【तस्वीर: दोपहर, माँ गङ्गा और चाँदी जैसा सूर्य और रश्मियाँ 】
इस समय, सूर्य के प्रकाश का रंग पिलछौंह् से श्वेत की ओर निरंतर अग्रसर है, यानी सूर्य देव उत्तरायण होने की ओर अग्रसर हैं, इस समय ठण्ड के विदा लेने और ग्रीष्म के स्वागत की उत्सुकता निरंतर बलवती हो रही है । मुझमें शुष्क और अलसाई साँझ को नग्न आंखों से देखने का कौतूहल बढ़ता जा रहा है ।
फरवरी मुझे प्रिय है । इसलिए नहीं, कि यह बसन्त का मौसम है । बल्कि इसलिए क्योंकि फरवरी एक ऐसा माह है- जिसमें सूर्य की हम दो छटाएँ देख सकते हैं, एक धूप दूसरा घाम। हम देख सकते हैं, सूर्य द्वारा अस्ताचल की अवस्थित को दक्षिण से पश्चिम की ओर खिसकाते हुए । मैं देख सकता हूँ अपनी आँखों से सूर्य को विदा ले कर जाते हुए, दूर क्षितिज तक । क्योंकि विदा ही तो अंतिम सत्य है । हम सभी मिलते हैं और एक वक्त बाद विदा हो जाते हैं । इसलिए विदा प्रिय है मुझे, क्योंकि किसी के चले जाने से जो व्यक्ति में एक खालीपन उभरता है, वह वास्तविक होता है, बनावटी नहीं ।
यह धूप से घाम होने की कथा है, विवरण है ।
धूप, सूर्य का वह प्रकाश है जो कोमल है । जिसके स्नेह-लेप के लिए शीत ऋतु में जाने कितने जीव लालायित रहते हैं, स्वयं मानव भी ।
वस्तुतः ‛धूप’ सूर्य-रश्मियों का वह अंश है जो मातृ प्रधान है । अर्थात उसमें माँ सी कोमलता होती है, स्नेह का सर्वोत्कृष्ट लेप होता है ।
उसमें प्रेम की पराकाष्ठा होती है । प्रेम जब वासना से ऊपर उठ जाता है तो वह स्नेह में परिणित हो जाता है, और यही तो प्रेम की पराकाष्ठा है । धूप ऐसे ही मृदुता से भर देता है धरा को । इसीलिए वह सृजनात्मक है ।
किन्तु, घाम । उसमें तो मृदुता है ही नहीं,उसमें कोमलता के लिए ठाँव ही नहीं है । उसमें तो है कठोरता, सम्पूर्ण शुष्कता । पिता सी अक्खड़ता है, एक तीक्ष्णता है ।
वह तपाती है, निखारती है । जीवन की समस्याओं से लड़ना सिखाती है । वह सिखाती है तितिक्षा । वह सिखाती है अनुशासन ।
क्योंकि बिना अनुशासन, जीवन कटी पतंग जैसा ही तो है ।
ऐसा नहीं है कि घाम किसी को पीड़ा पहुँचाना चाहे, वह तो कुम्हार की बाहिरी थाप है । जो आकार में ढालती है ।
मुझे तो दोनों प्रिय हैं । किंतु ग्रीष्म इसलिए प्राथमिक है क्योंकि ग्रीष्म में ही तो दिखता है विदा लेता सूर्य । और ले जाता है साथ, मेरे जीवन का एक दिन । तभी तो विदा लेते सूर्य को देख कर लगता है, की जैसे मुझसे मेरा अंश छूटा जा रहा है, और उभर आती है हममें रिक्तिता, एक खालीपन । जिसे भरता हूँ फिर, ठण्ड में सूर्य के स्नेह-लेप से ।
-- विनय एस तिवारी

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