Monday, 7 December 2020

ब्रह्मचिन्ता

ब्रह्मचिन्ता - योग का एक अलभ्य ग्रन्थ


योग का वह ग्रन्थ, जिसके बारे में केवल पता चलता है पॉल ब्रन्टन की पुस्तक ‛गुप्त भारत के रहस्य' से ।
बनारस में एक बड़े ज्योतिषी हुए थे सुधी बाबू । ऐसे ज्योतिषी जिनके पास एक आध्यात्मिक शक्ति भी थी, समाधि भी ।
सुधी बाबू यानि श्री सुधीर रंजन ।
पॉल ब्रंटन के अनुसार, सुधी बाबू बताते हैं कि ‛ब्रह्मचिन्ता’ का अस्तित्व गुप्त रखा गया तथा इस ग्रन्थ का आविर्भाव तिब्बत में हुआ ।
वहाँ इसे पवित्र समझा गया और इसका अध्ययन उस वक्त केवल गिने चुने लोग ही करते थे ।
ऐसा कहा जाता है कि भृगु महराज ने हजारों वर्ष पूर्व इस महाग्रंथ की रचना की थी । 
भृगु, ब्रह्मा जी के मानस पुत्र थे । 
ये एक महान ज्योतिषी थे जिन्होंने ‛भृगुसंहिता’ की रचना की जो आज भी लभ्य है तथा इसकी पांडुलिपि नेपाल में उपलब्ध है । 
..तो इन्हीं भृगु जी के प्रपौत्र भगवान परशुराम थे और इन्हीं भृगु जी ने ‛ब्रह्मचिन्ता’ की भी रचना की ।
सुधी बाबू के अनुसार, उनके समय में भी यह योगमार्ग अत्यंत विलक्षण और अलभ्य होने के कारण नवीन भी माना जाता था।

ब्रह्मचिन्ता का अभिप्राय है ब्रह्म के बारे में चिन्तन करना, मनन करना यानी ब्रह्म जिज्ञासा ।
कहते हैं ‛ब्रह्मचिन्ता’ में बताए मार्ग का अनुसरण करने से गुरु तक की आवश्यकता नहीं रह जाती, स्वयं आत्मा पथ प्रशस्त करती है ।
पॉल ब्रन्टन के अनुसार, सुधी बाबू ने उन्हें इस मार्ग की दीक्षा दी थी।
ब्रन्टन बताते हैं कि इस मार्ग में कई किस्म की योग पद्धतियाँ हैं जिनका उद्देश्य ‛आत्मभाव’ की दशा पैदा करना है। इसमें सबसे मुख्य मार्ग पर आरूढ़ होने पर दस प्रमुख सोपानों (सीढ़ियों) को पार करना होगा, तब जाकर मिलेगा ‛सच्चिदानन्द’ का अमर रस । जिसे ही तो ‘रसो वै सः’ कहा गया है ।
काश! ऐसे अनेक महाग्रंथों का व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ होता तो हमारे जीवन स्तर बहुत ऊपर उठ गए होते! आज भी हम इनके प्रति कब इच्छुक होंगे, कब प्रयासरत होंगे, कौन जाने?
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