...क्योंकि स्नेह से तटस्थ (ऑब्जेक्टिव) हो जाना ही तो वैराग्य है । स्नेह तो वासना से लगभग मुक्त होता है लेकिन फिर भी मोह व्याप्त तो रहता ही है और जब मोह भी विदा हो जाता है तब वैराग्य का जन्म होता है ।
वैराग्य संसार से भागना कदाचित भी नहीं है, जैसा कि कृष्ण कहते हैं, आचार्य रजनीश कहते हैं, बुद्ध कहते हैं ।
वैराग्य तो कर्म के लिए कर्म करना है, कर्ता भाव से मुक्त होना है ।
जैसे भक्ति और प्रपत्ति में,
भक्ति में भक्त समर्पित रहता है किंतु उसमें परमात्मा से एक आनंद की चाह बनी रहती है किंतु वह चाह समाप्त हो जाती है तब वो अवस्था कहलाती है प्रपत्ति ।
ठीक ऐसे प्रेम और स्नेह में, प्रेम वासनाओं के व्याप्ति की अवस्था है किंतु स्नेह, जब प्रेम में वासनाएँ क्षीण हो जाएं ।
और जब वासनाएँ शून्य हो जाएँ, तब उत्पन्न होता है वैराग्य ।
वहीं दूसरी ओर, क्रूरता और यातना में भी ऐसा ही फ़र्क़ है,
क्रूरता अन्तरागत है, कोई क्रूर होता है, किन्तु यातनाएँ तो मानवीय गुण हैं ।
जब क्रूरता में वासना समाहित हो जाती है, तब यातना का उद्भव होता है, यह एक अंध-विद्रोह की अवस्था है, विद्रोह एक पवित्र भाव है, जो समाज के, जाति के, राज्य के विरुद्ध होता है, किन्तु वह एक बदलाव चाहता है, जो उसकी प्रवित्ति में शामिल रहता है किन्तु, अंध-विद्रोह मात्र बिना तार्किक दृष्टिकोण के विरोध है, जिसका कोई स्वास्थ्य साध्य नहीं परिलक्षित होता ।
वैराग्य एक जागरण है, सांसारिक तादात्म्य से ।
एक तटस्थ जीवन का आरंभ है वैराग्य ।
ऐसा नहीं है कि जिसमे वैराग्य भाव जागृत हो गया वह संबंध तोड़ लेता है, वरन यह तो प्रेम की पराकाष्ठा है, उसकी सर्वोच्चता है ।
आप खजुराहो का मंदिर देखिए, वह समूचा प्रेम मंदिर है ।
जिसमें इसके सभी चरणों का दृश्यांकन किया गया है, बाहिरी भित्ति पर ‛वासनायुक्त अनुराग', फिर थोड़ा अन्दर जाने पर ‛प्रेम', और आगे स्नेह,और गर्भगृह पर वैराग्य ।
जिसमें वैराग्य पैदा हो गया है वह संसार में रहता है किन्तु संसार उसके अंदर नहीं ।
और यहीं से यात्रा शुरू होती है स्वयं से साक्षात्कार की ।
- विनय एस तिवारी

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