जब भी कोई किताब पढ़ता हूँ..






कीन करो, मैं जब भी कोई किताब पढ़ता हूँ । कोई किताब ! जिसे पढ़ते-पढ़ते ''वायु-अक्षरों'' में उकेरा किन्हीं दुष्यंत-शकुंतला के प्रेम का एक-एक चित्र खिंचता चला जाता है ।
'' वायु-अक्षर '' इसलिए क्योंकि मात्र महसूस किया जा सकता है उस भाव को जिसके प्रतीक बनाए गए हैं ये शब्द ।

शब्द, प्रतीक ही तो हैं विचारों के । और विचार उत्पाद हैं भाव के। इसीलिए तो बहुधा जब भावनाओं को व्यक्त करना होता है तो शब्द कम पड़ने लगते हैं, महसूस होने लगता है कि शब्दों की पहुँच भावनाओं तक कतई नहीं है । वास्तव में भाव, शून्य के या मौन के निकटवर्ती हैं, उसकी परिधि के अंतर्गत आते हैं इसीलिए भावनाओं को संवेदनाओं को शून्यता में समझा जाता है ।

तो, जैसे-जैसे शब्द घुलते जाते हैं, मैं महसूस करता हूँ खुद को और तुम्हें वहाँ, जहाँ मिलते हैं समंदर और आकाश ।
फिर तुम्हारी गिरती लटों को पहुँचाता हूँ उनके गंतव्य तक , और तब तुम्हारी उठती आँखें जो चाहत का पश्मीना बुनती हैं मेरे लिए , यकीन करो ! वो लिबास सुन्दरतम लिबास है मेरी ख़ातिर ।
और वो लिबास मुझे दुनियाँ के श्रेष्ठतम व्यक्तियों में से एक बना देता है ।
क्योंकि तब मैं तुम्हारा 'केवल एक और एक-मात्र' बन जाता हूँ ।

- विनय एस तिवारी



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