एक रात में, जब मैं भी था.. और तुम भी थी
उस दिन अपने घर के सामने वाले पार्क में देर रात तक बैठे थे हम-दोनों । कदाचित पता होता ये हमारी आखिरी मुलाकात है..! जब देर रात घरों की रोशनी बुझ चुकी थी तब चाँदनी पूरे शहर के साथ अपने पार्क में भी दस्तक दे चुकी थी और मन के कहीं आखिरी छोर में दबा विषाद उभर आया था । चाँदी सी फैली ये चाँदनी तारों के अस्तित्व को ओझल न कर सकी थी.. । उस दिन सितारों की ओर देखते हुए तुमने कहा था, ' ये वही आसमान है जो कई अरब साल से है लेकिन इसकी ज़द में आने वाले कितने सितारे टूट चुके थे और न जाने कितने सितारे उन सितारों की जगह ले चुके थे । लेकिन इनमें होने वाली बदलाहट हम नहीं देख सकते न..?' इस गतिशील और नश्वर संसार में कदाचित हम जिस परमाणु से बने हैं वो उन टूटे सितारों का हिस्सा हो ! ' हाँ..। मैने गहरी सांस लेते हुए कहा । और क्या पता, हम दोनों का अस्तित्व एक ही पदार्थ से हुआ हो ! तभी तो हम एक दूसरे के करीब हैं..एक दूसरे के अंतर्भाव को समझ पा रहे हैं । तुम्हें पता है...? बहुधा हम जो देखते हैं उसे ही सच मानते हैं , लेकिन जरूरी नहीं कि हम जो देख रहे हैं वही सच हो । जैसे ऊपर सितारो...