पलास के फूल सी तुम

                        पलास का वृक्ष और उसकी छाँव



शुभे! तुम्हारी आंखों को,
मैं झील-ए-शराब नहीं कहता!
इसका अर्थ यह नहीं, कि मुझे
उनकी गहराइयों का भान नहीं!
कि उनके सौंदर्य की पहचान नहीं!
बल्कि इसलिए, क्योंकि ये उपमाएँ
दूषित हो चली हैं, पुरातन हो चली हैं ।

मैं तुम्हारे चेहरे को चंद्र-सम नहीं कहता,
इसलिए नहीं, कि तुम्हारे सौंदर्य पर मैं मोहित नहीं!
या मैं आतुर नहीं होता, तुम्हें
सर्वोत्कृष्ट रूपसी कहने को !
बल्कि इसलिए, क्योंकि इस उपमा का
सर्वाधिक निरादर किया है मानव ने ।

इसलिए मैं तुम्हारी उपमा करता हूँ, ‛पलास के फूल से!’
जैसे गर्मी की तपन में भी, दिलाते हैं-
मन को सुकून ये पलास के सुन्दर पुष्प-गुच्छ ।
इनकी लालिमा, तुम्हारे रक्तवर्णी चेहरे का प्रतीक है ।
इनकी शीतलता, तुम्हारी मधुरता का प्रतीक है ।
इसीलिए मुझे प्रिय हैं दोनों-
तुम्हारा पलासी-मुख औ पलास-वृक्ष ।

- विनय एस तिवारी

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