Sunday, 30 July 2017

ट्रैफिक जाम


मैं अपनी एक पुरानी डायरी जो रद्दी वाले को पुराने अख़बार
देते वक्त मिली थी पलट रहा था ।
उसमे कुछ पुराने कॉन्टेक्ट नंबर थे..और कुछ लोगों के नाम
जो मेरी ज़िन्दगी में आने वाले सबसे अच्छे लोग थे ।

मैं एक-एक करके पन्ने पलटता जाता मानो अपने ज़िन्दगी की
किताब पलट रहा हूँ ...धीरे-धीरे अंगुलियां एक नाम पर ठहर
गईं ।
    ' रिया ' एक नाम जो मेरी ज़िन्दगी में आने वाले नामों में
सबसे अच्छा नाम है ।
वैसे रिया नाम भी कितना क्यूट लगता है न..?? सोचो वो कितनी
खूबसूरत रही होगी ।
      पहली बार देखा था उसे केमेस्ट्री की कोचिंग में... मैं भी
साईकिल से था और वो भी ।
ओल्ड मॉडल लेडीज साईकिल को हाँथों में थामे हुए पैदल आ
रही थी । पिंक कलर के सूट के ऊपर हल्की कत्थई शॉल ओढ़े थी
कम्बख्त ठण्ड भी उस दिन बहुत पड़ रही थी । ठण्ड से उसके गाल
और लाल हो गए थे । इतनी मासूम और शांत लड़की पहली बार देखा
था मैंने !!
 उसे देखते देखते कब दो महीने निकल गए पता ही नहीं चला..,
हम दोनों का बैच बदल गया था हमारी मुलाकात महज़ रास्तों में
पल भर के लिए होती थी । और उन्हीं दो पलों के मुलाकात से
उसे पता चल गया था कि मैं उसे पसंद करता हूँ ..और शायद वो
भी मुझे पसंद करने लगी थी तभी तो.. ट्यूशन से आते-जाते वो
कनखियों से शरमाते हुए मेरी ओर देखती और जब उसकी चोरी
पकड़ी जाती यानी मैं उसे मेरी ओर देखते देख लेता तो शरमाकर
नज़रें झुका लेती । इस तरह एक साल बीत गया लेकिन मैं उससे
अपने दिल की बात नहीं बोल पाया ।
उसे न पाने के गम में मैंने अपनी ज़िन्दगी की कश्ती को वक्त के
सागर की हवाओं के रुख पर छोड़ दिया ।

        'सर हम ऑफिस जाने के लिए लेट हो जाएंगे ।' मेरे असिस्टेंट
ने मुझे आगाह किया ।
असिस्टेंट की ये आवाज़ मुझे अतीत के झरोखे से वर्तमान में ला
दिया ।
'ओह ! श्योर, आई ऍम रेडी सून ☺' मैंने कहा ।

दफ्तर पहुँचते ही मेरा फ़ोन बजा ..
देखा तो शुभम का था उसने बताया उसकी शादी हो रही है...
आज से चार दिन बाद ।
दूसरे ही दिन मैंने अपना सामान पैक कर चल दिया ..🚅🚅
अपने गुमनाम शहर ।
लगभग आठ साल हो गए होंगे मुझे गुमनाम शहर छोड़े हुए ।
सत्रह घंटे की यात्रा करनी थी मुझे । इन सत्रह घंटों में मैं सोचता
रहा सब कुछ बदल गया होगा न ???
वो लोग, वो दुकान जहाँ कोचिंग से लौटते वक्त हम चार-पांच लोग
जलेबी खाया करते थे..अब शायद वो अंकल बूढ़े हो गए होंगे..
वो गलियाँ जहाँ एक दूसरे की साईकिल खींचा करते थे..सब कुछ !!

