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गर्मियों की साँझ

         गोविंदगढ़ तालाब, रीवा. 26.03.2014

मेंरे लिए, गर्मियों की शामें अक्सर उदासीनता से भरी होती हैं ।
साँझ की रक्तवर्णी रंगीयता जाने क्यों मन को अवसाद से भर देती है! जबकि हम जानते हैं, कि कल सूरज फिर निकलेगा, फिर घाम होगा और फिर साँझ ।
नियति का यह क्रम नियत है । जाने क्यों, सूर्य का विदा होना, अपने साथ उत्सुकता और उन्मुक्तता को भी साथ ले जाता है! और भर देता है एक अज्ञात व्याकुलता से मुझे ।

“ मैं देख रहा हूँ, सूर्य-अस्त होते पश्चिम में,
उभर रहा वैराग्य अचानक, मन-अवसादी!
हाय! विभा, तेरा जाना यूँ तोड़ रहा है,
ज्यों, दिनेश मेरा अन्तस् ही निचोड़ रहा है ।”

ये सच है, कि रात इस धरित्री को एक नए रंग में रँग देती है, किन्तु इसका आरम्भ तो साँझ से ही होता है न!
तब,क्या यह रंगीयता अपने साथ असारता का भी बोध लाती है?
क्या यह विषाद, वस्तुओं को स्पष्ट न देख पाने की व्यथा का परिणाम है?
क्या मानव ने दिन को इतना स्वीकार लिया है, कि दिन के प्रकाश का विदा होना, उसके स्वयं के अंश का विदा होना हो जाता है?
या फिर इसलिए, कि यह प्रतीक है मृत्यु का, और मृत्यु की तो सहधर्मिणी है ही उदासी ।
इस उदासी के दर्द ने ही तो सिखलाया है मुझे, कि  जब, मुझ जैसे व्यक्ति से प्रकाश का विदा होना, विषाद और एकाकी होने का आरम्भ होना होता है, तो कदाचित किसी तारे का टूटना भला कितना पीड़ाकारी होता होगा! क्योंकि वह तो उसका अंश है ही ।
या जब कोई तारा, जिस दिन अपने समस्त प्रकाश को अलविदा कहता होगा, वह दारुण्य दृश्य कितना मर्मस्पर्शी और रुदन से भरा होता होगा! कौन जाने?
शायद इसीलिए, नियति ने मानव को पहला उपहार रुदन दिया है?

कौन जाने क्या रिश्ता है इन रश्मियों से मेरा?
कि इनका जाना, मुझे आकुलता से भर देता है!
कि जिसके बिना भर जाता हूँ मैं विषाद से और उभर आता है एक अजीब और अनजान सा खालीपन। कौन जाने?

- विनय एस तिवारी

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