..गुरुदेव तब से याज्ञक के मन को पढ़ रहे थे जब से वह ध्यान में बैठा था ।
उसकी अनुभूति भारद्वाज मुनि ने भी महसूस की थी इसीलिए याज्ञक के संभावित प्रश्नों के उत्तर की खोज में ध्यानमग्न हो गए ।
हे गुरुदेव ! मैंने आपके कहे अनुसार गंगा की चंचलता , पवित्रता और आवृत्ति को महसूस किया है, मुझे दिखाई दिया है ' जंगलों के बीच एक गाँव कुछ मृद्भाण्ड और एक लड़की की आवाज़ ।
" क्या मेरी नियति ने मुझे यही उपलब्धि लिखी है..?
क्या मेरी मंजिल यही है..?" -- यह कहकर याज्ञक विस्मयकारी नेत्रों से गुरुदेव की ओर देखा ।
तब ऋषिश्रेष्ठ ने आंखें खोलते हुए कहा. " मूल्य मंज़िल का या मिलने वाली उपलब्धि का नहीं होता वत्स, मूल्य रास्तों का है..मूल्य यात्राओं का है.., यात्राओं से मिलने वाले अनुभव का है, उपलब्धि तो प्रतीक मात्र है उन यात्राओं से पार होने का ।"
".. तो क्या मुझे भी यात्रा करनी चाहिए ?" - गुरुदेव के संकेत को समझते हुए याज्ञक ने पूँछा ।
" निःसंदेह ! तुम देवप्रयाग जाओ वहाँ मेरे गुरुभाई देवयादृ के आश्रम में जाना , वही तुम्हारी नियति बताएँगे ।
" पंद्रह दिन बाद यात्रियों का एक दल अयोध्या तक जाएगा उसके बाद आगे की यात्रा तुम्हें अकेले ही तय करनी होगी ।
गुरुदेव ने कहा ।
सुबह सरयू तट पर बैठा याज्ञक ध्यानमग्न था वह अपनी नियति एक एकात्म स्थापित करना चाहता था ।
लेकिन इसबार उसने महसूस किया कि वह और उसका कबीला बहा जा रहा है.. लोग बहे जा रहे है हर जगह कोलाहल व्याप्त है.., प्रलय की इस घोर गर्जना से वह घबरा कर आंखें खोल लिया , लेकिन सरयू तट पर सब शांत था,
फिर यह क्या था..? इस वीभत्स दृश्य से उसकी नाभि अस्त-व्यस्त हो गई , याज्ञक ने महसूस किया कि गुरुदेव ठीक कहते थे कि अगर अचानक कुछ वीभत्स हो तो जो असंभावित हो तो सबसे पहले हमारी नाभि अस्त-व्यस्त होती है ।
क्या वाकई यह पूर्व जन्म का यादांश है..? वह जानता है कि यह जानने के लिए उसे जाना होगा देवप्रयाग,.. जहाँ देवयादृ ,उनकी यज्ञपुत्री वैशाली तथा नियति इंतज़ार कर रहे हैं याज्ञक का । और याज्ञक चल पड़ता है इस कौतूहल भरी दुनियाँ में ।
(क्रमशः)
-- विनय एस तिवारी
उसकी अनुभूति भारद्वाज मुनि ने भी महसूस की थी इसीलिए याज्ञक के संभावित प्रश्नों के उत्तर की खोज में ध्यानमग्न हो गए ।
हे गुरुदेव ! मैंने आपके कहे अनुसार गंगा की चंचलता , पवित्रता और आवृत्ति को महसूस किया है, मुझे दिखाई दिया है ' जंगलों के बीच एक गाँव कुछ मृद्भाण्ड और एक लड़की की आवाज़ ।
" क्या मेरी नियति ने मुझे यही उपलब्धि लिखी है..?
क्या मेरी मंजिल यही है..?" -- यह कहकर याज्ञक विस्मयकारी नेत्रों से गुरुदेव की ओर देखा ।
तब ऋषिश्रेष्ठ ने आंखें खोलते हुए कहा. " मूल्य मंज़िल का या मिलने वाली उपलब्धि का नहीं होता वत्स, मूल्य रास्तों का है..मूल्य यात्राओं का है.., यात्राओं से मिलने वाले अनुभव का है, उपलब्धि तो प्रतीक मात्र है उन यात्राओं से पार होने का ।"
".. तो क्या मुझे भी यात्रा करनी चाहिए ?" - गुरुदेव के संकेत को समझते हुए याज्ञक ने पूँछा ।
" निःसंदेह ! तुम देवप्रयाग जाओ वहाँ मेरे गुरुभाई देवयादृ के आश्रम में जाना , वही तुम्हारी नियति बताएँगे ।
" पंद्रह दिन बाद यात्रियों का एक दल अयोध्या तक जाएगा उसके बाद आगे की यात्रा तुम्हें अकेले ही तय करनी होगी ।
गुरुदेव ने कहा ।
सुबह सरयू तट पर बैठा याज्ञक ध्यानमग्न था वह अपनी नियति एक एकात्म स्थापित करना चाहता था ।
लेकिन इसबार उसने महसूस किया कि वह और उसका कबीला बहा जा रहा है.. लोग बहे जा रहे है हर जगह कोलाहल व्याप्त है.., प्रलय की इस घोर गर्जना से वह घबरा कर आंखें खोल लिया , लेकिन सरयू तट पर सब शांत था,
फिर यह क्या था..? इस वीभत्स दृश्य से उसकी नाभि अस्त-व्यस्त हो गई , याज्ञक ने महसूस किया कि गुरुदेव ठीक कहते थे कि अगर अचानक कुछ वीभत्स हो तो जो असंभावित हो तो सबसे पहले हमारी नाभि अस्त-व्यस्त होती है ।
क्या वाकई यह पूर्व जन्म का यादांश है..? वह जानता है कि यह जानने के लिए उसे जाना होगा देवप्रयाग,.. जहाँ देवयादृ ,उनकी यज्ञपुत्री वैशाली तथा नियति इंतज़ार कर रहे हैं याज्ञक का । और याज्ञक चल पड़ता है इस कौतूहल भरी दुनियाँ में ।
(क्रमशः)
-- विनय एस तिवारी

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