स्टेशन से बाहर निकल कर ऑटो वाले को बुलाया और चल दिया ।
मेरा दिल धड़कने लगा था सांसे तेज हो गई थीं..मुझे डर था कि सब
कुछ याद आने लगेगा..
ये वही शहर है जहाँ मैंने ज़मीन पर पैर रखना सीखा, वही शहर
जहाँ किताबों पर ऊँगली रखना सीखा, वही शहर जहाँ क्लास बंक
कर सभी दोस्त बास्केटबॉल खेला करते थे, हाँ..ये वही शहर है जो
मुझे मेरा प्यार न दे सका ।

साहब ! हम दूसरे रास्ते से चलें..इस रास्ते में जाम बहुत लगता है..
ऑटो ड्राइवर ने मुझसे पूँछा ।

इस शहर में सब कुछ बदल गया सिवाय ट्रैफिक जाम के ।
उसने झल्लाते हुए कहा ।
"ट्रैफिक जाम" ये शब्द सुनते ही मैं अंदर तक भर गया..
गोलकुंडाबाग से मैं जब जब रिया को प्रपोज़ करने आता हर
बार ये जाम मुझे रोक लेता । लेट-लतीफ़ पहुँचता तब तक रिया
का कॉलेज बन्द हो चुका होता । ये सोच कर की कल मिलूँगा
मैं उस दिन रुक जाता और हमेशा उस दूसरे दिन रिया कॉलेज
नहीं आती । मुझे लगा की नियति ही मुझे रोक रही है
क्योकि कोई भी संकल्प जो प्राकृतिक होता है प्रकृति उस पर
सहयोग करती है..।

मैं अपने कंपनी के मेल्स चेक करने लगा मैंने अनुभव किया कि
ऑटो वाले ने किसी को रोक कर बैठाया क्योकि मैं मोबाइल
में बिजी था सो मैंने ध्यान नहीं दिया..
कुछ देर बाद मैंने देखा की बगल में एक लड़की बैठी हुई है
वही मासूमियत वही भोलापन वही रिया जो आज से आठ साल
पहले थी ।
बस अंतर इतना था कि उसकी मांग पर सिन्दूर भर चूका था ,
सूट की जगह साड़ी ने ले लिया था ...
उसने भी कातर भरी नज़रों से मुझे देखा मुझे यकीन है उसने मुझे
पहचान लिया था तभी अचानक से उसकी आँखें मेरी ओर अपलक
देखते-देखते भर आई थीं ।
'तुम मुझे पहले क्यूँ नहीं मिली..??- मैंने आँखों में आंखें डाल कर
पूँछा ।
मैं तुम्हें कितना ढूँढ़ा तुम मुझे मिली क्यों नहीं ।

"ज़िन्दगी में कब क्या होगा हमें पता नहीं होता रिशित !
अगर सब कुछ पता हो जाए तो ज़िन्दगी एक वेडियोगेम नहीं
बन जाएगी ...???' उसने नम भरी आँखों से मुस्कुराते हुए कहा ।

मेरा ठिकाना आ गया था और मैं उतरकर गुमनाम शहर की भीड़ भरी
उदास गलियों में मुसाफ़िर सा चल पड़ा..... मंजिल की तलाश में ।

✍ विनय एस तिवारी

 







Tuesday, 25 July 2017

एक अविस्मरणीय दिन -- 9 जुलाई 2010


आज सात साल बाद मैं फिर उसी नौवीं 'सी' के सामने नीम

के चबूतरे पर बैठ गया ..और देखने लगा 9th c के पीछे वाले दरवाजे

पे चॉक से लिखा मेरा नाम

जो मैंने ही लिखा था.. जहाँ से स्कूल के शुरूआती दिन साँस लेने लगे

और मैं डूब गया एक बीती किन्तु अनमोल और अद्भुत दुनियां में..।


                        # सात साल पहले 


9 जुलाई 2010 एक अविस्मरणीय और बेशकीमती दिन था
मेरे लिए ।
हाँ.. ये वही दिन था जिस दिन मार्तण्ड नम्बर 1 (एक्सीलेंस) स्कूल
में मेरा पहला दिन था ।
यह एक और दिन था... जब मैं अपना नाम दुनियां के उन
विद्यार्थियों के साथ दर्ज़ करा चुका था जो अपने घर से दूर रह कर
किसी खास मकसद के लिए पढ़ते हैं ।
इस पहले दिन मेरे भइया मुझे ले गए ।
"यार..9th 'c' किधर है..?"-मैंने एक लड़के से पूँछा ।
"नीम के पेड़ के सामने वाला है.." -उसने उंगली दिखाते हुए कहा ।

