Wednesday, 25 March 2020

ग्रीष्म की साँझ


                                    (गर्मी की एक साँझ)
                     

मेरे लिए, गर्मियों की शामें अक्सर उदासीनता से भरी होती हैं ।
यह गर्मियों की साँझ ही है , जब मेरे लिए एकांत की चाहना सर्वाधिक प्रबल होती है ।
साँझ की रक्तवर्णी रंगीयता, इसके साथ आकाश की अभेद्य आकाशीय-नीलिमा, और हर तरफ सूखे-वृक्ष, जिनकी हरित-पत्तियों को तपन ने भष्म कर दिया है, इन्हें देख कर जाने क्यों मन अवसाद से भर जाता है! जबकि हम जानते हैं, कि कल सूरज फिर निकलेगा, फिर घाम होगा और फिर साँझ ।
नियति का यह क्रम नियत है । जाने क्यों, सूर्य का विदा होना, अपने साथ उत्सुकता और उन्मुक्तता को भी साथ ले जाता है! और भर देता है एक अज्ञात व्याकुलता से मुझे ।

“मैं देख रहा हूँ, सूर्य-अस्त होते पश्चिम में,
उभर रहा वैराग्य अचानक, मन-अवसादी!
हाय! विभा तेरा जाना, यूँ तोड़ रहा है,
ज्यों, दिनेश मेरा अंतस ही निचोड़ रहा है ।”

ये सच है, कि रात इस धरित्री को एक नए रंग में रँग देती है, पर इसका आरम्भ तो साँझ से ही होता है न!
क्या यह रंगीयता अपने साथ असारता का भी बोध लाती है?
क्या यह विषाद, वस्तुओं को स्पष्ट न देख पाने की व्यथा का परिणाम है?
क्या मानव ने दिन को इतना स्वीकार लिया है, कि दिन के प्रकाश का विदा होना, उसके स्वयं के अंश का विदा होना हो जाता है?
या फिर इसलिए, कि यह प्रतीक है मृत्यु का, और मृत्यु की तो सहधर्मिणी है ही उदासी ।
                      ग्रीष्म की एक साँझ की उदासी को जीते हुए एक शख्स

इस उदासी के दर्द ने ही तो सिखलाया है मुझे, कि जब, मुझ जैसे व्यक्ति से प्रकाश का विदा होना, विषाद और एकाकी होने का आरम्भ होना होता है, तो कदाचित किसी तारे का टूटना भला कितना पीड़ाकारी होता होगा! क्योंकि वह तो उसका अंश है ही ।
या जब कोई तारा, जिस दिन अपने समस्त प्रकाश को अलविदा कहता होगा, वह दारुण्य दृश्य कितना मर्मस्पर्शी और रुदन से भरा होता होगा! कौन जाने?
क्या शायद इसीलिए, नियति ने मानव को पहला उपहार रुदन दिया है?

जाने क्या रिश्ता है इन रश्मियों से मेरा?
कि इनका जाना, मुझे आकुलता से भर देता है!
कि जिसके बिना भर जाता हूँ मैं विषाद से और उभर आता है एक अजीब और अनजान सा खालीपन। जाने क्यों?

I want to die while you love me - Douglas Johnson

                  (  पेंटिंग: इलाहाबाद विश्वविद्यालय के बी.एफ.ए. फाइन आर्ट के एक स्टूडेंट द्वारा)


मैं तुम्हारे प्यार में रह प्राण खोना चाहती हूँ,
जबकि मेरी रूपता तुममें बसी हो,
और जबकी होंठ में मेरे हँसी हो,
और मेरे केश में आभा बसी हो ।

मैं तुम्हारे प्यार में रह प्राण खोना चाहती हूँ,
और अब भी बिस्तरों में जो मिले थे!
हूँ संभाले सब तुम्हारे उग्र चुम्बन,
उस वक्त के स्नेह ख़ातिर, जब मरूँ मैं ।

मैं तुम्हारे प्यार में रह प्राण खोना चाहती हूँ,
ओह्ह! ऐसा कौन जीवन चाहता है?
प्रेम में जब शेष भी कुछ न बचा हो,
माँगने को, और न ही सौंपने को ।

मैं तुम्हारे प्यार में रह प्राण खोना चाहती हूँ,
कभी भी-जरा सा भी नहीं,
इस पूर्णता के दिवस की गरिमा-
देखो! न ही मद्धम पड़े या रुके कहीं ।

- Georgia Douglas Johnson
हिन्दी अनुवाद: विनय एस तिवारी

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