Thursday, 30 July 2020

जब रात्रि बिखेरती है दूब की नोक पर मोती





स की बूँद मुझे सबसे प्रिय लगती है, दूब की नोक पर । तिस पर मध्य रात्रि में पूर्णिमा की चाँदनी, जिसका प्रकाश ओस की बूँदों पर पड़ते ही प्रकीर्णित होता है, और बिखेर जाता है मोतियों सी चमक । मैंने तो जब घास पर ओस की बूँदों को देखा.., तो अनायास ही कह उठा  ‛मोतियों का गाँव!’

जैसे नैसर्ग ने दूब की नोक पर सजाई हो ओस के दीपों की वर्णमाला । जिसे कोई प्रकृति खोजी, कवि या दार्शनिक ही पढ़ सकता है, और बुन सकता है इस वर्णमाला से अनन्त किताबें । वो किताबें जो अक्षर से विहीन हों, क्योंकि भाषा की सीमा तो इस संसार तक सीमित है । इसके ऊपर की सत्ताओं को ‛अनुभव’ किया जा सकता है मात्र ।

ये दीपक प्रकृति का सौंदर्य है,श्रृंगार है धरित्री का । जिसे मात्र अपने अन्वेषियों के लिए ही सजाती हैं वसुंधरा । जैसे ललनाएँ सजती हैं, अपने सौंदर्य के अन्वेषी के लिए, अपने प्रियतम के लिए,
या जैसे मूर्तियाँ अपने शिल्पकार के लिए, जो उकेरता है उनका सौंदर्य । कोई छैनी से, तो कोई शब्दों से ।
इसी में इनकी विराटता है, इसी में इनकी श्रेष्ठता है, इसी में इनका सौंदर्य है ।

-- विनय एस तिवारी




Saturday, 11 July 2020

स्नेह और वैराग्य की सीमा रेखा उतनी ही पतली है जितनी आकर्षण और प्रेम की या जितनी क्रूरता और यातना की





        
                   [ तस्वीर : नृत्य में मग्न बौद्ध भिक्षु ]
            

" स्नेह और वैराग्य की सीमा रेखा उतनी ही पतली है जितनी आकर्षण और प्रेम की या जितनी क्रूरता और यातना की ।"

...क्योंकि स्नेह से तटस्थ (ऑब्जेक्टिव) हो जाना ही तो वैराग्य है । स्नेह तो वासना से लगभग मुक्त होता है लेकिन फिर भी मोह व्याप्त तो रहता ही है और जब मोह भी विदा हो जाता है तब वैराग्य का जन्म होता है । 
वैराग्य संसार से भागना कदाचित भी नहीं है, जैसा कि कृष्ण कहते हैं, आचार्य रजनीश कहते हैं, बुद्ध कहते हैं ।
वैराग्य तो कर्म के लिए कर्म करना है, कर्ता भाव से मुक्त होना है ।

जैसे भक्ति और प्रपत्ति में,
भक्ति में भक्त समर्पित रहता है किंतु उसमें परमात्मा से एक आनंद की चाह बनी रहती है किंतु वह चाह समाप्त हो जाती है तब वो अवस्था कहलाती है प्रपत्ति ।
ठीक ऐसे प्रेम और स्नेह में,  प्रेम वासनाओं के व्याप्ति की अवस्था है किंतु स्नेह, जब प्रेम में वासनाएँ क्षीण हो जाएं ।
और जब वासनाएँ शून्य हो जाएँ, तब उत्पन्न होता है वैराग्य ।

वहीं दूसरी ओर, क्रूरता और यातना में भी ऐसा ही फ़र्क़ है, 
क्रूरता अन्तरागत है, कोई क्रूर होता है, किन्तु यातनाएँ तो मानवीय गुण हैं ।
जब क्रूरता में वासना समाहित हो जाती है, तब यातना का उद्भव होता है, यह एक अंध-विद्रोह की अवस्था है, विद्रोह एक पवित्र भाव है, जो समाज के, जाति के, राज्य के विरुद्ध होता है, किन्तु वह एक बदलाव चाहता है, जो उसकी प्रवित्ति में शामिल रहता है किन्तु, अंध-विद्रोह मात्र बिना तार्किक दृष्टिकोण के विरोध है, जिसका कोई स्वास्थ्य साध्य नहीं परिलक्षित होता ।

