आज कई दिनों बाद अपनी डायरी खोला, हलाँकि एक कहानी लिखने के लिए
खोला था लेकिन तब फुरसत से नहीं खोला था । आज देखा तो सोचा की ज़िल्द
चढ़ा दूँ जिससे थोड़ी अच्छी दिखने लगे ।
इतने दिन बाद खोला तो सोचा कुछ लिखूं...पर क्या ??
ज़िन्दगी की जिद्दोजहद परिकल्पनाएं इन कोरे पन्नो को कैसे सुनाऊं..?
समझ नहीं आ रहा था बचपन के धूमिल पन्नो को पलटूं या बचपन के
पार स्कूल लाइफ के बिखरे किताब के पन्नो को समेटूं ..? या फिर एक अनकही
सी प्रेम कहानी... जिसका कोई वजूद नहीं..,जिसके ताजमहल की दीवारें कभी
नहीं उठ सकीं...उसे ख्वाबों और उम्मीदों का पंख लगाकर उकेर दूँ कोरे पन्नों पर
और उड़ा दूँ अनंत परिकल्पनाओं के आकाश में ...।
बात दो साल पहले की है... जब मेरा प्रयाग (इलाहाबाद) में पहला साल था..
2 अगस्त 2015 फ्रेंडशिप डे था उस दिन । मुझे आज तक किसी ने फ्रेंडशिप
बैंड नहीं दिया था । मेरे कई सारे दोस्त बताते थे की ये बैंड फलां लड़की ने दिया
ये फलां दोस्त ने दिया और अपनी खुशी ऐसे बाँटते जैसे इन्हें मिले बैंड की
प्राइवेसी " फ्रेंड्स ऑफ़ फ्रेंड " हो ।
मेरी आज तक किसी लड़की से कोई दोस्ती नहीं हुई..हाँ जो मेरे पुरुष दोस्त है
उनके और हमारे बीच इतनी निकटता है कि किसी बैंड की आवश्यकता ही नहीं
है...। लेकिन पता नहीं क्यों आज मेरा मन कर रहा था किसी को फ्रेंडशिप बैंड
देने के लिए ।
मैंने दुकान से 10 बैंड लिए और चल दिया इस कश्मकश में कि आखिर बांधा
किसे जाए ।
लगभग 1 किलोमीटर चलने के बाद मेरे पांव ठिठक गए सामने लिखा था
" रेडक्रॉस ओल्डएज होम " मैं गया वहां एक दादा जी बैठे थे मैं उनकी ओर
अपलक कुछ देर देखता रहा...
फिर पास जा कर मैंने कहा -" आप मुझसे दोस्ती करोगे...."।
खोला था लेकिन तब फुरसत से नहीं खोला था । आज देखा तो सोचा की ज़िल्द
चढ़ा दूँ जिससे थोड़ी अच्छी दिखने लगे ।
इतने दिन बाद खोला तो सोचा कुछ लिखूं...पर क्या ??
ज़िन्दगी की जिद्दोजहद परिकल्पनाएं इन कोरे पन्नो को कैसे सुनाऊं..?
समझ नहीं आ रहा था बचपन के धूमिल पन्नो को पलटूं या बचपन के
पार स्कूल लाइफ के बिखरे किताब के पन्नो को समेटूं ..? या फिर एक अनकही
सी प्रेम कहानी... जिसका कोई वजूद नहीं..,जिसके ताजमहल की दीवारें कभी
नहीं उठ सकीं...उसे ख्वाबों और उम्मीदों का पंख लगाकर उकेर दूँ कोरे पन्नों पर
और उड़ा दूँ अनंत परिकल्पनाओं के आकाश में ...।
बात दो साल पहले की है... जब मेरा प्रयाग (इलाहाबाद) में पहला साल था..
2 अगस्त 2015 फ्रेंडशिप डे था उस दिन । मुझे आज तक किसी ने फ्रेंडशिप
बैंड नहीं दिया था । मेरे कई सारे दोस्त बताते थे की ये बैंड फलां लड़की ने दिया
ये फलां दोस्त ने दिया और अपनी खुशी ऐसे बाँटते जैसे इन्हें मिले बैंड की
प्राइवेसी " फ्रेंड्स ऑफ़ फ्रेंड " हो ।
मेरी आज तक किसी लड़की से कोई दोस्ती नहीं हुई..हाँ जो मेरे पुरुष दोस्त है
उनके और हमारे बीच इतनी निकटता है कि किसी बैंड की आवश्यकता ही नहीं
है...। लेकिन पता नहीं क्यों आज मेरा मन कर रहा था किसी को फ्रेंडशिप बैंड
देने के लिए ।
मैंने दुकान से 10 बैंड लिए और चल दिया इस कश्मकश में कि आखिर बांधा
किसे जाए ।
लगभग 1 किलोमीटर चलने के बाद मेरे पांव ठिठक गए सामने लिखा था
" रेडक्रॉस ओल्डएज होम " मैं गया वहां एक दादा जी बैठे थे मैं उनकी ओर
अपलक कुछ देर देखता रहा...
फिर पास जा कर मैंने कहा -" आप मुझसे दोस्ती करोगे...."।
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