Monday, 17 July 2017

परदे के भीतर

अब जाने डोली कहाँ रुके अब जाने शाम कहाँ पर हो..
अब जाने घूंघट कहाँ उठे, दूल्हन बदनाम कहाँ पर हो..
अब जाने कब रंग-रेज़ मिले, चूनर निष्काम कहाँ पर हो..
परदे के भीतर परदे में बेपर्दा श्याम कहाँ पर हो..।
                 ----- गोपालदास 'नीरज'

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