वैराग्य एक जागरण है, सांसारिक तादात्म्य से ।
एक तटस्थ जीवन का आरंभ है वैराग्य ।
ऐसा नहीं है कि जिसमे वैराग्य भाव जागृत हो गया वह संबंध तोड़ लेता है, वरन यह तो प्रेम की पराकाष्ठा है, उसकी सर्वोच्चता है ।
आप खजुराहो का मंदिर देखिए, वह समूचा प्रेम मंदिर है ।
जिसमें इसके सभी चरणों का दृश्यांकन किया गया है, बाहिरी भित्ति पर ‛वासनायुक्त अनुराग', फिर थोड़ा अन्दर जाने पर ‛प्रेम', और आगे स्नेह,और गर्भगृह पर वैराग्य ।
जिसमें वैराग्य पैदा हो गया है वह संसार में रहता है किन्तु संसार उसके अंदर नहीं ।
और यहीं से यात्रा शुरू होती है स्वयं से साक्षात्कार की ।

- विनय एस तिवारी



Thursday, 9 July 2020

माँ गङ्गा, प्रोज्जवल चाँदनी और अज्ञेय की पुस्तक


प्रयागराज में मेरे द्वारा खींची तस्वीर में माँ गङ्गा, चाँद और चाँदनी

आह! सौंदर्य...। बाहर खुली चाँदनी छिटकी थी, इतनी प्रोज्जवल कि निरभ्र आकाश में भी तारा एक-आध ही दिखता था । झील चमक रही थी । रंगों का वह खेल- केवल एक रंग, श्वेत का खेल- बल्कि केवल मात्र आकाश का और उसी की अनुपस्थिति का वह खेल देखकर शेखर स्तब्ध रह गया । झिलमिलाती हुई झील पर धुँधले श्यामल पहाड़, और दूर पर कोहरे सी मधुर स्निग्ध ज्योतिर्मयी हिम-श्रेणी.. उस विस्तीर्ण, अत्यंत निस्तब्ध रात में इस दृश्य को देखते हुए बोध की लहरें-सी उसके शरीर में दौड़ने लगीं; मानो वह इस जीवन के स्वप्न से उद्बुद्ध होकर, किसी ऊँची यथार्थता के लोक में चला जा रहा है.. उसे रोमांच हो आया । उसने आँखें मूँद लीं, मानो आंखें मूँद कर ही वह इस दृश्य को बनाए रख सकता है, खुली आँखों के आगे वह छिन्न हो जाएगा..।

#शेखर_एक_जीवनी, भाग दो ।
- अज्ञेय

फाफामऊ- दो संस्कृतियों का मिश्रण



तस्वीर: फाफामऊ पुल से माँ गङ्गा और उनसे विदा लेता सूर्य



फाफामऊ, एक मध्यवर्ती कस्बा है । मध्यवर्ती, ग्रामीण और शहरी संस्कृति का । ग्रामीण संस्कृति जहाँ लोग ज्यादा प्राकृतिक रवैये को अपनाते हैं, वहीं, शहरी बनावटी नयनाभिराम जीवन ।

दोनों में ठीक उतना ही अंतर है, जितना वन और उद्यान में है, जितना हिमालय, विंध्याचल या सतपुड़ा के वनों और राष्ट्रपति भवन के उद्यान में है । एक प्राकृतिक दूसरा मानवीय शिल्पता से युक्त ।
दरअसल इसमें समायोजन है, दो जीवन निर्वाह करने के रास्तों का, यह मिलाप बिंदु है इन दोनों जीवननिर्वाह के तरीकों का ।
जैसे संध्या, (समय में) दिन और रात के बीच की स्थिति है, इसमें दिन का उजाला भी है और रात का अँधेरा भी ।

फाफामऊ और प्रयागराज को जोड़ता लॉर्ड कर्जन पुल

फाफामऊ, गँगा पार करने के बाद पहला बाज़ारीय कस्बा है,जहाँ दूर गाँव से भी और शहर से भी लोग आते हैं अपने आवश्यता की वस्तुएँ खरीदने साथ ही साथ ग्रामीण आते हैं अपनी उत्पादित सामग्रियों को समर्पित करने जनकल्याण के लिए । पाल-पोष कर उत्पादित करके समर्पित कर जाते हैं ये कृषक और ले जाते हैं इसके स्थान पर नई जीवन निर्वाह की सामग्रियाँ ।