"तुम लोग 9th 'c' के हो..?" - भइया ने वहां खड़े लड़कों से पूँछा ।
"हाँ..हम 9th 'c' के ही हैं " - एक मोटे लड़के ने कहा ।

मैं और भइया बात करने लगे.. वहीं एक और लड़का था जो
हमारी बात-चीत गौर से सुन रहा था । दरवाजा खुला तो सब
अंदर गए सबसे अंत में मैं गया ।
तभी बेल बजने लगी मैंने सोचा प्रार्थना की हो शायद !!
कई पंक्तियों मे पंक्तिबद्ध हो कर बच्चे खड़े थे सामने तीन सीढ़ी
ऊपर स्टेज था जिस पर हारमोनियम, ड्रम,कांगो आदि रखा था
हारमोनियम में एक शिक्षक खड़े थे बाकी अन्य पर स्टूडेंट ही थे ।
एक लड़के ने (जो एन सी सी का था बाद में पता चला की दिल्ली
में होने वाली RDC परेड भी किया था) बड़े जोर से सावधान-विश्राम
कराया और प्रार्थना शुरू हुई -
" इतनी शक्ति हमें दे न दाता मन का विश्वास कमजोर हो न.."
इसके बाद सभी अपने अपने क्लास में चले गए ।
क्लास में सिर्फ लड़के ही थे लड़कियों की अलग क्लास थी
A सेक्शन में जिसमे कुछ ही लड़के थे
सोनी सर हम लोगों से कहा करते थे की 'ये तुम लोगो के साथ
अन्याय है '!! और बात सच है इसका खामियाजा आज तक भुगतना
पड़ रहा..। ये कमी व्यक्तित्व (पर्सनाल्टी ) विकास में बहुत बड़ी
बाधा बनी ।

मेरी पहली पीरियड नहीं लगी.. बाकि सभी क्लासेज चलीं..
इस पहले दिन के अनुभव से ऐसा लगा की मैं फ़ैल हो जाऊंगा !!


इसी पहले दिन में मेरी एक लड़के से दोस्ती हो गई, हम दोनों की
लंच ब्रेक में हमारी क्लास के सामने बने बरामदे में मुलाकात हुई
" यार..अच्छा न लग रहा होगा न ??" -- उसने मुझसे कहा
ये वही लड़का है जो मुझे ध्यान से सुन रहा था ।
हाँ यार..! एकदम बोरिंग । मैंने कहा ।
मैं विनय...अपना परिचय देते हुए कहा ।
और मैं अनूप !! उसने मुस्कुराते हुए बताया ।
यहाँ कहाँ रहते हो ? मैंने पूँछा
'बोदाबाग' और तुम 'सिविल लाइन' मैंने कहा ।
अच्छा ये बताओ तुम आगे क्या करना चाहते हो ? मैंने पूछा
यार बिज़नेस मैन बनना चाहता हूँ । और तुम ??उसने प्रतिप्रश्न
किया
IIT इंजीनियर ।
ये IIT क्या होता है ? वो पूँछा
इंजीनियरिंग का सबसे बड़ा संसथान है,लेकिन इसमें सलेक्शन
बहुत मुश्किल है ।
इसके बाद दोनों काफ़ी देर तक बैठे रहे..
हम दोनों का एक दूसरे के अलावा कोई और दोस्त नहीं था ।

                      पहली पीरियड में विश्वकर्मा सर बहुत कम
आते थे । रजिस्टर में हाज़िरी हमारे ही क्लास के दो-तीन बच्चे
भरा करते थे जो विश्वकर्मा सर के अन्य काम जैसे छत्रिवृत्ति का
रजिस्टर बनाना आदि कार्य करते थे ।

