उस दिन कॉलेज में मेरा पहला दिन था । इसीलिए मैं थोड़ी जल्दी कॉलेज पहुँच गई थी और मेरी स्कूल फ्रेंड तृशा भी मेरे साथ थी, मैं मेडिवल हिस्ट्री डिपार्टमेंट में घूम रही थी जो मेरा सब्जेक्ट भी था, मैंने सोचा जब तक क्लासेस नहीं खुल जातीं घूम लिया जाए...। मैं क्लास से कुछ दूरी पर थी क्लास खुल गई थी कुछ बच्चे भी आ गए थे, तभी एक लड़का बाहर से हॉल में आया ,एक अजीब सी ऊर्जा थी उसमें ,उसका चेहरा खिला था .. ज़ीरो साइज दाढ़ी कर रखी थी उसने जो एक विशेष नक्श में थी, उसने कैप लगा रखा था ।
कुलमिलाकर वो बहुत स्मार्ट लग रहा था । मेरे पांव रुक गए मैं उसे देखती रही.. अनायास मैं भगवान से मनाने लगी ' हे भगवान ! वो मेरी ही क्लास में हो..' । वो उसी क्लास में गया -मेरी क्लास में । मैं इतनी खुश हो गई थी कि मुट्ठी बाँध कर नाच उठी थी ।
वो मुझसे दो टेबल पीछे बैठा था लेकिन मेरा मन तो उसमें ही था.. मैं बदल गई थी एकदम से..
तृशा परेशान हो गई थी और उसने कहा कि तुझे प्यार तो नहीं हो गया...?
हाँ.. सच में मुझे प्यार हो गया था...
मैंने ध्यान दिया वो भी मुझे देखता था.. और गाहें-बगाहें हमारी नज़र मिल जाती तो मुझसे पहले वो झुका लेता.. मैं समझ गई थी की वो बहुत शर्मीला है... लेकिन उसकी ये बात मुझे अच्छी लगी.. यही बात क्या मुझे तो समूचा वो ही अच्छा लगता था । और हाँ.. मैं समझ गई थी थी की वो एक बहुत अच्छा इंसान है ।
एक दिन मुझसे पानी माँगा, मुझे यक़ीन है उसने खुद से बड़ी जिद्दोजेहद की होगी तब जाके हिम्मत जुटा पाया होगा । उसका विवेक नाम था, विवेक उच्चकुल का लड़का था और मैं...निम्न तबके और कुल की ।
मुझे पता था कि उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता.. लेकिन आखिरी में शायद हमे अलग होना ही होता या फिर हम अपने अपने परिवार को छोड़ के दूर चले जाते, मैं ये नहीं चाहती थी । इसीलिए वो जब भी बात करने की कोशिश करता मैं रूखेपन सा बर्ताव करती । लेकिन मैं एक लड़की हूँ..जिसे दिल में बसा लिया वो मेरे लिए भगवान बन जाता है इसीलिए तो हम स्त्रियां जब प्यार करती हैं तो आँख बंद कर लेती हैं ।
23 जनवरी के दिन जब मैं गुलाबी रंग की पैरासूट वाली जैकेट पहन कर आई थी जिसे मेरी सभी सहेलियां कह रही थी की नहीं अच्छी लग रही, लेकिन जिस तरह से अपनी अंगुली और अंगूठे को जोड़ कर उसने कहा था ' जँच रही हो,👌'
उस पल मैं एकबार फिर उसकी दीवानी हो गई थी । कॉलेज के आखिरी दिन जब सब लोग फोटो खींच रहे थे याद के लिए वो भी खिंचवा रहा था लेकिन मैं एक खाली क्लास की खिड़की से देख रही थी कि उसकी निग़ाह मुझे ही ढूंढ़ रही है
मैं देख रही थी की जिस क्लास में मैं पेपर दे रही थी उस क्लास में उसका जाना, तृशा से मेरे बारे में पूँछना, और तृशा का ये कहना की मैं आज जल्दी चली गई... ये सुनकर विवेक का बेचैन होना..।
मैं देख रही थी की ये सुनकर उसकी आँखे भीग आई थीं, मैंने महसूस किया कि मेरी आँखों से भी आंसूं ढरक आए हैं ।
मेरा जी चाह रहा था कि मैं उसे जा के रोक लूँ और लिपट कर कहूँ कि मत जाओ विवेक ।मैं सदा के लिए तुम्हें दिल में बसा लेना चाहती हूँ..मैं तुम्हारे साथ जीना चाहती हूँ लेकिन मैं अपने ख़्वाब पूरा नहीं कर सकती थी ..
मुझे आज रो लेना उतना नहीं अखर रहा था जितना उसके पास जाके दूर होने के बाद का दर्द ।
मैंने उसे चले जाने दिया..मुझे पता नहीं मैंने अच्छा किया या बुरा लेकिन आज भी मेरी आँखे उसे देखना चाहती हैं..
उसके अल्हड़पन में ,उसके मनमौजीपन में मैं भी उसके साथ होना चाहती हूँ..
आज फिर मैं वही गुलाबी पैरासूट जैकेट पहन कर गई थी, इस उम्मीद पर की शायद आज वो फिर आए और कहे -" जँच रही हो । 👌"

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