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डूबता सूर्य, साँझ और मैं...




मुझे गर्मियों में साँझ के समय सूरज का पीला प्रकाश हमेशा से पसंद है, इसीलिए मुझे आकर्षित भी करता है । जब शुष्क वातावरण के साथ में लू के मद्धम होते थपेड़े चेहरे को स्पर्श करते हैं, तो सिहरन से पूरा बदन रोमांच से भर जाता है, परिपक्व हो चुकी सूर्य-रश्मियाँ जिस कोमलता से मेरे शरीर को छूती है, उस छुअन से मात्र मेरा शरीर ही नहीं, मेरा मन और स्वयं मैं भी इस सूर्य और वायु-स्नान से शुद्ध हो कर आनंदित हो जाता हूँ । मैं सूर्य से स्वयं तक पहुँचती किरणों को देखता हूँ और जुड़ जाता हूँ, सूर्य से इन रश्मि-सेतु के द्वारा और ठीक इसी समय स्पर्श करती वायु मुझे धन्यता से भर देती है ।

जब भी मुझे ग्रीष्म की संध्या का विचार आता है तो जागृत हो उठता है मेरी स्मृतियों में, तीन ओर से पहाड़ों से घिरा " त्रिगिरी " कस्बा ।

इसकी विशेषता ही ये है कि, यह तीन ओर से पहाड़ों से घिरा हुआ है, जिससे अमूमन चलने वाली हवाएँ तीनों पर्वतों से टकरा कर वापस पूर्व दिशा की ओर मुड़ जाती हैं । टकराने से बने दबाव के कारण इनकी रफ्तार सामान्य से कहीं अधिक होती है ।
इसीलिए, ग्रीष्म की साँझ में वायु-स्नान का जो आनंद यहाँ मिलता है, वो शायद ही कहीं और हो!
अपनी दोनों बाहें फैला कर, पके घाम में वायु का आलिंगन एक पूर्णता से भर देता है ।
संभवतः यह प्रतीति प्रकृति और पुरुष के मिलन से ही होती हो, जैसा कि सांख्य कहता है ।

किन्तु वायु के स्पर्श का अनुभव करते ही रोम-रोम रोमांच से भर जाता है ।
और इसी आनंद के क्षण में विदा लेता सूर्य अपनी रश्मियों के साथ छिप जाता है पर्वत की ओट में, अस्त होने से पूर्व ही! और बिखेर जाता है नभ में रक्तवर्णी प्रकाश ।

- Vinay Ś Tiwari | विनय एस तिवारी

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