इस डायरी में, कुछ स्मृतियाँ संजोकर रखना चाहता हूँ अंशुल के लिए, ताकि जब वो बड़ा हो और उसे स्वयं को जानने की अभीप्सा हो तो अपने अतीत की ओर मुड़ सके और अतीत को शब्दों में जीते हुए अपने वर्तमान को सुनिश्चित कर सके । स्वयं को पहचान कर अपना मार्ग प्रशस्त कर सके ।
दिनाँक : 27 नवंबर,2021
अंशू ननिहाल में हैं । आज अंशु से वीडियो कॉल में बात हुई तो मुझे देख कर रोने लगा। । मेरे पास आना चाह रहा था, क्योंकि इधर उसका विशेष स्नेह हो गया है मुझसे । इसका कारण यह है की उसे मैं गोद में लेके घुमाता हूं । उसे घूमना, तरह तरह की चीजें देखना पसंद है । मेरे साथ वह थोड़ी शरारत भी कर सकता था जैसे फ्रिज कवर को खींचना, जाली से प्लेट, कटोरी अपने से लेले लेना आदि..
उस दिन जब मैं किचेन में प्यूरी बना रहा था उसके लिए तब, पहली बार अंशू क्रॉलिंग करते हुए रूम से किचेन तक का सफर स्वयं तय किया ! यह दिन था 20 नवंबर 2024 ।
यह दिन ऐतिहासिक था उसके लिए । अभी तक एक दो कदम ही क्रोलिंग करता था । अब वह दोनो कमरों और किचन में तो पहुंचता ही रहता है ।
फर्श की टाइल्स काफी ठंडी रहती है इसलिए हमें उसे दस्ताने पहनाने पड़ते हैं जो उसे अच्छे नहीं लगते, मुझे भी अच्छा नहीं लगता उसका ‘अच्छा न लगना’ ।
तुम्हारे स्वास्थ्य के लिए यह आवश्यक है इसलिए तुम्हे पहनना ही होगा मेरे आत्मज ।
अंशू शायद समझ गया है कि इसे पहनना ही होगा ।
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दिनाँक 09/12/2024
अंशू के लिए आज वॉकर लाया । अंशू देखकर बहुत खुश हुआ ।
मैं वॉकर के पहिए साज रहा था और अंशू उन्हें निगरानी करते हुए घुमा-घुमा कर देख रहा था । और सजने के बाद तो सवारी का लुत्फ खूब उठाया अंशू ने ।
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दिनाँक 12/12/2024
अंशू अब वॉकर को अपने पैर से चलाने लगा है । दोनो कमरे, किचन और बालकनी वॉकर के पहिए की गड़गड़ाहट से गुलजार रहती है । उसे चलाना अच्छा लगने लगा है, उस समय उसकी मुस्कुराहट देखते बनती है ।
अब मुझे भी थोड़ा आराम मिलने लगा है । क्योंकि गोद में लिए रहने का टाइम कम हो गया है । दोपहर मे अंशू के जगने के बाद छत ले जाता हूं जिससे दो कार्य सिद्ध होते हैं - पहला तो यह की धूप लगने लगती है और दूसरा अंशू क्रालिंग कर लेते हैं छत में ।
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दिनाँक 1 मार्च,2025
प्रिय आत्मज के लिए -
अंशू आज अपने ननिहाल चला गया मौसी की सगाई में ।
सुबह उठा तो ठीक था किंतु जब मुझे न देखा और घर भी बदला सा लगा तो रोने लगा ।
सुनीता बताई कि किसी तरह रोना बंद किया । फिर वीडियो कॉल में जैसे ही मुझे देखा फिर बहुत रोने लगा ।
परसों सुबह जाऊंगा तो निस्संदेह बहुत खुश होगा!
और मैं यहाँ चाय पीते हुए अपने छज्जे में बैठे कबूतरों और गौरैया के कृत्यों को देख कर कहने लगा -
ओ कबूतरों!
तुम्हारा दृष्टा चला गया ननिहाल।
जो देखता था
तुम्हारी क्रियाओं को कौतूहल से
आश्चर्य करता और खिलखिलाता
तुम्हारी उड़ान से ।
ओ गौरैया!
तुम्हारी फुर्र सी उड़ान गुदगुदाती थी उसे
तुम्हारे तिनका उठाने से सीखता है जो कर्म ।
वह फिर आएगा
तुम्हारी अठखेलियों पर खिलखिलाने
तुम्हारे साथ जीवन का उत्सव मनाने ।
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दिनाँक 19 जुलाई 2025,शनिवार
समयभाव के कारण बहुत दिनों से लिख नहीं पाया । अंशुल अब दीवाल पकड़ कर या तीन पहिए वाली गाड़ी (जो इनके नाना ने भेजवाया है ) को पकड़ कर चलने लगे हैं । क्रोलिंग तो रफ़्तार से करते हैं ।
अब अंशू के प्राइवेट लैंग्वेज की शुरुआत भी हो चुकी है ।
अब आपके मन में प्रश्न उठेगा कि प्राइवेट लैंग्वेज क्या है ? तो बच्चों की प्राइवेट लैंग्वेज (Private Language) का अर्थ होता है वह भाषा या संकेत प्रणाली जो बच्चे खुद अपने लिए विकसित करते हैं, और जिसे केवल वही समझते हैं — अन्य लोग नहीं।
विकासात्मक मनोविज्ञान (Developmental Psychology) मानता है कि बच्चे जब बहुत छोटे होते हैं, तो वे बोलने से पहले या बोलना सीखते समय कुछ विशेष ध्वनियाँ, इशारे या शब्दों का प्रयोग करते हैं जो दूसरों को समझ में नहीं आता। यह उनकी प्रारंभिक संप्रेषण प्रणाली होती है।
फिर धीरे-धीरे अपने परिवेश की भाषा सीखने लगते हैं और फिर आहिस्ता-आहिस्ता अपनी प्राइवेट लैंग्वेज की अलविदा कर देते हैं ।
अंशू के लिए एक बिजी क्यूब और ज्योमेट्रिकल शेप मैचिंग ऑर्डर किया हूँ ताकि इनकी मोटर स्किल एवं Eye & Hand कॉन्टैक्ट अच्छा हो सके ।
दो तीन दिन पहले पापा मम्मी आए थे तो अंशुल धीरे - धीरे पहचानने लगे थे दो तीन दिन ही रुके वो लोग । आखिरी दिन अंशू पापा की यानि अपने बब्बा की गोद में गए ।
ऐसे ही जब मम्मी ( अंशू की नानी) आई थीं एक डेढ़ महीना पहले तो अंशू बहुत रम गए थे नानी से । नानी अंशू को घुमा- घुमा के खिलाती थीं, साथ में घूमती थीं । फिर चली गईं । उन्हें अंशुल एक दो दिन मिस किए फिर पुनश्च पहले जैसे हो गए।
उनके आने के बाद अंशू थोड़ा मोटे हो गए थे पर अभी जुकाम सर्दी में दो तीन दिन एक एक चम्मच खाए तो स्वास्थ्य थोड़ा डाउन हो गया है । फिलहाल अब स्वस्थ हैं अंशुल ।
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