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ग्रीष्म की साँझ

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                                    (गर्मी की एक साँझ)                       मेरे लिए, गर्मियों की शामें अक्सर उदासीनता से भरी होती हैं । यह गर्मियों की साँझ ही है , जब मेरे लिए एकांत की चाहना सर्वाधिक प्रबल होती है । साँझ की रक्तवर्णी रंगीयता, इसके साथ आकाश की अभेद्य आकाशीय-नीलिमा, और हर तरफ सूखे-वृक्ष, जिनकी हरित-पत्तियों को तपन ने भष्म कर दिया है, इन्हें देख कर जाने क्यों मन अवसाद से भर जाता है! जबकि हम जानते हैं, कि कल सूरज फिर निकलेगा, फिर घाम होगा और फिर साँझ । नियति का यह क्रम नियत है । जाने क्यों, सूर्य का विदा होना, अपने साथ उत्सुकता और उन्मुक्तता को भी साथ ले जाता है! और भर देता है एक अज्ञात व्याकुलता से मुझे । “मैं देख रहा हूँ, सूर्य-अस्त होते पश्चिम में, उभर रहा वैराग्य अचानक, मन-अवसादी! हाय! विभा तेरा जाना, यूँ तोड़ रहा है, ज्यों, दिनेश मेरा अंतस ही निचोड़ रहा है ।” ये सच है, कि रात इस धरित्री को एक नए रंग में रँग दे...

I want to die while you love me - Douglas Johnson

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                  (  पेंटिंग: इलाहाबाद विश्वविद्यालय के बी.एफ.ए. फाइन आर्ट के एक स्टूडेंट द्वारा) मैं तुम्हारे प्यार में रह प्राण खोना चाहती हूँ, जबकि मेरी रूपता तुममें बसी हो, और जबकी होंठ में मेरे हँसी हो, और मेरे केश में आभा बसी हो । मैं तुम्हारे प्यार में रह प्राण खोना चाहती हूँ, और अब भी बिस्तरों में जो मिले थे! हूँ संभाले सब तुम्हारे उग्र चुम्बन, उस वक्त के स्नेह ख़ातिर, जब मरूँ मैं । मैं तुम्हारे प्यार में रह प्राण खोना चाहती हूँ, ओह्ह! ऐसा कौन जीवन चाहता है? प्रेम में जब शेष भी कुछ न बचा हो, माँगने को, और न ही सौंपने को । मैं तुम्हारे प्यार में रह प्राण खोना चाहती हूँ, कभी भी-जरा सा भी नहीं, इस पूर्णता के दिवस की गरिमा- देखो! न ही मद्धम पड़े या रुके कहीं । - Georgia Douglas Johnson हिन्दी अनुवाद: विनय एस तिवारी

फरवरी- जिसमें होते हैं सूर्य के दो आयाम

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इस समय, सूर्य के प्रकाश का रंग पिलछौंह् से श्वेत की ओर निरंतर अग्रसर है, यानी सूर्य देव उत्तरायण होने की ओर अग्रसर हैं, इस समय ठण्ड के विदा लेने और ग्रीष्म के स्वागत की उत्सुकता निरंतर बलवती हो रही है । मुझमें शुष्क और अलसाई साँझ को नग्न आंखों से देखने का कौतूहल बढ़ता जा रहा है । फरवरी मुझे प्रिय है । इसलिए नहीं, कि यह बसन्त का मौसम है । बल्कि इसलिए क्योंकि फरवरी एक ऐसा माह है- जिसमें सूर्य की हम दो छटाएँ देख सकते हैं, एक धूप दूसरा घाम। हम देख सकते हैं, सूर्य द्वारा अस्ताचल की अवस्थित को दक्षिण से पश्चिम की ओर खिसकाते हुए । मैं देख सकता हूँ अपनी आँखों से सूर्य को विदा ले कर जाते हुए, दूर क्षितिज तक । क्योंकि विदा ही तो अंतिम सत्य है । हम सभी मिलते हैं और एक वक्त बाद विदा हो जाते हैं । इसलिए विदा प्रिय है मुझे, क्योंकि किसी के चले जाने से जो व्यक्ति में एक खालीपन उभरता है, वह वास्तविक होता है, बनावटी नहीं । यह धूप से घाम होने की कथा है, विवरण है । धूप, सूर्य का वह प्रकाश है जो कोमल है । जिसके स्नेह-लेप के लिए शीत ऋतु में जाने कितने जीव लालायित रहते हैं, स्वयं मानव भी । वस्तुतः ‛ध...

नरगिस के फूल सरीखे, सुन्दर आंखों वाली लड़की के जन्मदिवस पर!

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मुझे वह पहली कक्षा में नहीं मिली थी। दरअसल ‛पहली कक्षा’ मैंने उस स्कूल में पढ़ा ही नहीं, उस स्कूल में तो मैं ‛दूसरी’ में गया था। वह, दूसरी और तीसरी कक्षा में भी नहीं आई थी, वह तो आई चौथी में । अक्सर मैं स्कूल-सत्र शुरू होने के काफी दिन बाद स्कूल जाता था । ये जुलाई 2005 का मध्य था, और मेरा कक्षा चौथी के सेसन का पहला दिन, जब मुझे पता चला कि क्लास में एक बेहद खूबसूरत सी दिखने वाली एक लड़की आई है, मैं क्लास में गया तो वाकई एक ‛क्यूट’ सी दिखने वाली लड़की, लड़कियों के बेंच में दूसरे नम्बर की सीट पर ठीक बीच में बैठी थी । मैंने गौर से देखा तो उसके बाल महज़ उसके कंधों को छू रहे थे, कंधे को छूते उसके सुलझे बालों में मैं उलझ गया था पहली बार! जिसे देख कर मुझे पहली बार लगा कि मुझे इससे बात करनी चाहिए, पर अक्सर मेरा शर्मीला स्वभाव रोड़ा बन जाता था, उससे बात करने में । फिर एक दिन! जब वो स्कूल आ रही थी, तो उससे पहली बार मैंने अपने रूम और स्कूल के पास वाले मैदान में मैंने बात की । क्या बात की ये तो याद नहीं लेकिन हाँ, उस दिन से मेरी उससे यदा कदा बात होने लगी । ऐ संदेशवाहक मेघ! जैसे तुमने कालिद...

