलवे स्टेशन 

आज अंशु के लिए ट्रेन में एक प्रोजेक्टर कैमरा खरीदा।

दरअसल मैं दिल्ली से वापस आ रहा था। मानिकपुर में ट्रेन में एक खिलौने बेचने वाला आया। उसके पास यह कैमरा देखा तो मुझे अंशु के लिए पसंद आ गया।

बंद लाइट में इस कैमरे से दीवार या फर्श पर जानवरों के चित्र दिखाई देते हैं। इसमें कई तरह की तस्वीरें हैं और बटन दबाने पर एक-एक करके तस्वीरें बदलती रहती हैं।

सोचा, अंशु को अच्छा लगेगा।

अब देखते हैं, जब उसे दूँगा तो उसकी प्रतिक्रिया कैसी रहती है।

कल अंशु प्रमोद के यहाँ गए थे। वहाँ बड़े भइया से भी मुलाकात हुई। फिर अंशु बाइक पर घूमे होंगे, चॉकलेट वगैरह भी खाई ही होगी। बब्बू भइया की लाइसेंस वाली बंदूक लेकर तरह-तरह के पोज में फोटो भी खिंचवाई ।

रात करीब 9 बजे घर वापस आए।

और घर आने की वजह?

पॉटी! 😂

सुनीता बता रही थी कि प्रमोद के यहाँ अंशु ने पॉटी की ही नहीं। जब पॉटी आई तो बोला—

“अपने घर चलो!” 😂

अंशु को शायद अपना घर ही सबसे सुरक्षित और सुविधाजनक जगह लगता है—यहाँ तक कि पॉटी के लिए भी!


                   अंशू की बंदूक के साथ की तस्वीरें 

Sunday, 8 September 2024

विदा छिन्दवाड़ा!

विदा, छिंदवाड़ा!

छिंदवाड़ा मुझे अकस्मात मिला । कोई उम्मीद नहीं थी कि मैं कभी छिंदवाड़ा जाऊॅंगा, पर मिलना था सो मिले । यह जून 2023 था जब मैं यहाँ पहुँचा । पहले पहल उत्सुकता और अनभिज्ञता हर नए शहर में होती है सो हुई, किंतु जब रहने पहुँचा तो शहर ने आकंठ भर लिया ।

छिंदवाड़ा, मध्य प्रदेश का दक्षिणी जिला है जो नागपुर से ठीक उत्तर अवस्थित है । इसका शहरी क्षेत्रफल कम ही है किन्तु है शानदार शहर!
यहाॅं का मौसम, स्वच्छता, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठता यहाॅं की सौंदर्यमणियाॅं हैं । इसे प्रकृति ने अपनी छत्र-छाया में रखा है, ठीक जैसे पचमढ़ी को ।
यद्यपि यहाँ कोई नदी का तटीय क्षेत्र नहीं है, फिर भी स्वाभाविक खुलापन है इस शहर में, जिसके कारण मन आनंदित रहता है । वस्तुत यह खुलापन इस शहर में ही व्याप्त है, इसके मोहल्लों में, सड़कों में, सब्जी मंडी में हर जगह ।

इस शहर का मौसम यहाॅं का कीर्तिस्तंभ है, ग्रीष्म में भी तापमान  38 से 40° सेल्सियस पहुॅंचते ही उमड़ पड़ते हैं बादल और फिर लुढ़का देते हैं तापमान को नीचे ।
यहाॅं कॉफ़ी हाउस का डोसे, श्री राधे टावर के पास वीआईपी रोड की तंदूरी चाय, हरे माधव की फुल्की का स्वाद लाजवाब लगा मुझे । लेकिन हरे माधव का चाट मुझे पसन्द नहीं आया ।
 अनार, किसमिस ,काजू भी भला कोई चाट में डालने की चीज है?
वो लोग जिन्हे खट्टा और तीखा चाट (जैसा चाट बहुधा मिलता है) पसंद है उन्हे ये चाट बेसुआदी ही लगेगा । हाँ...वो लोग जो मीठा खाना खूब पसंद करते हैं उन्हें पसंद होना स्वाभाविक है ।

