जैसे प्रतिपदा से पूर्णिमा तक निखरता है चाँद, वैसे एक एक अदाओं से निखरता है प्रेम



द्यपि पूर्णिमा से अमावस्या तक चाँद की दीप्ति धूमिल होने लगती है किंतु प्रेम बढ़ता ही जाता है उत्तरोत्तर ।

प्रेम की अपनी निरंतरता होती है । प्रतिपल उभरता है एक नया रंग । प्रेम का रंग सप्तवर्णी नहीं है वरन आवरण में श्वेत सा है । श्वेत इसलिए क्योंकि उसमें समाहित होते हैं सारे रंग ।
नहीं, लाल-पीला-नीला आदि नहीं, फिर तो सप्तवर्णी हो जाएगा ।
इसका रंग यानी आयाम, स्वरूप । आयामतः यह वृत्तीय गुणधर्मिता का है । क्योंकि इसके आयाम अगनित हैं, वृत्त के आयाम कहाँ गिने जा सकते हैं ? 

रंगीयता में कहें तो अनंत रंगीय । ऐसे रंगीन जैसे शरद पूर्णिमा का चंद्रमा । लालिमा से युक्त मानवी दृष्टि को समाहित करने में सक्षम ।
ऐसे रंगीन जैसे किताब के पन्ने और उन पर उकेरे एक एक शब्द ।
ऐसे रंगीन जैसे सितार की एक धुन और उस पर उंगलियों की थिरकन ।
ऐसे रंगीन जैसे किसी शरमाती प्रेमिका की भाव-भंगिमाएँ, उसके मुख की रक्तवर्णी रंगत ।

इस रंग में आगे पूर्णता की ओर बढ़ना ही एक मात्र चाह होती है और अनिवार्यता भी ।
ठीक वैसे , जैसे वाटरपार्क में बंद स्लाइड के मध्य में ठहराव होने पर एक मात्र उपाय आगे बढ़ना । आनंद भी उसी में है, और नियम भी यही ।
क्योंकि आप सुख के चरम की ओर अग्रगामी होना चाहेंगे पश्चगामी होना नहीं ।

ऐसे ही रंगों का समाहन है प्रेम । जो वक्त-दर-वक्त दिखाता है नव रंग और बढ़ते जाते हैं आप पूर्णता की खोज में ।

-- विनय एस तिवारी

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