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एक अविस्मरणीय दिन -- 9 जुलाई 2010


आज सात साल बाद मैं फिर उसी नौवीं 'सी' के सामने नीम

के चबूतरे पर बैठ गया ..और देखने लगा 9th c के पीछे वाले दरवाजे

पे चॉक से लिखा मेरा नाम

जो मैंने ही लिखा था.. जहाँ से स्कूल के शुरूआती दिन साँस लेने लगे

और मैं डूब गया एक बीती किन्तु अनमोल और अद्भुत दुनियां में..।


                        # सात साल पहले 


9 जुलाई 2010 एक अविस्मरणीय और बेशकीमती दिन था
मेरे लिए ।
हाँ.. ये वही दिन था जिस दिन मार्तण्ड नम्बर 1 (एक्सीलेंस) स्कूल
में मेरा पहला दिन था ।
यह एक और दिन था... जब मैं अपना नाम दुनियां के उन
विद्यार्थियों के साथ दर्ज़ करा चुका था जो अपने घर से दूर रह कर
किसी खास मकसद के लिए पढ़ते हैं ।
इस पहले दिन मेरे भइया मुझे ले गए ।
"यार..9th 'c' किधर है..?"-मैंने एक लड़के से पूँछा ।
"नीम के पेड़ के सामने वाला है.." -उसने उंगली दिखाते हुए कहा ।

"तुम लोग 9th 'c' के हो..?" - भइया ने वहां खड़े लड़कों से पूँछा ।
"हाँ..हम 9th 'c' के ही हैं " - एक मोटे लड़के ने कहा ।

मैं और भइया बात करने लगे.. वहीं एक और लड़का था जो
हमारी बात-चीत गौर से सुन रहा था । दरवाजा खुला तो सब
अंदर गए सबसे अंत में मैं गया ।
तभी बेल बजने लगी मैंने सोचा प्रार्थना की हो शायद !!
कई पंक्तियों मे पंक्तिबद्ध हो कर बच्चे खड़े थे सामने तीन सीढ़ी
ऊपर स्टेज था जिस पर हारमोनियम, ड्रम,कांगो आदि रखा था
हारमोनियम में एक शिक्षक खड़े थे बाकी अन्य पर स्टूडेंट ही थे ।
एक लड़के ने (जो एन सी सी का था बाद में पता चला की दिल्ली
में होने वाली RDC परेड भी किया था) बड़े जोर से सावधान-विश्राम
कराया और प्रार्थना शुरू हुई -
" इतनी शक्ति हमें दे न दाता मन का विश्वास कमजोर हो न.."
इसके बाद सभी अपने अपने क्लास में चले गए ।
क्लास में सिर्फ लड़के ही थे लड़कियों की अलग क्लास थी
A सेक्शन में जिसमे कुछ ही लड़के थे
सोनी सर हम लोगों से कहा करते थे की 'ये तुम लोगो के साथ
अन्याय है '!! और बात सच है इसका खामियाजा आज तक भुगतना
पड़ रहा..। ये कमी व्यक्तित्व (पर्सनाल्टी ) विकास में बहुत बड़ी
बाधा बनी ।

मेरी पहली पीरियड नहीं लगी.. बाकि सभी क्लासेज चलीं..
इस पहले दिन के अनुभव से ऐसा लगा की मैं फ़ैल हो जाऊंगा !!


इसी पहले दिन में मेरी एक लड़के से दोस्ती हो गई, हम दोनों की
लंच ब्रेक में हमारी क्लास के सामने बने बरामदे में मुलाकात हुई
" यार..अच्छा न लग रहा होगा न ??" -- उसने मुझसे कहा
ये वही लड़का है जो मुझे ध्यान से सुन रहा था ।
हाँ यार..! एकदम बोरिंग । मैंने कहा ।
मैं विनय...अपना परिचय देते हुए कहा ।
और मैं अनूप !! उसने मुस्कुराते हुए बताया ।
यहाँ कहाँ रहते हो ? मैंने पूँछा
'बोदाबाग' और तुम 'सिविल लाइन' मैंने कहा ।
अच्छा ये बताओ तुम आगे क्या करना चाहते हो ? मैंने पूछा
यार बिज़नेस मैन बनना चाहता हूँ । और तुम ??उसने प्रतिप्रश्न
किया
IIT इंजीनियर ।
ये IIT क्या होता है ? वो पूँछा
इंजीनियरिंग का सबसे बड़ा संसथान है,लेकिन इसमें सलेक्शन
बहुत मुश्किल है ।
इसके बाद दोनों काफ़ी देर तक बैठे रहे..
हम दोनों का एक दूसरे के अलावा कोई और दोस्त नहीं था ।