गर्मियों की साँझ

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         गोविंदगढ़ तालाब, रीवा. 26.03.2014 में रे लिए, गर्मियों की शामें अक्सर उदासीनता से भरी होती हैं । साँझ की रक्तवर्णी रंगीयता जाने क्यों मन को अवसाद से भर देती है! जबकि हम जानते हैं, कि कल सूरज फिर निकलेगा, फिर घाम होगा और फिर साँझ । नियति का यह क्रम नियत है । जाने क्यों, सूर्य का विदा होना, अपने साथ उत्सुकता और उन्मुक्तता को भी साथ ले जाता है! और भर देता है एक अज्ञात व्याकुलता से मुझे । “ मैं देख रहा हूँ, सूर्य-अस्त होते पश्चिम में, उभर रहा वैराग्य अचानक, मन-अवसादी! हाय! विभा, तेरा जाना यूँ तोड़ रहा है, ज्यों, दिनेश मेरा अन्तस् ही निचोड़ रहा है ।” ये सच है, कि रात इस धरित्री को एक नए रंग में रँग देती है, किन्तु इसका आरम्भ तो साँझ से ही होता है न! तब,क्या यह रंगीयता अपने साथ असारता का भी बोध लाती है? क्या यह विषाद, वस्तुओं को स्पष्ट न देख पाने की व्यथा का परिणाम है? क्या मानव ने दिन को इतना स्वीकार लिया है, कि दिन के प्रकाश का विदा होना, उसके स्वयं के अंश का विदा होना हो जाता है? या फिर इसलिए, कि यह प्रतीक है मृत्यु का, और मृत्यु की तो सह...

डूबता सूर्य, साँझ और मैं...

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मुझे गर्मियों में साँझ के समय सूरज का पीला प्रकाश हमेशा से पसंद है, इसीलिए मुझे आकर्षित भी करता है । जब शुष्क वातावरण के साथ में लू के मद्धम होते थपेड़े चेहरे को स्पर्श करते हैं, तो सिहरन से पूरा बदन रोमांच से भर जाता है, परिपक्व हो चुकी सूर्य-रश्मियाँ जिस कोमलता से मेरे शरीर को छूती है, उस छुअन से मात्र मेरा शरीर ही नहीं, मेरा मन और स्वयं मैं भी इस सूर्य और वायु-स्नान से शुद्ध हो कर आनंदित हो जाता हूँ । मैं सूर्य से स्वयं तक पहुँचती किरणों को देखता हूँ और जुड़ जाता हूँ, सूर्य से इन रश्मि-सेतु के द्वारा और ठीक इसी समय स्पर्श करती वायु मुझे धन्यता से भर देती है । जब भी मुझे ग्रीष्म की संध्या का विचार आता है तो जागृत हो उठता है मेरी स्मृतियों में, तीन ओर से पहाड़ों से घिरा " त्रिगिरी " कस्बा । इसकी विशेषता ही ये है कि, यह तीन ओर से पहाड़ों से घिरा हुआ है, जिससे अमूमन चलने वाली हवाएँ तीनों पर्वतों से टकरा कर वापस पूर्व दिशा की ओर मुड़ जाती हैं । टकराने से बने दबाव के कारण इनकी रफ्तार सामान्य से कहीं अधिक होती है । इसीलिए, ग्रीष्म की साँझ में वायु-स्नान का जो आनंद यहाँ मिलत...

सुनो! शाश्वत-हिम गिरि, मैं जरूर आऊँगा..

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मैंने नहीं देखा है हिमालय । मैं उस दृश्य का साक्षी नहीं बना हूँ, जब दिन में हिमशिखरों से बादल हटते हैं और दिखता है सूर्य-रश्मियों से सज्जित स्वर्ण-शिखर । मैंने तो कसौनी भी नहीं देखा, और न ही रानीखेत । मैंने स्याह सड़कों पर जमी बर्फ ‛ ब्लैक-आइस’ नहीं देखी । मैंने देखा है तो अपने गाँव में ऊँचा पहाड़ और जब भी उसे बादल से घिरते देखता हूँ, तो अनायास ही कल्पना करता हूँ कि, अब बादल हटेंगे और दिखेगा पहाड़ का मुकुट हिममयी । तब, मैं कहता हूँ हिमालय से, सुनो! शाश्वत-हिम गिरि, मैं जरूर आऊँगा, मैं आऊँगा अपने लिए तुम्हें देखने । तब क्या तुम मुझे दिखाओगे अपनी सौंदर्यता? अपनी मोहकता?, क्या दोगे तुम मुझे शून्यता? क्या दे सकोगे मुझे वह परम रहस्य, जो नचिकेता ने जानना चाहा था, मृत्यु के देवता से ? हे मेरे मीत हिमालय! मैं अभी मैदान की सपाटता के सौंदर्य को जी रहा हूँ, मैं अभी गवाह बन रहा हूँ गङ्गा और यमुना के मिलन का । मैं पूर्णिमा में चन्द्र की श्वेत-किरणों को गङ्गा के कछार में पड़ते ही, रेत से प्रकीर्णित आभा के दृश्य का सौंदर्य चख रहा हूँ ।               ...