श्री उमेश तिवारी सर संस्कृत पढ़ाते थे उनके क्लास में मूलतः
संस्कृत ही बोली जाती थी । यह अपने आप में बड़ा अनुभव था
और ऐसा कक्षा में कराए जाने का मैं पक्षधर भी हूँ क्योंकि इससे
विद्यार्थी का अकादमिक विकास होता है ।

फिर आते थे श्री I.S.D. सर.. जो हमे इंग्लिश पढ़ाते थे ।
बहुत बेहतरीन एक समां बंध जाता था । उनके अध्यापन का
आकलन इस बात से लगाया जा सकता है कि एक हिंदी माध्यम
के विद्यार्थी के लिए इंग्लिश विषय बहुत कठिन लगता है लेकिन
10वीं की बोर्ड परीक्षा में लगभग सब बच्चे 80/100 के ऊपर थे।

हर लड़का उनका बहुत सम्मान करता था और आज भी करते हैं
और डरते भी थे लेकिन ये सम्मान का डर था बल्कि इसे डर न कह
कर इसे इज्जत करते थे कहना श्रेयष्कर होगा ।
क्योंकि वो किसी को मारते नहीं थे । वो अलग बात है कि 10वीं
में बहुतेरों के साथ मुझे भी पड़ी थी लेकिन उसका ताल्लुक
 पढाई से नहीं था बल्कि बायो-डाटा न बनवाने के कारण था ।

पता नहीं क्यों लेकिन हमसे आगे की क्लास के बच्चे लगभग
दूसरी पीरियड के बाद भागना शुरू कर देते थे और लंच के बाद
तो लगभग पूरी क्लास साफ !!!

देखते-देखते हम भी ऐसा ही करने लगे ...
शुरुआत में हमारे गणित के शिक्षक श्री उमेश पटेल सर कहते
थे की -
"अभी तो तुम लोग अलग-अलग स्कूल से हो कुछ दिन बाद
 तुम्हारे भी पंख जाम आएँगे तब तुम भी उड़ने लगोगे और 
तभी मैं तुम्हारे पंख काट दूंगा जिससे जमीन पर रहो ।"

7-8 लोग हम सबसे पीछे वाली सीट को जोड़ कर साथ बैठते थे
एक घटना याद आ रही है जब यूँ ही हंसी मजाक में विराट ने सैफ़
का रेप करने की एक्टिंग कर रहा था तभी ऐसा लगा सच में न कर
दे !!! और यक़ीनन सैफ को कुछ छुट-मुट चोटें भी आई थीं ।

             इस तरह हँसते-खेलते पता नहीं कब 9वीं कक्षा के दिन
कट गए.. एक्सेलेंस में एक साल गुजर गए पता नहीं लगा ।
30 अप्रैल जिस दिन रिजल्ट सुनाना था मन में अजीब सी उथल
-पुथल मची हुई थी ।
लगभग डेढ़ बजे विश्वकर्मा सर रजिस्टर लिए आए मैं और
वीरेंद्र जो मेरा एक और दोस्त बन चुका था दोनों सबसे पीछे बैठे
थे । वीरेंद्र का रोल नंबर 62 था और मेरा 64 ।
वीरेंद्र का 1st डिवीज़न था अब मेरा नंबर था मैंने सारे देवताओं के
नाम लिए तभी विश्वकर्मा सर की आवाज़ आई 64 विनय 1st
डिवीज़न । अनूप रिजल्ट के दिन स्कूल नहीं आया था उसका भी 1st
डिवीज़न ही था ।
मैं आगे बढ़ चुका था...एक कदम और आगे ...।

Monday, 17 July 2017

परदे के भीतर

अब जाने डोली कहाँ रुके अब जाने शाम कहाँ पर हो..
अब जाने घूंघट कहाँ उठे, दूल्हन बदनाम कहाँ पर हो..
अब जाने कब रंग-रेज़ मिले, चूनर निष्काम कहाँ पर हो..
परदे के भीतर परदे में बेपर्दा श्याम कहाँ पर हो..।
                 ----- गोपालदास 'नीरज'

