अब जाने डोली कहाँ रुके अब जाने शाम कहाँ पर हो..
अब जाने घूंघट कहाँ उठे, दूल्हन बदनाम कहाँ पर हो..
अब जाने कब रंग-रेज़ मिले, चूनर निष्काम कहाँ पर हो..
परदे के भीतर परदे में बेपर्दा श्याम कहाँ पर हो..।
----- गोपालदास 'नीरज'
13 सितंबर 2026 प्रसंग : एक Facebook पोस्ट से शुरू हुई स्मृति, AI और वास्तविकता पर छोटी-सी परिचर्चा आज Facebook पर मेरे एक Phil...
No comments:
Post a Comment