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इफ ट्रुथ बी टोल्ड



परमहंस योगानन्द कृत 'योगी कथामृत' और आंशिक रूप से रॉबिन शर्मा की ' द मॉन्क सोल्ड हिज फेरारी ' ( सन्यासी जिसने अपनी संपत्ति बेंच दी ) के बाद अगर कोई पुस्तक मुझे पराभौतिक रस का रसास्वादन कराई है तो वह है ओम स्वामी कृत " इफ ट्रुथ बी टोल्ड " ( यदि सत्य कहूँ तो..) ।
इत्तेफाकन एक ही पुस्तक बची थी यह उस दुकान में, मानो मेरे लिए ही रखी थी ।
      यह एक गृहस्थ व्यक्ति के सन्यस्त होने की कहानी है, मूलतः यह संस्मरण है जिसका आरम्भ वाराणसी में किसी शांतिप्रिय घाट खोजने से होता है जहाँ एकांत मिल सके , जो लेखक को नहीं मिलते ।
कदाचित ओम स्वामी प्रयाग आए होते तो उन्हें मन पसंद घाट मिलता "राम घाट" मेरा स्वयं प्रिय घाट है जहाँ बड़ी आसानी से ध्यान लगाया जा सकता है , माँ गंगा को महसूस किया जा सकता है अपने अंदर ।

                   निश्चित ही मनुष्य के विचित्र प्रजाति है क्योंकि हमें जो भी प्राप्त होता है हम उससे भिन्न प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं । इस संस्मरण का एक गद्यांश मुझे जँचा जब वो तैलंग स्वामी के मठ जाते हैं तो वहाँ उनके शिष्य जो संभवतः उनका स्थान ले चुके थे उन्होंने स्वामी जी को कहा कि तुम्हें सामान्य जीवन जीना चाहिए तिस पर स्वामी जी का तर्क कि ' सामान्य जैसी कोई चीज कहाँ होती है ? जो एक कि दृष्टि से सामान्य होता है वही दूसरे की दृष्टि से अत्यंत असामान्य हो जाता है ।
एक योगी यह समझता है कि संसार असामान्य है और लोग खाते-पीते ,मैथुन करते जानवरों जैसा जीवन व्यतीत करते हैं, वहीं संसार सोचता है कि योगी मूर्ख होते हैं जो कुछ भी न करते हुए आप जीवन यूँ ही बिता देते हैं ।
                         मैं यहां दो शब्दों का भेद करना चाहूँगा प्रथम 'त्यागना' द्वितीय ' छोड़ना' ।
त्यागना एक ऐसी अवस्था है जब आप उक्त विषय/वस्तु से विरक्त हो जाते हैं अर्थात आपकी इन्द्रियाँ उसके प्रति अनासक्त हो जाती हैं यह पुकार आपके अन्तरनभ से आती है, जबकि छोड़ना एक मानसिक क्रिया है यह इसलिए होती है क्योंकि वह आपकी इंद्रियानुकूल नहीं होती ।
इसमें भीतर से एक लगाव जुड़ा होता है जो समय आने पर उभर आता है और आप उसके प्रति आतुरता से भर जाते हैं ।

 यहाँ स्वामी ओम ने अपना घर त्यागा था , सन्यासी बनने की चाह उनके भीतर से उठी थी यह संसार से विमुख होना या भाग जाना न था ।
यह अपने दायित्वों से विमुख होना न था ।

           अगर आप एक सन्यासी के जीवन की यात्रा करना चाहते हैं तो पढ़ डालिए ये किताब ।
निश्चित ही एक आनंदमयी रस से स्वयं को पूरित पाएँगे आप पुस्तकान्त में ।

© विनय एस तिवारी




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