अंशू का मुंडन संस्कार

24 जुलाई 2026

आज का दिन अंशू  के जीवन के प्रथम संस्कारों में से एक—उसके मुंडन संस्कार—का पावन अवसर था। घर में कई दिनों से इसकी तैयारी थी और आज वह शुभ घड़ी भी आ गई। हम सब प्रातः ही मैहर देवी माँ के दर्शन और अंशू के संस्कार के लिए निकल पड़े। आशा दी, गुड़िया दीदी, भाभी, रिंकू और आयुष, पवन जीजा, प्रमोद, उनकी मम्मी (भाभी) तथा जर्मई वाली भाभी—सभी साथ थे। इतने अपने एक साथ हों तो यात्रा केवल स्थान परिवर्तन नहीं रहती, वह अपनेपन का चलता-फिरता उत्सव बन जाती है।

किन्तु इस उल्लास के बीच कुछ रिक्त स्थान भी थे, जो बार-बार मन को छू जाते थे। पापा और मम्मी इस यात्रा में साथ नहीं आ सके। पापा की ओपन हार्ट सर्जरी के बाद अब भी लंबी यात्राएँ उनके लिए कष्टदायक हो जाती हैं, और मम्मी को यात्रा में उल्टियों की इतनी समस्या होती है कि पहुँचते-पहुँचते ही उनका स्वास्थ्य बिगड़ जाता है। मन बार-बार चाहता था कि वे भी अंशू के इस प्रथम संस्कार के साक्षी बनते, पर जीवन में हर इच्छा तत्काल पूर्ण हो जाए, ऐसा कहाँ होता है?

गुड्डू भइया का न आ पाना भी भीतर कहीं खलता रहा। मन में आशा थी कि यदि संजय भइया की जमानत हो जाती तो वे भी आ जाते, किंतु न्यायालय में सुनवाई ही टल गई। कुछ प्रतीक्षाएँ मनुष्य करता है, कुछ प्रतीक्षाएँ समय स्वयं कराता है। शायद ईश्वर ने अभी उस मिलन का समय सुरक्षित रखा है।

देवी का मंदिर पर्वत-शिखर पर स्थित है। वहाँ तक पहुँचने के लिए लगभग एक सहस्त्र सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। हमारे साथ कुछ ऐसे लोग थे जिनके लिए इतनी लंबी चढ़ाई कठिन होती, इसलिए निश्चय हुआ कि सभी लोग रोप-वे से ही ऊपर जाएँगे।

रोप-वे की लंबी कतार को देखकर लगा कि आज का मनुष्य सुविधा के अधिक निकट और श्रम के कुछ दूर खड़ा हो गया है। शायद यह समय की माँग भी है; जीवन की दौड़ ने उसे विश्राम का अभिलाषी बना दिया है। मैं किसी के चुनाव का निर्णय नहीं करता, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की अपनी परिस्थितियाँ होती हैं। किंतु अपने मन की बात कहूँ तो जब तक शरीर स्वस्थ और समर्थ है, पर्वत की सीढ़ियाँ मुझे प्रार्थना का ही विस्तार लगती हैं। प्रत्येक पग मानो अहंकार को थोड़ा-थोड़ा पीछे छोड़ता हुआ श्रद्धा के और निकट ले जाता है। जिस चित्-शक्ति के मूर्त स्वरूप के दर्शन के लिए हम जा रहे हों, वहाँ तक पहुँचने में यदि तन का थोड़ा श्रम भी लग जाए, तो वह श्रम नहीं, भक्ति का मौन अर्घ्य बन जाता है। वृद्धावस्था आएगी तो उसका भी सम्मान करूँगा, क्योंकि वह काल का विधान है; पर आज जब पैरों में सामर्थ्य है, तब सीढ़ियाँ मुझे रोप-वे से कहीं अधिक आत्मीय प्रतीत होती हैं।


आज मुंडन का बड़ा मुहूर्त था। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो आने वाला प्रत्येक तीसरा व्यक्ति अपने बच्चे का मुंडन कराने ही आया हो। हम प्रातः नौ बजे ही मंदिर की पार्किंग में पहुँच गए थे, किंतु रोप-वे का समय एक से दो बजे का मिला। फिर बीच में दर्शन कुछ समय के लिए बंद हो गए, जिससे और विलंब हुआ। अंततः लगभग चार बजे हमें रोप-वे में बैठने का अवसर मिला और साढ़े चार बजे तक माता के दर्शन सम्पन्न हुए।

