जब भाग्य में नहीं होता तो मिली वस्तु नहीं मिलती ।यह बात चरितार्थ हुई सुनीता के साथ । उसे वैढ़न से रीवा आने के लिए मैने फ्लाइट बुक किया था । उसके पास पहली बार फ्लाइट चढ़ने का अवसर था लेकिन भाग्य में नहीं लिखा तो क्योंकर आए? भाग्य में तो कार से ही आना लिखा था वो भी सोई हुई आधी रात में! भाग्य ऐसे ही काम करता है, जब जो नियत है वही होगा । यही बातें नियति को मान कर चलने में विश्वास दृढ़ करती हैं । अगर कोई यह कहे की यह भाग्य नहीं उसके चुनने की स्वतंत्रता या संकल्प स्वातंत्र्य था तो आखिर उसने वही क्यों चुना ? यदि इस प्रश्न पर गौर किया जाए तो फिर वही बात आ जाती है और जो प्रकट होता है वह यही कि परिस्थितियाँ ही ऐसी बनी । उसी दिन उसका ‘नेउरी नमय’ का व्रत फंसना, उसकी रक्षाबंधन तक रुकने की इच्छा बलवती होना आदि.. परंतु रक्षाबंधन मायके में मानना कहां लिखा था वो तो लिखा था गाँव में, सो BMO का आदेश आ गया और आना पड़ा । यहीं मानव का संकल्प स्वातंत्र्य की सीमितता का बोध होता है । विनय 16 अगस्त 2024
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