मैं अपनी एक पुरानी डायरी जो रद्दी वाले को पुराने अख़बार
देते वक्त मिली थी पलट रहा था ।
उसमे कुछ पुराने कॉन्टेक्ट नंबर थे..और कुछ लोगों के नाम
जो मेरी ज़िन्दगी में आने वाले सबसे अच्छे लोग थे ।
मैं एक-एक करके पन्ने पलटता जाता मानो अपने ज़िन्दगी की
किताब पलट रहा हूँ ...धीरे-धीरे अंगुलियां एक नाम पर ठहर
गईं ।
' रिया ' एक नाम जो मेरी ज़िन्दगी में आने वाले नामों में
सबसे अच्छा नाम है ।
वैसे रिया नाम भी कितना क्यूट लगता है न..?? सोचो वो कितनी
खूबसूरत रही होगी ।
पहली बार देखा था उसे केमेस्ट्री की कोचिंग में... मैं भी
साईकिल से था और वो भी ।
ओल्ड मॉडल लेडीज साईकिल को हाँथों में थामे हुए पैदल आ
रही थी । पिंक कलर के सूट के ऊपर हल्की कत्थई शॉल ओढ़े थी
कम्बख्त ठण्ड भी उस दिन बहुत पड़ रही थी । ठण्ड से उसके गाल
और लाल हो गए थे । इतनी मासूम और शांत लड़की पहली बार देखा
था मैंने !!
उसे देखते देखते कब दो महीने निकल गए पता ही नहीं चला..,
हम दोनों का बैच बदल गया था हमारी मुलाकात महज़ रास्तों में
पल भर के लिए होती थी । और उन्हीं दो पलों के मुलाकात से
उसे पता चल गया था कि मैं उसे पसंद करता हूँ ..और शायद वो
भी मुझे पसंद करने लगी थी तभी तो.. ट्यूशन से आते-जाते वो
कनखियों से शरमाते हुए मेरी ओर देखती और जब उसकी चोरी
पकड़ी जाती यानी मैं उसे मेरी ओर देखते देख लेता तो शरमाकर
नज़रें झुका लेती । इस तरह एक साल बीत गया लेकिन मैं उससे
अपने दिल की बात नहीं बोल पाया ।
उसे न पाने के गम में मैंने अपनी ज़िन्दगी की कश्ती को वक्त के
सागर की हवाओं के रुख पर छोड़ दिया ।
'सर हम ऑफिस जाने के लिए लेट हो जाएंगे ।' मेरे असिस्टेंट
ने मुझे आगाह किया ।
असिस्टेंट की ये आवाज़ मुझे अतीत के झरोखे से वर्तमान में ला
दिया ।
'ओह ! श्योर, आई ऍम रेडी सून ☺' मैंने कहा ।
दफ्तर पहुँचते ही मेरा फ़ोन बजा ..
देखा तो शुभम का था उसने बताया उसकी शादी हो रही है...
आज से चार दिन बाद ।
दूसरे ही दिन मैंने अपना सामान पैक कर चल दिया ..🚅🚅
अपने गुमनाम शहर ।
लगभग आठ साल हो गए होंगे मुझे गुमनाम शहर छोड़े हुए ।
सत्रह घंटे की यात्रा करनी थी मुझे । इन सत्रह घंटों में मैं सोचता
रहा सब कुछ बदल गया होगा न ???
वो लोग, वो दुकान जहाँ कोचिंग से लौटते वक्त हम चार-पांच लोग
जलेबी खाया करते थे..अब शायद वो अंकल बूढ़े हो गए होंगे..
वो गलियाँ जहाँ एक दूसरे की साईकिल खींचा करते थे..सब कुछ !!
स्टेशन से बाहर निकल कर ऑटो वाले को बुलाया और चल दिया ।
मेरा दिल धड़कने लगा था सांसे तेज हो गई थीं..मुझे डर था कि सब
कुछ याद आने लगेगा..
ये वही शहर है जहाँ मैंने ज़मीन पर पैर रखना सीखा, वही शहर
जहाँ किताबों पर ऊँगली रखना सीखा, वही शहर जहाँ क्लास बंक
कर सभी दोस्त बास्केटबॉल खेला करते थे, हाँ..ये वही शहर है जो
मुझे मेरा प्यार न दे सका ।
साहब ! हम दूसरे रास्ते से चलें..इस रास्ते में जाम बहुत लगता है..
ऑटो ड्राइवर ने मुझसे पूँछा ।
इस शहर में सब कुछ बदल गया सिवाय ट्रैफिक जाम के ।
उसने झल्लाते हुए कहा ।
"ट्रैफिक जाम" ये शब्द सुनते ही मैं अंदर तक भर गया..
गोलकुंडाबाग से मैं जब जब रिया को प्रपोज़ करने आता हर
बार ये जाम मुझे रोक लेता । लेट-लतीफ़ पहुँचता तब तक रिया
का कॉलेज बन्द हो चुका होता । ये सोच कर की कल मिलूँगा
मैं उस दिन रुक जाता और हमेशा उस दूसरे दिन रिया कॉलेज
नहीं आती । मुझे लगा की नियति ही मुझे रोक रही है
क्योकि कोई भी संकल्प जो प्राकृतिक होता है प्रकृति उस पर
सहयोग करती है..।
मैं अपने कंपनी के मेल्स चेक करने लगा मैंने अनुभव किया कि
ऑटो वाले ने किसी को रोक कर बैठाया क्योकि मैं मोबाइल
में बिजी था सो मैंने ध्यान नहीं दिया..
कुछ देर बाद मैंने देखा की बगल में एक लड़की बैठी हुई है
वही मासूमियत वही भोलापन वही रिया जो आज से आठ साल
पहले थी ।
बस अंतर इतना था कि उसकी मांग पर सिन्दूर भर चूका था ,
सूट की जगह साड़ी ने ले लिया था ...
उसने भी कातर भरी नज़रों से मुझे देखा मुझे यकीन है उसने मुझे
पहचान लिया था तभी अचानक से उसकी आँखें मेरी ओर अपलक
देखते-देखते भर आई थीं ।
'तुम मुझे पहले क्यूँ नहीं मिली..??- मैंने आँखों में आंखें डाल कर
पूँछा ।
मैं तुम्हें कितना ढूँढ़ा तुम मुझे मिली क्यों नहीं ।
"ज़िन्दगी में कब क्या होगा हमें पता नहीं होता रिशित !
अगर सब कुछ पता हो जाए तो ज़िन्दगी एक वेडियोगेम नहीं
बन जाएगी ...???' उसने नम भरी आँखों से मुस्कुराते हुए कहा ।
मेरा ठिकाना आ गया था और मैं उतरकर गुमनाम शहर की भीड़ भरी
उदास गलियों में मुसाफ़िर सा चल पड़ा..... मंजिल की तलाश में ।
✍ विनय एस तिवारी

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