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एक काली चिड़िया और मेरे भीतर का द्वंद्व

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रात के लगभग आठ बजे का समय था। घर में एक शांत-सा सन्नाटा पसरा हुआ था। दिन का शोर थम चुका था और रात की स्थिरता धीरे-धीरे कमरे में उतर रही थी। तभी अचानक एक छोटी-सी चिड़िया मेरे कमरे में आ गई। आकार में वह गौरैया जैसी थी, पर उसका रंग काला था—जैसे वह उजाले से नहीं, किसी छाया से बनी हो। वह घबराई हुई थी। कभी पंख फड़फड़ाती, कभी दीवार की ओर उड़ती, कभी खिड़की के पास आकर ठहर जाती। ऐसा लग रहा था मानो वह कमरे में नहीं, किसी अनजाने डर में भटक रही हो। पहले ही क्षण मेरे भीतर करुणा जागी। लगा—यह कोई बेचारी प्राणी है जो गलती से मेरे संसार में आ गई है और अब बाहर जाने का रास्ता खोज रही है। मैंने उसके सामने थोड़ा-सा फल रखा, एक कटोरी में पानी भी रख दिया। लेकिन उसी समय मेरे छोटे से बेटे का ख्याल मन में आया। वह अभी इतना नन्हा है कि किसी भी डर को समझ नहीं सकता। इसलिए मैंने उसे धीरे से दूसरे कमरे में कर दिया—जैसे पहले उसके भय को सुरक्षित कर दूँ और फिर उस चिड़िया के लिए कुछ क्षण छोड़ दूँ। कुछ देर तक मैं चुपचाप खड़ा रहा। चिड़िया सामने रखे फल और पानी को देखती रही, पर शायद वह इतनी घबराई हुई थी कि वह कुछ भी ग्रहण ...