                      पहली पीरियड में विश्वकर्मा सर बहुत कम
आते थे । रजिस्टर में हाज़िरी हमारे ही क्लास के दो-तीन बच्चे
भरा करते थे जो विश्वकर्मा सर के अन्य काम जैसे छत्रिवृत्ति का
रजिस्टर बनाना आदि कार्य करते थे ।

श्री उमेश तिवारी सर संस्कृत पढ़ाते थे उनके क्लास में मूलतः
संस्कृत ही बोली जाती थी । यह अपने आप में बड़ा अनुभव था
और ऐसा कक्षा में कराए जाने का मैं पक्षधर भी हूँ क्योंकि इससे
विद्यार्थी का अकादमिक विकास होता है ।

फिर आते थे श्री I.S.D. सर.. जो हमे इंग्लिश पढ़ाते थे ।
बहुत बेहतरीन एक समां बंध जाता था । उनके अध्यापन का
आकलन इस बात से लगाया जा सकता है कि एक हिंदी माध्यम
के विद्यार्थी के लिए इंग्लिश विषय बहुत कठिन लगता है लेकिन
10वीं की बोर्ड परीक्षा में लगभग सब बच्चे 80/100 के ऊपर थे।

हर लड़का उनका बहुत सम्मान करता था और आज भी करते हैं
और डरते भी थे लेकिन ये सम्मान का डर था बल्कि इसे डर न कह
कर इसे इज्जत करते थे कहना श्रेयष्कर होगा ।
क्योंकि वो किसी को मारते नहीं थे । वो अलग बात है कि 10वीं
में बहुतेरों के साथ मुझे भी पड़ी थी लेकिन उसका ताल्लुक
 पढाई से नहीं था बल्कि बायो-डाटा न बनवाने के कारण था ।

पता नहीं क्यों लेकिन हमसे आगे की क्लास के बच्चे लगभग
दूसरी पीरियड के बाद भागना शुरू कर देते थे और लंच के बाद
तो लगभग पूरी क्लास साफ !!!

देखते-देखते हम भी ऐसा ही करने लगे ...
शुरुआत में हमारे गणित के शिक्षक श्री उमेश पटेल सर कहते
थे की -
"अभी तो तुम लोग अलग-अलग स्कूल से हो कुछ दिन बाद
 तुम्हारे भी पंख जाम आएँगे तब तुम भी उड़ने लगोगे और 
तभी मैं तुम्हारे पंख काट दूंगा जिससे जमीन पर रहो ।"

7-8 लोग हम सबसे पीछे वाली सीट को जोड़ कर साथ बैठते थे
एक घटना याद आ रही है जब यूँ ही हंसी मजाक में विराट ने सैफ़
का रेप करने की एक्टिंग कर रहा था तभी ऐसा लगा सच में न कर
दे !!! और यक़ीनन सैफ को कुछ छुट-मुट चोटें भी आई थीं ।

             इस तरह हँसते-खेलते पता नहीं कब 9वीं कक्षा के दिन
कट गए.. एक्सेलेंस में एक साल गुजर गए पता नहीं लगा ।
30 अप्रैल जिस दिन रिजल्ट सुनाना था मन में अजीब सी उथल
-पुथल मची हुई थी ।
लगभग डेढ़ बजे विश्वकर्मा सर रजिस्टर लिए आए मैं और
वीरेंद्र जो मेरा एक और दोस्त बन चुका था दोनों सबसे पीछे बैठे
थे । वीरेंद्र का रोल नंबर 62 था और मेरा 64 ।
वीरेंद्र का 1st डिवीज़न था अब मेरा नंबर था मैंने सारे देवताओं के
नाम लिए तभी विश्वकर्मा सर की आवाज़ आई 64 विनय 1st
डिवीज़न । अनूप रिजल्ट के दिन स्कूल नहीं आया था उसका भी 1st
डिवीज़न ही था ।
मैं आगे बढ़ चुका था...एक कदम और आगे ...।

Comments

  1. Eagerly Waiting for next..... sir

    ReplyDelete
  2. Tiwari ji purine Dino Ki yadey taji ho gye

    ReplyDelete
  3. विनय तिवारी भाई के लिखने की शैली इस क़दर लाजवाब है, कि आगे और आगे पढ़ने की मीठी उत्सुकता बनी ही रहती है।

    आपको बहुत शुभकामनाएँ मित्र।

    विनय त्रिपाठी, प्रयाग

    94 50 23 81 53

    ReplyDelete
    Replies
    1. Thankyou. Bade bhai.
      आपका स्नेह मिलता रहे ।

      Delete
  4. बहुत अच्छा लिखा है मित्र।

    ReplyDelete
  5. Students. like you made the excellence to feel proud.

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उस शाम

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