Monday, 30 July 2018

इफ ट्रुथ बी टोल्ड



परमहंस योगानन्द कृत 'योगी कथामृत' और आंशिक रूप से रॉबिन शर्मा की ' द मॉन्क सोल्ड हिज फेरारी ' ( सन्यासी जिसने अपनी संपत्ति बेंच दी ) के बाद अगर कोई पुस्तक मुझे पराभौतिक रस का रसास्वादन कराई है तो वह है ओम स्वामी कृत " इफ ट्रुथ बी टोल्ड " ( यदि सत्य कहूँ तो..) ।
इत्तेफाकन एक ही पुस्तक बची थी यह उस दुकान में, मानो मेरे लिए ही रखी थी ।
      यह एक गृहस्थ व्यक्ति के सन्यस्त होने की कहानी है, मूलतः यह संस्मरण है जिसका आरम्भ वाराणसी में किसी शांतिप्रिय घाट खोजने से होता है जहाँ एकांत मिल सके , जो लेखक को नहीं मिलते ।
कदाचित ओम स्वामी प्रयाग आए होते तो उन्हें मन पसंद घाट मिलता "राम घाट" मेरा स्वयं प्रिय घाट है जहाँ बड़ी आसानी से ध्यान लगाया जा सकता है , माँ गंगा को महसूस किया जा सकता है अपने अंदर ।

                   निश्चित ही मनुष्य के विचित्र प्रजाति है क्योंकि हमें जो भी प्राप्त होता है हम उससे भिन्न प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं । इस संस्मरण का एक गद्यांश मुझे जँचा जब वो तैलंग स्वामी के मठ जाते हैं तो वहाँ उनके शिष्य जो संभवतः उनका स्थान ले चुके थे उन्होंने स्वामी जी को कहा कि तुम्हें सामान्य जीवन जीना चाहिए तिस पर स्वामी जी का तर्क कि ' सामान्य जैसी कोई चीज कहाँ होती है ? जो एक कि दृष्टि से सामान्य होता है वही दूसरे की दृष्टि से अत्यंत असामान्य हो जाता है ।
एक योगी यह समझता है कि संसार असामान्य है और लोग खाते-पीते ,मैथुन करते जानवरों जैसा जीवन व्यतीत करते हैं, वहीं संसार सोचता है कि योगी मूर्ख होते हैं जो कुछ भी न करते हुए आप जीवन यूँ ही बिता देते हैं ।
                         मैं यहां दो शब्दों का भेद करना चाहूँगा प्रथम 'त्यागना' द्वितीय ' छोड़ना' ।
त्यागना एक ऐसी अवस्था है जब आप उक्त विषय/वस्तु से विरक्त हो जाते हैं अर्थात आपकी इन्द्रियाँ उसके प्रति अनासक्त हो जाती हैं यह पुकार आपके अन्तरनभ से आती है, जबकि छोड़ना एक मानसिक क्रिया है यह इसलिए होती है क्योंकि वह आपकी इंद्रियानुकूल नहीं होती ।
इसमें भीतर से एक लगाव जुड़ा होता है जो समय आने पर उभर आता है और आप उसके प्रति आतुरता से भर जाते हैं ।

 यहाँ स्वामी ओम ने अपना घर त्यागा था , सन्यासी बनने की चाह उनके भीतर से उठी थी यह संसार से विमुख होना या भाग जाना न था ।
यह अपने दायित्वों से विमुख होना न था ।

           अगर आप एक सन्यासी के जीवन की यात्रा करना चाहते हैं तो पढ़ डालिए ये किताब ।
निश्चित ही एक आनंदमयी रस से स्वयं को पूरित पाएँगे आप पुस्तकान्त में ।

© विनय एस तिवारी




Thursday, 5 July 2018

याज्ञक (भाग-2)

..गुरुदेव तब से याज्ञक के मन को पढ़ रहे थे जब से वह ध्यान में बैठा था ।
उसकी अनुभूति भारद्वाज मुनि ने भी महसूस की थी इसीलिए याज्ञक के संभावित प्रश्नों के उत्तर की खोज में ध्यानमग्न हो गए ।
हे गुरुदेव ! मैंने आपके कहे अनुसार गंगा की चंचलता , पवित्रता और आवृत्ति को महसूस किया है, मुझे दिखाई दिया है ' जंगलों के बीच एक गाँव कुछ मृद्भाण्ड और एक लड़की की आवाज़ ।
" क्या मेरी नियति ने मुझे यही उपलब्धि लिखी है..?
क्या मेरी मंजिल यही है..?" -- यह कहकर याज्ञक विस्मयकारी नेत्रों से गुरुदेव की ओर देखा ।
तब ऋषिश्रेष्ठ ने आंखें खोलते हुए कहा. " मूल्य मंज़िल का या मिलने वाली उपलब्धि का नहीं होता वत्स, मूल्य रास्तों का है..मूल्य यात्राओं का है.., यात्राओं से मिलने वाले अनुभव का है, उपलब्धि तो प्रतीक मात्र है उन यात्राओं से पार होने का ।"
".. तो क्या मुझे भी यात्रा करनी चाहिए ?" - गुरुदेव के संकेत को समझते हुए याज्ञक ने पूँछा ।
" निःसंदेह ! तुम देवप्रयाग जाओ वहाँ मेरे गुरुभाई देवयादृ के आश्रम में जाना , वही तुम्हारी नियति बताएँगे ।
" पंद्रह दिन बाद यात्रियों का एक दल अयोध्या तक जाएगा उसके बाद आगे की यात्रा तुम्हें अकेले ही तय करनी होगी ।
गुरुदेव ने कहा ।

                सुबह सरयू तट पर बैठा याज्ञक ध्यानमग्न था वह अपनी नियति एक एकात्म स्थापित करना चाहता था ।
लेकिन इसबार उसने महसूस किया कि वह और उसका कबीला बहा जा रहा है.. लोग बहे जा रहे है हर जगह कोलाहल व्याप्त है.., प्रलय की इस घोर गर्जना से वह घबरा कर आंखें खोल लिया , लेकिन सरयू तट पर सब शांत था,
फिर यह क्या था..?  इस वीभत्स दृश्य से उसकी नाभि अस्त-व्यस्त हो गई , याज्ञक ने महसूस किया कि गुरुदेव ठीक कहते थे कि अगर अचानक कुछ वीभत्स हो तो जो असंभावित हो तो सबसे पहले हमारी नाभि अस्त-व्यस्त होती है ।
क्या वाकई यह पूर्व जन्म का यादांश है..? वह जानता है कि यह जानने के लिए उसे जाना होगा देवप्रयाग,.. जहाँ देवयादृ ,उनकी यज्ञपुत्री वैशाली तथा नियति इंतज़ार कर रहे हैं याज्ञक का । और याज्ञक चल पड़ता है इस कौतूहल भरी दुनियाँ में ।
(क्रमशः)
-- विनय एस तिवारी






इत्यलम् (मेरी डायरी)

13 सितंबर 2026 प्रसंग : एक Facebook पोस्ट से शुरू हुई स्मृति, AI और वास्तविकता पर छोटी-सी परिचर्चा आज Facebook पर मेरे एक Phil...