माँ गङ्गा, प्रोज्जवल चाँदनी और अज्ञेय की पुस्तक


प्रयागराज में मेरे द्वारा खींची तस्वीर में माँ गङ्गा, चाँद और चाँदनी

आह! सौंदर्य...। बाहर खुली चाँदनी छिटकी थी, इतनी प्रोज्जवल कि निरभ्र आकाश में भी तारा एक-आध ही दिखता था । झील चमक रही थी । रंगों का वह खेल- केवल एक रंग, श्वेत का खेल- बल्कि केवल मात्र आकाश का और उसी की अनुपस्थिति का वह खेल देखकर शेखर स्तब्ध रह गया । झिलमिलाती हुई झील पर धुँधले श्यामल पहाड़, और दूर पर कोहरे सी मधुर स्निग्ध ज्योतिर्मयी हिम-श्रेणी.. उस विस्तीर्ण, अत्यंत निस्तब्ध रात में इस दृश्य को देखते हुए बोध की लहरें-सी उसके शरीर में दौड़ने लगीं; मानो वह इस जीवन के स्वप्न से उद्बुद्ध होकर, किसी ऊँची यथार्थता के लोक में चला जा रहा है.. उसे रोमांच हो आया । उसने आँखें मूँद लीं, मानो आंखें मूँद कर ही वह इस दृश्य को बनाए रख सकता है, खुली आँखों के आगे वह छिन्न हो जाएगा..।

#शेखर_एक_जीवनी, भाग दो ।
- अज्ञेय

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