【 तस्वीर: मेरी दो प्रिय वस्तु, एक तो किताब दूसरी चॉकलेटी चाय !!】
ये किताब उनके लिए नहीं है जिनमें पतवार के सहारे सागर पार करने का हुनर है, ये उनके लिए भी नहीं है जिन्हें रास आती हैं नक्काशियों से सुसज्जित दीवारें,
ये उनके लिए भी नहीं है, जिन्हें भाते हैं क्यारियों में सुसज्जित एक तहजीब से लगे पुष्प-दरख़्त, उनके लिए तो कतई नहीं है जो नहीं भाँप सकते 'दो इतिहास खंडों' के बीच की लुप्त कड़ी, उनके बीच के जीवन-स्तर और जीवंतता में अंतर ।
ये उनके लिए है जो स्वीकार करते हैं सागर की मौज, जो पतवार चला कर दरकिनार नहीं करते हैं यात्रा का आनंद वरन छोड़ देते हैं नाव को पाल के सहारे फिर हवा ले चलती है नाव को अपने लक्ष्य पर , और वो उठाते हैं यात्रा का आनंद या फिर गोते लगाते हैं समुद्र की दुनियाँ में और सीखते हैं समुद्र की भाषा ।
यह उनके लिए है जो स्वीकार करते हैं भाग्य की अवधारणा! नहीं नहीं, दिनकर जी वाली नहीं ( सनद रहे भाग्य की अवधारणा बहुत ही गलत प्रस्तुत की गई है हमारे सामने, किन्तु उस पर बात फिर कभी) वह भाग्य की अवधारणा जिससे वास्तव में काम करती है नियति । यह उनके लिए है जिन्हें खुश होने के लिए किसी बड़े साधन की जरूरत नहीं पड़ती वरन किसी झील किनारे पर बैठ कर पानी के साथ चाँद के स्पंदन से ही आनंद और सुखद आश्चर्य मिलता है या फिर रात में खिड़की पर चाँदनी की दस्तक से ही भरपूर आनंद मिलता है ।
निश्चित तौर पर मैं कह सकता हूँ कि 'योगी कथामृत, 'गुप्त भारत के रहस्य' और ओम स्वामी की ' इफ ट्रुथ बी टोल्ड ' के साथ कोई प्रिय पुस्तक लगती है तो वो है " सन्यासी जिसने अपनी सम्पत्ति बेंच दी ( द मोंक हू सोल्ड हिज फरारी ) ।
---विनय एस तिवारी

No comments:
Post a Comment