ठीक ऐसे, जैसे इतसिंग ( ई-तिसङ्ग-की) 674 ईस्वी में जब भारत यात्रा की ओर आते हुए जावा-सुमात्रा से आगे बढ़ते हैं, तो बताते हैं ‛नग्न लोगों के देश’, ‛लो-जेन-कुओ’ के बारे में । वर्तमान ‛अंडमान निकोबार द्वीपसमूह’ जिसे अरबी लोग ‛लंजवालूस’ के नाम से जानते थे ।

मार्कोपोलो उसके बारे में लिखते हैं कि, “ जब, जावा-सुमात्रा को छोड़ कर उत्तर की ओर बढ़ते हैं तो दो द्वीप मिलते हैं, जिनमें से एक ‛नीकूवेरण’ कहलाता है, यहाँ न कोई राजा है और न ही मुखिया । लोग मूर्तिपूजक हैं, यहाँ रक्त-चंदन, सुपाड़ी, लौंग और अन्य गरम मसाले मिलते हैं ।” इसी के बारे में ई-तिसङ्ग-की बताते हैं, कि ये लोग यहाँ नारियल और त्रिणमणि( ambeigris) देकर लोहा ले जाते हैं ।

 ऐसे ही इस कस्बे ‛फाफामऊ’ में खाने-पीने के व्यञ्जन, कीमत स्तर पर तो शहरी हैं किंतु भोज्यपदार्थ शुद्धता से परिपूर्ण ।
और इसी के किनारे बहती हैं पुण्यमयी गङ्गा जो इसे सुदृढ़ता और सौंदर्यता से भर देती हैं ।


--विनय एस तिवारी





 

#फरवरी


【तस्वीर: दोपहर, माँ गङ्गा और चाँदी जैसा सूर्य और रश्मियाँ 】



स समय, सूर्य के प्रकाश का रंग पिलछौंह् से श्वेत की ओर निरंतर अग्रसर है, यानी सूर्य देव उत्तरायण होने की ओर अग्रसर हैं, इस समय ठण्ड के विदा लेने और ग्रीष्म के स्वागत की उत्सुकता निरंतर बलवती हो रही है । मुझमें शुष्क और अलसाई साँझ को नग्न आंखों से देखने का कौतूहल बढ़ता जा रहा है ।

फरवरी मुझे प्रिय है । इसलिए नहीं, कि यह बसन्त का मौसम है । बल्कि इसलिए क्योंकि फरवरी एक ऐसा माह है- जिसमें सूर्य की हम दो छटाएँ देख सकते हैं, एक धूप दूसरा घाम। हम देख सकते हैं, सूर्य द्वारा अस्ताचल की अवस्थित को दक्षिण से पश्चिम की ओर खिसकाते हुए । मैं देख सकता हूँ अपनी आँखों से सूर्य को विदा ले कर जाते हुए, दूर क्षितिज तक । क्योंकि विदा ही तो अंतिम सत्य है । हम सभी मिलते हैं और एक वक्त बाद विदा हो जाते हैं । इसलिए विदा प्रिय है मुझे, क्योंकि किसी के चले जाने से जो व्यक्ति में एक खालीपन उभरता है, वह वास्तविक होता है, बनावटी नहीं ।

यह धूप से घाम होने की कथा है, विवरण है ।
धूप, सूर्य का वह प्रकाश है जो कोमल है । जिसके स्नेह-लेप के लिए शीत ऋतु में जाने कितने जीव लालायित रहते हैं, स्वयं मानव भी ।
वस्तुतः ‛धूप’ सूर्य-रश्मियों का वह अंश है जो मातृ प्रधान है । अर्थात उसमें माँ सी कोमलता होती है, स्नेह का सर्वोत्कृष्ट लेप होता है । 
उसमें प्रेम की पराकाष्ठा होती है । प्रेम जब वासना से ऊपर उठ जाता है तो वह स्नेह में परिणित हो जाता है, और यही तो प्रेम की पराकाष्ठा है । धूप ऐसे ही मृदुता से भर देता है धरा को । इसीलिए वह सृजनात्मक है ।

