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With the some of precious person of my life


"When we all get togather it feels like blend of tea and I reached the place of book where ocean meet to sky."

I think we all r the character of a book which is just writing now by the writer.
I think someone is just right the story of our and we play role.
Role has decided by writer as like Maharshi Valmiki written Ramayana before the birth of Lord Ram and other.
Just see we all are from many states, many district but we met !!
It's not coincidence it's definitely define by the writer.
You all know ? I think we just move togather in one way but the stope will be come and we all move on own's way.
That time I miss you all.
But we have a time for get together till then let's enjoy every moment.
Your's
Vinay S Tiwari

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उस शाम

ब हुत दिन से मेरा मन कर रहा था कि गोविंदगढ़ में एक शाम गुजारूं.. इसलिए नहीं..कि वह मध्यप्रदेश के सबसे बड़े तालाबों में एक है , बल्कि इसलिए क्योंकि यह तालाब ज़िन्दगी का एक बिम्ब उकेर देता है.. प्राकृतिक परिदृश्य अनुपम है । मेरे 12वीं का आखिरी पेपर गणित का था जो दुबारा 24 मार्च 2014 को हुआ.. वो दिन मेरे स्कूल लाइफ का अंतिम और अविस्मरणीय दिन था.. हमने गोविंदगढ़ जाने रूपरेखा 24 को ही बनाया था लेकिन एक दिन बाद जाना तय हुआ । हम दो लोग थे एक तो मैं ही था दूसरा विराट था । मैं विराट के घर में ही रहता था..और अब हम दोनों अच्छे-खासे दोस्त हैं...। हम उसी की मोटरसाइकल से जा रहे थे......         हम चल पड़े थे प्रकृति की गोद में.. मानो वह हमारा इंतज़ार कर रही हो और हमें गोद में भर लेने को उत्सुक हो.. हम थोड़ा रफ़्तार में जा रहे थे क्योंकि सूरज ढलने वाला था और हमें अंदेशा था कि कहीं सूरज डूब न जाए.. लगभग आधी दूरी पहले से मोटेरसाइकल मैं चला रहा था जब हम उस मोड़ में मुड़ने लगे जो गोविंदगढ़ की ओर जाता है तो वहां कुछ पुलिस वाले दिखे मैं थोड़ा सहमा और आगे बढ़ गया........

विदा छिन्दवाड़ा!

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पलास के फूल सी तुम

                        पलास का वृक्ष और उसकी छाँव शुभे! तुम्हारी आंखों को, मैं झील-ए-शराब नहीं कहता! इसका अर्थ यह नहीं, कि मुझे उनकी गहराइयों का भान नहीं! कि उनके सौंदर्य की पहचान नहीं! बल्कि इसलिए, क्योंकि ये उपमाएँ दूषित हो चली हैं, पुरातन हो चली हैं । मैं तुम्हारे चेहरे को चंद्र-सम नहीं कहता, इसलिए नहीं, कि तुम्हारे सौंदर्य पर मैं मोहित नहीं! या मैं आतुर नहीं होता, तुम्हें सर्वोत्कृष्ट रूपसी कहने को ! बल्कि इसलिए, क्योंकि इस उपमा का सर्वाधिक निरादर किया है मानव ने । इसलिए मैं तुम्हारी उपमा करता हूँ, ‛पलास के फूल से!’ जैसे गर्मी की तपन में भी, दिलाते हैं- मन को सुकून ये पलास के सुन्दर पुष्प-गुच्छ । इनकी लालिमा, तुम्हारे रक्तवर्णी चेहरे का प्रतीक है । इनकी शीतलता, तुम्हारी मधुरता का प्रतीक है । इसीलिए मुझे प्रिय हैं दोनों- तुम्हारा पलासी-मुख औ पलास-वृक्ष । - विनय एस तिवारी