है धन्य भारतवर्ष हर युग जन्मती है पुरुष ऐसे ,
अपने समय के पृष्ठ में हैं प्राण फूंके पुरुष ऐसे ,
फिर एक बार जब भारती में घोर संकट आया था..!
तब यही सृजनाढ्य धरती 'चणक-पुत्र' उगाया था ।
हर तर्क जिसके मति बदल दे, वाक दुश्मन गति बदल दे ;
सोच ऐसी थी जो ढलते सूर्य की स्थिति बदल दे ..,
आँख ऐसी थी जो खोजे चंद्रगुप्त में एक राजन !
जिनका फेंका एक तिनका राज-पाठ हटाया था...
जिसने कहा था दुश्मनो को, एहसास बस इतना दिला दो !
विजय पर वो बढ़ रहे हैं, अंत में पांसा पलट दो !
कम शक्ति से,कम हानि से,कम जन गँवाए ...!
कमजोरियों पर वार करके, शत्रु को दिग्भ्रमित करके ;
विजय श्री का स्वाद पाएँ ।
हम फिर प्रतीक्षित हैं नियंता भेज दे गुरु श्रेष्ठ मानव,
फिर वही तूफान दे जो राष्ट्र अखण्ड बनाया था ।
-- विनय एस तिवारी

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