किन्तु, घाम । उसमें तो मृदुता है ही नहीं,उसमें कोमलता के लिए ठाँव ही नहीं है । उसमें तो है कठोरता, सम्पूर्ण शुष्कता ।  पिता सी अक्खड़ता है, एक तीक्ष्णता है ।
वह तपाती है, निखारती है । जीवन की समस्याओं से लड़ना सिखाती है । वह सिखाती है तितिक्षा । वह सिखाती है अनुशासन ।
क्योंकि बिना अनुशासन, जीवन कटी पतंग जैसा ही तो है ।
ऐसा नहीं है कि घाम किसी को पीड़ा पहुँचाना चाहे, वह तो कुम्हार की बाहिरी थाप है । जो आकार में ढालती है ।

मुझे तो दोनों प्रिय हैं । किंतु ग्रीष्म इसलिए प्राथमिक है क्योंकि ग्रीष्म में ही तो दिखता है विदा लेता सूर्य । और ले जाता है साथ, मेरे जीवन का एक दिन । तभी तो विदा लेते सूर्य को देख कर लगता है, की जैसे मुझसे मेरा अंश छूटा जा रहा है, और उभर आती है हममें रिक्तिता, एक खालीपन । जिसे भरता हूँ फिर, ठण्ड में सूर्य के स्नेह-लेप से ।

-- विनय एस तिवारी

Monday, 6 July 2020

द मोंक हू सोल्ड हिज फेरारी



【 तस्वीर: मेरी दो प्रिय वस्तु, एक तो किताब दूसरी चॉकलेटी चाय !!】

ये किताब उनके लिए नहीं है जिनमें पतवार के सहारे सागर पार करने का हुनर है, ये उनके लिए भी नहीं है जिन्हें रास आती हैं नक्काशियों से सुसज्जित दीवारें,
ये उनके लिए भी नहीं है, जिन्हें भाते हैं क्यारियों में सुसज्जित एक तहजीब से लगे पुष्प-दरख़्त, उनके लिए तो कतई नहीं है जो नहीं भाँप सकते 'दो इतिहास खंडों' के बीच की लुप्त कड़ी, उनके बीच के जीवन-स्तर और जीवंतता में अंतर ।

ये उनके लिए है जो स्वीकार करते हैं सागर की मौज, जो पतवार चला कर दरकिनार नहीं करते हैं यात्रा का आनंद वरन छोड़ देते हैं नाव को पाल के सहारे फिर हवा ले चलती है नाव को अपने लक्ष्य पर , और वो उठाते हैं यात्रा का आनंद या फिर गोते लगाते हैं समुद्र की दुनियाँ में और सीखते हैं समुद्र की भाषा ।

यह उनके लिए है जो स्वीकार करते हैं भाग्य की अवधारणा! नहीं नहीं, दिनकर जी वाली नहीं ( सनद रहे भाग्य की अवधारणा बहुत ही गलत प्रस्तुत की गई है हमारे सामने, किन्तु उस पर बात फिर कभी) वह भाग्य की अवधारणा जिससे वास्तव में काम करती है नियति । यह उनके लिए है जिन्हें खुश होने के लिए किसी बड़े साधन की जरूरत नहीं पड़ती वरन किसी झील किनारे पर बैठ कर पानी के साथ चाँद के स्पंदन से ही आनंद और सुखद आश्चर्य मिलता है या फिर रात में खिड़की पर चाँदनी की दस्तक से ही भरपूर आनंद मिलता है ।

निश्चित तौर पर मैं कह सकता हूँ कि 'योगी कथामृत, 'गुप्त भारत के रहस्य' और ओम स्वामी की ' इफ ट्रुथ बी टोल्ड ' के साथ कोई प्रिय पुस्तक लगती है तो वो है " सन्यासी जिसने अपनी सम्पत्ति बेंच दी ( द मोंक हू सोल्ड हिज फरारी ) ।
---विनय एस तिवारी




जब भी कोई किताब पढ़ता हूँ..






कीन करो, मैं जब भी कोई किताब पढ़ता हूँ । कोई किताब ! जिसे पढ़ते-पढ़ते ''वायु-अक्षरों'' में उकेरा किन्हीं दुष्यंत-शकुंतला के प्रेम का एक-एक चित्र खिंचता चला जाता है ।
'' वायु-अक्षर '' इसलिए क्योंकि मात्र महसूस किया जा सकता है उस भाव को जिसके प्रतीक बनाए गए हैं ये शब्द ।

