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उस दिन की तरह


हर साल की तरह आज भी ऑफिस क्रिसमस पर बन्द थी सो आज आठ बजे सो के उठा जितनी गहरी नींद सुबह के तीन घंटे लगती है अच्छा थका होने पर भी उतनी अच्छी नींद नहीं लगती...
अगर खिड़की से सूरज कमरे में दाखिल न होता तो शायद दस या ग्यारह बज गए होते.... खैर..!अब फ्रेश हो कर चाय बनाने जा रहा हूँ...खाना बनाने के लिए तो मैंने बाई लगाई है..
लेकिन चाय मैं सिर्फ अपने हाँथ की बनाई पीता हूँ या फिर मम्मी की...। हाँ..एक समय था जब एक और हाँथ की बनाई चाय मैं पीता था..। धीरे धीरे चाय खौल कर लाल हो रही थी..
कि अचानक डोर वेल बजने लगी....
कम्बख्त कौन आ टपका...! मैं बुदबुदाते हुए दरवाजे की और लपका ।
सर व्योमेश चंद्र आप ही हैं..?
हाँ...'
आपका लेटर आया है यहाँ साइन कर दीजिए..

.......तो कॉलेज में एल्युमिनी मीट है...इसी तीस तारीख को..?

मैं व्हाट्सएप् के कॉलेज फ्रेंड्स ग्रुप में देखने लगा की कौन कौन आ रहे हैं.. 😶😶

ओ तेरी....!! चाय तो पूरी छनक गई होगी..
कहते कहते मैं दौड़ा...

बैठे बैठे मैं एक एक चेहरे को याद कर रहा था.. पुनीत जो खुद से लंबी गर्लफ्रेंड बनाया था...
ए से शुरू होने वाले नाम गिन रहा 'अभी'...उसके पीछे तो लड़कियाँ मर मिटने को तैयार रहती थीं..
क्योकि वो बहुत हैंडसम सा और शेरो -शायरी का शौक़ीन..
शायरी मैं भी करता था लेकिन लड़कियों से घुला मिला नहीं था ..या यूँ कहूँ की मेरी शायरी दोस्तों तक सीमित थी..
दूसरी बात यह थी की मैं खूबसूरती को देखने वालों में से हूँ..
उसे छूना या अपनाना नहीं चाहता था..
मेरे लिए ताज़महल और खूबसूरत चेहरा एक बराबर थे...

लेकिन कुछ ही दिनों बाद मैं अपने इस सिद्धांत पर नहीं टिक पाया...
निष्ठा.....!!!! क्या वो भी आएगी..????
ये सवाल मेरे अंदर के उभरे खालीपन ने मुझसे पूँछा..।

                     चार साल पहले

उस दिन वेलकम पार्टी में मैं लगभग आधे घंटे लेट पहुंचा..
लगभग दौड़ता सा.. निराला सभागार पहुँचा ।
अरे ! ये तो खाली पड़ा है..कोई दिख नहीं रहा..
मैं हाँफते हुए सोच रहा था और बैठ गया..
 कुछ देर बाद मैं उठ कर ग्राउंड की तरफ गया...

ओह्हो.. तो महफ़िल यहाँ सजी है...!
मैंने कहा..
हे ड्यूड ! कहाँ भूतनी से घूम रहे..शुभम मेरी ओर आते हुए कहा ।
चल एक एक पैग लेते हैं...उसने मेरे कंधे पर हाँथ रखते हुए कहा..
नहीं यार.. तू पी ले मैं नहीं पिऊँगा.. मैं ऋषि सर से मिल लेता हूँ..
ऋषि सर हमारे सीनियर थे..
क्या सर ...बताओ ये जाम को मना कर रहा.. शुभम ने ऋषि सर से कहा ।
क्यों भाई..व्योमेश शैम्पेन को शराब कह कर उसकी बेज्जती मत करो । उन्होंने डायलॉग मारा
मैंने देखा एक बड़ी  सी टंकी फुल थी..व्हिस्की से ।
चलते चलते मैं अपने जेब से निकाल कर घड़ी पहनने लगा..
घड़ी निकलने के चक्कर में कुछ पैसे और कागज़ ज़मीन पर गिर गए..और हवा से कुछ दूर निकल गए...उन दिनों मैं वॉलेट लेकर नहीं चलता था..था ही मैं बे-तरतीब सा ।
"तुम कितने लापरवाह इंसान हो..मैं झुक कर अपना पैसा उठा रहा था तभी ये मीठी आवाज़ सुनाई दी ।
देखा तो मेरा पचास को नोट उसके चार इंच ऊँची सेंडल के पास पड़ा था ।
पता नहीं ये लड़कियां पाँच मंजिल ऊँची सैंडिल क्यों पहनती हैं..!! मैंने उसे देख कर कहा...
फिर मैं उसकी तरफ देख कर बेशर्मी से मुकुरा दिया..☺।
मेरी मुस्कुराहट बंध सी गई..मैं लगातार उसकी ओर देख रहा था..उसकी आँखे काली काली काफी बड़ी लग रही थीं..कान में नीचे व्ही(V) आकार में लड़ी लगी बालियाँ... जिन्हें देख कर मैं  V फॉर व्योमेश के लड्डू फोड़ने लगा था ..उसके होंठ जो काफ़ी चमक रहे थे.शायद होंठो पे कुछ चमकीला लगाई थी ।सफ़ेद टी-शर्ट के ऊपर ब्लैक कोट और क्रीमी टाउज़र पहन रखा था उसने ..और इस ड्रेस में खुले बाल.. जिनमें आधे दाएं कंधे से आगे की ओर की थी.. और चार चाँद लगा रहे थे ।
सच कहूं तो बला की खूबसूरत लग रही थी..
जैसे कोई आसमानी हूर हो ।
                   
                                  #आज फिर
 
            मैं इस बीते कल से बाहर निकला... आज फिर व्हिस्की पीने का मन करने लगा...
 मेरे सामने व्हिस्की की दो बोतलें रखी हैं..मैं और शुभम दोनों पुणे के कोरेगाँव पार्क में बैठे हैं..
सामने दो बॉटल व्हिस्की की खाली पड़ी हैं...मैं बैठा हूँ कुर्सी में सिर रखे...शुभम को बाथरूम गए बहुत देर हो गया लगता है..
मेरी हालत भी उठने की नहीं है फिर भी मैं बाथरूम तक गया ..
ये क्या...! तू अभी तक सुसु कर रहा है..? -मैं हैरान होते हुए पूँछा ।

यार कुछ कुछ देर में फिर लग आती है..कौन आए वहां से बार बार..
मैं हँसने लगा बहुत जोर से..
यहाँ मेरी लगी पड़ी है और एक तू है कि हँस रहा है...? शुभम भी हँसते हुए पूँछ रहा था ।

  क्रमशः
©Vinay S Tiwari

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