स्वतंत्रता दिवस के दिन पुलिस ग्राउंड में स्कूली बच्चों ने क्या खूब कार्यक्रम प्रस्तुत किया ! कई कार्यक्रमों में तो दर्शक भाव विभोर हो गए थे । अनुभववादी दार्शनिक कहते हैं कि बच्चों का मन एक कोरा कागज़ ( टेबुला रासा) होता है हम उन्हें जो भी दृष्टि देना चाहें दे सकते हैं, बात सही लगती है ।

हम सिमरिया के हनुमान मंदिर भी गए और नए बन रहे शिव लोक भी ।
किंतु, मैं नहीं जा सका जाम सांवली मंदिर, नहीं देख पाया तामिया की सुन्दर पहाड़ियों की छटा, उनका निभृत एकांत ।
नहीं देख पाया पातालकोट की घाटियों में पुरातन संस्कृतियों, सभ्यताओं का जीता जागता उदाहरण ।
शायद इस यात्रा रूपी जीवन में अकस्मात फिर मिलन हो और तब देख सकूं अनदेखे पहलुओं को । यही बात मुझे जीवन के प्रति निष्ठावान और कौतूहल से भरे रखती है ।
विदा छिंदवाड़ा, तुम भी क्या खूब मिले!
मेरे जीवन में अकस्मात आने के लिए शुक्रिया ।

                      सिमरिया हनुमान जी का मंदिर


Friday, 16 August 2024

डायरी 16 अगस्त 2024 - संकल्प स्वातंत्र्य की सीमितता ।

जब भाग्य में नहीं होता तो मिली वस्तु नहीं मिलती ।यह बात चरितार्थ हुई सुनीता के साथ । उसे वैढ़न से रीवा आने के लिए मैने  फ्लाइट बुक किया था । उसके पास पहली बार फ्लाइट चढ़ने का अवसर था लेकिन भाग्य में नहीं लिखा तो क्योंकर आए?
भाग्य में तो कार से ही आना लिखा था वो भी सोई हुई आधी रात में! भाग्य ऐसे ही काम करता है, जब जो नियत है वही होगा । यही बातें नियति को मान कर चलने में विश्वास दृढ़ करती हैं ।
अगर कोई यह कहे की यह भाग्य नहीं उसके चुनने की स्वतंत्रता या संकल्प स्वातंत्र्य था तो आखिर उसने वही क्यों चुना ? यदि इस प्रश्न पर गौर किया जाए तो फिर वही बात आ जाती है और जो प्रकट होता है वह यही कि परिस्थितियाँ ही ऐसी बनी । उसी दिन उसका ‘नेउरी नमय’ का व्रत फंसना, उसकी रक्षाबंधन तक रुकने की इच्छा बलवती होना आदि.. परंतु रक्षाबंधन मायके में मानना कहां लिखा था वो तो लिखा था गाँव में, सो BMO का आदेश आ गया और आना पड़ा । यहीं मानव का संकल्प स्वातंत्र्य की सीमितता का बोध होता है ।

विनय
16 अगस्त 2024

Monday, 11 March 2024

डायरी : 11 मार्च 2024

मैं अभी वरदान हॉस्पिटल रीवा में हूॅं यहाॅं एक परिवार में अभी-अभी बालक का जन्म हुआ है ।
सब खुश हैं, बच्चे का चाचा जो कि अभी लगभग 20 वर्ष का होगा, उसका नाम किसन है । वो अभी अपनी माॅं को फोन में बता रहा था की लल्ला हुआ!
बड़ी उमंग से बता रहा था!
वो बहुत प्रसन्न है ।
मैंने कहा - चाचा बन गए, बधाई हो! कहने लगा, सबको मिठाई खिलाऊॅंगा, आपको तो ढूॅंढ़ कर खिलाऊॅंगा! 
भारतीय जनमानस में यही खास बात है जो हमें अपरिचित होते हुए भी जोड़े रखती है । 


- विनय शंकर तिवारी
  11 मार्च, 2024
  वरदान हॉस्पिटल, रीवा

इत्यलम् (मेरी डायरी)

13 सितंबर 2026 प्रसंग : एक Facebook पोस्ट से शुरू हुई स्मृति, AI और वास्तविकता पर छोटी-सी परिचर्चा आज Facebook पर मेरे एक Phil...