शब्द, प्रतीक ही तो हैं विचारों के । और विचार उत्पाद हैं भाव के। इसीलिए तो बहुधा जब भावनाओं को व्यक्त करना होता है तो शब्द कम पड़ने लगते हैं, महसूस होने लगता है कि शब्दों की पहुँच भावनाओं तक कतई नहीं है । वास्तव में भाव, शून्य के या मौन के निकटवर्ती हैं, उसकी परिधि के अंतर्गत आते हैं इसीलिए भावनाओं को संवेदनाओं को शून्यता में समझा जाता है ।

तो, जैसे-जैसे शब्द घुलते जाते हैं, मैं महसूस करता हूँ खुद को और तुम्हें वहाँ, जहाँ मिलते हैं समंदर और आकाश ।
फिर तुम्हारी गिरती लटों को पहुँचाता हूँ उनके गंतव्य तक , और तब तुम्हारी उठती आँखें जो चाहत का पश्मीना बुनती हैं मेरे लिए , यकीन करो ! वो लिबास सुन्दरतम लिबास है मेरी ख़ातिर ।
और वो लिबास मुझे दुनियाँ के श्रेष्ठतम व्यक्तियों में से एक बना देता है ।
क्योंकि तब मैं तुम्हारा 'केवल एक और एक-मात्र' बन जाता हूँ ।

- विनय एस तिवारी



जैसे प्रतिपदा से पूर्णिमा तक निखरता है चाँद, वैसे एक एक अदाओं से निखरता है प्रेम



द्यपि पूर्णिमा से अमावस्या तक चाँद की दीप्ति धूमिल होने लगती है किंतु प्रेम बढ़ता ही जाता है उत्तरोत्तर ।

प्रेम की अपनी निरंतरता होती है । प्रतिपल उभरता है एक नया रंग । प्रेम का रंग सप्तवर्णी नहीं है वरन आवरण में श्वेत सा है । श्वेत इसलिए क्योंकि उसमें समाहित होते हैं सारे रंग ।
नहीं, लाल-पीला-नीला आदि नहीं, फिर तो सप्तवर्णी हो जाएगा ।
इसका रंग यानी आयाम, स्वरूप । आयामतः यह वृत्तीय गुणधर्मिता का है । क्योंकि इसके आयाम अगनित हैं, वृत्त के आयाम कहाँ गिने जा सकते हैं ? 

रंगीयता में कहें तो अनंत रंगीय । ऐसे रंगीन जैसे शरद पूर्णिमा का चंद्रमा । लालिमा से युक्त मानवी दृष्टि को समाहित करने में सक्षम ।
ऐसे रंगीन जैसे किताब के पन्ने और उन पर उकेरे एक एक शब्द ।
ऐसे रंगीन जैसे सितार की एक धुन और उस पर उंगलियों की थिरकन ।
ऐसे रंगीन जैसे किसी शरमाती प्रेमिका की भाव-भंगिमाएँ, उसके मुख की रक्तवर्णी रंगत ।

इस रंग में आगे पूर्णता की ओर बढ़ना ही एक मात्र चाह होती है और अनिवार्यता भी ।
ठीक वैसे , जैसे वाटरपार्क में बंद स्लाइड के मध्य में ठहराव होने पर एक मात्र उपाय आगे बढ़ना । आनंद भी उसी में है, और नियम भी यही ।
क्योंकि आप सुख के चरम की ओर अग्रगामी होना चाहेंगे पश्चगामी होना नहीं ।

ऐसे ही रंगों का समाहन है प्रेम । जो वक्त-दर-वक्त दिखाता है नव रंग और बढ़ते जाते हैं आप पूर्णता की खोज में ।

-- विनय एस तिवारी

Sunday, 5 July 2020

इलाहाबाद विश्वविद्यालय





हमारा विश्वविद्यालय, हमारा विश्वविद्यालय
हर एक उम्मीद का आँगन,
हर एक विश्वास का आलय,
हर एक सपनों को पर देता,
हर एक चाहत को बुन देता,
बसा माँ गङ्गा के तट पर-
है उगते रवियों का आलय ।
है देता हर परिन्दे को,
उड़ाने भी नई, नव लय ।
हमारा विश्वविद्यालय, हमारा विश्वविद्यालय ।

-विनय एस तिवारी

इत्यलम् (मेरी डायरी)

13 सितंबर 2026 प्रसंग : एक Facebook पोस्ट से शुरू हुई स्मृति, AI और वास्तविकता पर छोटी-सी परिचर्चा आज Facebook पर मेरे एक Phil...