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Showing posts from March, 2018

एक रात में, जब मैं भी था.. और तुम भी थी

उस दिन अपने घर के सामने वाले पार्क में देर रात तक बैठे थे हम-दोनों । कदाचित पता होता ये हमारी आखिरी मुलाकात है..! जब देर रात घरों की रोशनी बुझ चुकी थी तब चाँदनी पूरे शहर के साथ अपने पार्क में भी दस्तक दे चुकी थी और मन के कहीं आखिरी छोर में दबा विषाद उभर आया था । चाँदी सी फैली ये चाँदनी तारों के अस्तित्व को ओझल न कर सकी थी.. । उस दिन सितारों की ओर देखते हुए तुमने कहा था, ' ये वही आसमान है जो कई अरब साल से है लेकिन इसकी ज़द में आने वाले कितने सितारे टूट चुके थे और न जाने कितने सितारे उन सितारों की जगह ले चुके थे । लेकिन इनमें होने वाली बदलाहट हम नहीं देख सकते न..?' इस गतिशील और नश्वर संसार में कदाचित हम जिस परमाणु से बने हैं वो उन टूटे सितारों का हिस्सा हो ! ' हाँ..। मैने गहरी सांस लेते हुए कहा । और क्या पता, हम दोनों का अस्तित्व एक ही पदार्थ से हुआ हो ! तभी तो हम एक दूसरे के करीब हैं..एक दूसरे के अंतर्भाव को समझ पा रहे हैं । तुम्हें पता है...? बहुधा हम जो देखते हैं उसे ही सच मानते हैं , लेकिन जरूरी नहीं कि हम जो देख रहे हैं वही सच हो । जैसे ऊपर सितारो...

उस दिन की तरह

हर  साल की तरह आज भी ऑफिस क्रिसमस पर बन्द थी सो आज आठ बजे सो के उठा जितनी गहरी नींद सुबह के तीन घंटे लगती है अच्छा थका होने पर भी उतनी अच्छी नींद नहीं लगती... अगर खिड़की से सूरज कमरे में दाखिल न होता तो शायद दस या ग्यारह बज गए होते.... खैर..!अब फ्रेश हो कर चाय बनाने जा रहा हूँ...खाना बनाने के लिए तो मैंने बाई लगाई है.. लेकिन चाय मैं सिर्फ अपने हाँथ की बनाई पीता हूँ या फिर मम्मी की...। हाँ..एक समय था जब एक और हाँथ की बनाई चाय मैं पीता था..। धीरे धीरे चाय खौल कर लाल हो रही थी.. कि अचानक डोर वेल बजने लगी.... कम्बख्त कौन आ टपका...! मैं बुदबुदाते हुए दरवाजे की और लपका । सर व्योमेश चंद्र आप ही हैं..? हाँ...' आपका लेटर आया है यहाँ साइन कर दीजिए.. .......तो कॉलेज में एल्युमिनी मीट है...इसी तीस तारीख को..? मैं व्हाट्सएप् के कॉलेज फ्रेंड्स ग्रुप में देखने लगा की कौन कौन आ रहे हैं.. 😶😶 ओ तेरी....!! चाय तो पूरी छनक गई होगी.. कहते कहते मैं दौड़ा... बैठे बैठे मैं एक एक चेहरे को याद कर रहा था.. पुनीत जो खुद से लंबी गर्लफ्रेंड बनाया था... ए से शुरू होने वाले नाम गिन रहा 'अ...