Sunday, 16 July 2017

एक चेहरा है


फ़िर वही मिलन के किस्से हैं फिर वही पुरानी बातें हैं..
फ़िर वही साज़ धड़कन वाला फ़िर वही पुराने नाते हैं..
मन में कुछ यादें बाक़ी हैं कुछ सपने अभी अधूरे हैं,
कुछ लोगों से मिलना बाक़ी है कुछ ख़्वाब अभी न पुरे हैं,

एक चेहरा है जो आँखों में यूँ अक्सर आता जाता है..
कुछ बात ग़ज़ब उस चेहरे में बस वो अपनी ही सुनता है..
वो जिसकी भी हो हो जाए मुझको इस पर ऐतराज नहीं,
कुछ यादें साझा करनी हैं कुछ किस्से उसे सुनाने हैं,
कुछ उससे कहना बाक़ी है कुछ उससे बातें करनी है,
उससे मेरा रिश्ता ही नहीं वो अक्सर कहती रहती है..
मैं उससे हँसता रहता हूँ वो मुझसे गुस्सा रहती है,
पर...उसकी मेरी हर बातों में एक रिश्ता अब भी बाक़ी है,
वो ख़ामोशी का रिश्ता है वो ख़ामोशी के नाते हैं...।
                       ----- विनय तिवारी

फ्रेंडशिप डे

आज कई दिनों बाद अपनी डायरी खोला, हलाँकि एक कहानी लिखने के लिए
खोला था लेकिन तब फुरसत से नहीं खोला था । आज देखा तो सोचा की ज़िल्द
चढ़ा दूँ जिससे थोड़ी अच्छी दिखने लगे ।

इतने दिन बाद खोला तो सोचा कुछ लिखूं...पर क्या ??

ज़िन्दगी की जिद्दोजहद परिकल्पनाएं इन कोरे पन्नो को कैसे सुनाऊं..?
समझ नहीं आ रहा था बचपन के धूमिल पन्नो को पलटूं या बचपन के
पार स्कूल लाइफ के बिखरे किताब के पन्नो को समेटूं ..? या फिर एक अनकही
सी प्रेम कहानी... जिसका कोई वजूद नहीं..,जिसके ताजमहल की दीवारें कभी
नहीं उठ सकीं...उसे ख्वाबों और उम्मीदों का पंख लगाकर उकेर दूँ कोरे पन्नों पर
और उड़ा दूँ अनंत परिकल्पनाओं के आकाश में ...।

बात दो साल पहले की है... जब मेरा प्रयाग (इलाहाबाद) में पहला साल था..
2 अगस्त 2015 फ्रेंडशिप डे था उस दिन । मुझे आज तक किसी ने फ्रेंडशिप
बैंड नहीं दिया था । मेरे कई सारे दोस्त बताते थे की ये बैंड फलां लड़की ने दिया
ये फलां दोस्त ने दिया और अपनी खुशी ऐसे बाँटते जैसे इन्हें मिले बैंड की
प्राइवेसी " फ्रेंड्स ऑफ़ फ्रेंड " हो ।
मेरी आज तक किसी लड़की से कोई दोस्ती नहीं हुई..हाँ जो मेरे पुरुष दोस्त है
उनके और हमारे बीच इतनी निकटता है कि किसी बैंड की आवश्यकता ही नहीं
है...। लेकिन पता नहीं क्यों आज मेरा मन कर रहा था किसी को फ्रेंडशिप बैंड
देने के लिए ।
मैंने दुकान से 10 बैंड लिए और चल दिया इस कश्मकश में कि आखिर बांधा
किसे जाए ।
लगभग 1 किलोमीटर चलने के बाद मेरे पांव ठिठक गए सामने लिखा था
" रेडक्रॉस ओल्डएज होम " मैं गया वहां एक दादा जी बैठे थे मैं उनकी ओर
अपलक कुछ देर देखता रहा...
 फिर पास जा कर मैंने कहा -"  आप मुझसे दोस्ती करोगे...."





इत्यलम् (मेरी डायरी)

13 सितंबर 2026 प्रसंग : एक Facebook पोस्ट से शुरू हुई स्मृति, AI और वास्तविकता पर छोटी-सी परिचर्चा आज Facebook पर मेरे एक Phil...