इतनी प्रतीक्षा के कारण अनेक परिवारों ने रोप-वे में जाने से पहले ही अपने बच्चों का मुंडन करवा लिया था। एक क्षण को हमने भी ऐसा करने का विचार किया, किंतु सुनीता ने बड़े सहज भाव से कहा—"हम मुंडन संस्कार के लिए ही आए हैं, इसलिए अंशू पहले अपनी झालर सहित माता के दर्शन करेगा, उसके बाद ही उसके केश उतारे जाएँगे।" उसके इस आग्रह में श्रद्धा की ऐसी सरलता थी कि फिर कोई दूसरा विचार मन में आया ही नहीं। सच ही है, संस्कार केवल कर्मकाण्ड से नहीं, भावना से पूर्ण होते हैं।

दर्शन के पश्चात् अंशू का मुंडन सम्पन्न हुआ। आश्चर्य यह कि उसने तनिक भी रोना नहीं। वह पूरे समय कौतूहल से इधर-उधर देखता रहा। रिंकू ने उसके हाथ में मोबाइल दे दिया और देखते-देखते पूरा संस्कार बड़ी सहजता से संपन्न हो गया।

मुंडन के बाद जब मैंने उसे देखा तो लगा जैसे उसका सौंदर्य और अधिक उज्ज्वल हो उठा हो। उसका निर्मल मस्तक किसी नवोदित चन्द्रमा की शीतल आभा बिखेर रहा था। तभी मन में एक सुंदर कल्पना उभरी—शायद अंशू का जन्म महाशिवरात्रि से एक दिन पूर्व इसलिए हुआ कि वह भगवान शिव के जटाजूट में सुशोभित शशांक की भाँति इस संसार में अपनी निष्कलुष मुस्कान से प्रकाश फैलाए। उस क्षण उसका मुख सचमुच चन्द्र-कला-सा शांत और मोहक लग रहा था।

संस्कार के उपरांत हम सबने साथ बैठकर भोजन किया। पूड़ियाँ गाँव में बनी थीं और सब्ज़ी रीवा में। घर से आया हुआ भोजन केवल स्वाद नहीं देता, वह अपने लोगों का स्नेह भी साथ लेकर आता है। खुले आकाश के नीचे, परिवार के बीच बैठकर किया गया वह साधारण भोजन भी किसी राजभोज से कम नहीं लगा।

संध्या ढलते-ढलते विदा का समय आ गया। लगभग नौ बजे हम रीवा लौट आए। मन की इच्छा थी कि मैं, सुनीता और अंशू गाँव भी चले जाएँ, ताकि पापा-मम्मी का आशीर्वाद अंशू को मिल सके। किंतु छह तारीख को मेरी परीक्षा है। सुनीता ने व्यावहारिक पक्ष सामने रखा—अभी जाने पर दो छुट्टियाँ लेनी पड़ेंगी, और यदि भइया की जमानत हो गई तो गाँव जाना ही होगा।

इसलिए आज की रात एक छोटी-सी प्रार्थना के साथ समाप्त हो रही है। ईश्वर से यही निवेदन है कि पापा शीघ्र पूर्ण स्वस्थ हों, मम्मी प्रसन्न रहें, भइया के जीवन में भी शुभ समाचार आए और परिवार के सभी बिखरे हुए क्षण पुनः एक साथ बैठ सकें। यदि परमात्मा की कृपा से ऐसा हो गया, तो आज का यह संस्कार केवल अंशू के जीवन का ही नहीं, पूरे परिवार के जीवन का भी एक पूर्ण मंगल अध्याय बन जाएगा।

आज का दिन स्मृतियों में चिरस्थायी हो गया। समय के साथ अंशू के सिर पर फिर केश आ जाएँगे, पर आज उसकी निष्कलुष मुस्कान, माता के चरणों में उसका प्रथम संस्कार और परिवार के प्रेम से भरा यह दिन मेरे हृदय की डायरी में सदैव उज्ज्वल बना रहेगा।

विनय

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