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शबनम, चाँदनी और तुम



अभी-अभी तो शबनम घास की बाहों में ठहरी है..
और अभी पूरा चाँद भी निकल आया है , और देखो.. इसकी चांदनी इन ओस की बूंदों में ऐसे चमक रही है जैसे तुम्हारे आने की खुशी में नैसर्ग ने हजारों दीपक जला रखे हों...
तुम्हारे वनवास से लौटने की खुशी में,
हाँ.. इन्हीं शबनमी दीपकों के दरम्यां बैठा हूँ मैं ! तेरी झूठी इन्तज़ारी में ..........
# और_तुम_आओ
Vinay S Tiwari

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उस शाम

ब हुत दिन से मेरा मन कर रहा था कि गोविंदगढ़ में एक शाम गुजारूं.. इसलिए नहीं..कि वह मध्यप्रदेश के सबसे बड़े तालाबों में एक है , बल्कि इसलिए क्योंकि यह तालाब ज़िन्दगी का एक बिम्ब उकेर देता है.. प्राकृतिक परिदृश्य अनुपम है । मेरे 12वीं का आखिरी पेपर गणित का था जो दुबारा 24 मार्च 2014 को हुआ.. वो दिन मेरे स्कूल लाइफ का अंतिम और अविस्मरणीय दिन था.. हमने गोविंदगढ़ जाने रूपरेखा 24 को ही बनाया था लेकिन एक दिन बाद जाना तय हुआ । हम दो लोग थे एक तो मैं ही था दूसरा विराट था । मैं विराट के घर में ही रहता था..और अब हम दोनों अच्छे-खासे दोस्त हैं...। हम उसी की मोटरसाइकल से जा रहे थे......         हम चल पड़े थे प्रकृति की गोद में.. मानो वह हमारा इंतज़ार कर रही हो और हमें गोद में भर लेने को उत्सुक हो.. हम थोड़ा रफ़्तार में जा रहे थे क्योंकि सूरज ढलने वाला था और हमें अंदेशा था कि कहीं सूरज डूब न जाए.. लगभग आधी दूरी पहले से मोटेरसाइकल मैं चला रहा था जब हम उस मोड़ में मुड़ने लगे जो गोविंदगढ़ की ओर जाता है तो वहां कुछ पुलिस वाले दिखे मैं थोड़ा सहमा और आगे बढ़ गया........

विदा छिन्दवाड़ा!

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पलास के फूल सी तुम

                        पलास का वृक्ष और उसकी छाँव शुभे! तुम्हारी आंखों को, मैं झील-ए-शराब नहीं कहता! इसका अर्थ यह नहीं, कि मुझे उनकी गहराइयों का भान नहीं! कि उनके सौंदर्य की पहचान नहीं! बल्कि इसलिए, क्योंकि ये उपमाएँ दूषित हो चली हैं, पुरातन हो चली हैं । मैं तुम्हारे चेहरे को चंद्र-सम नहीं कहता, इसलिए नहीं, कि तुम्हारे सौंदर्य पर मैं मोहित नहीं! या मैं आतुर नहीं होता, तुम्हें सर्वोत्कृष्ट रूपसी कहने को ! बल्कि इसलिए, क्योंकि इस उपमा का सर्वाधिक निरादर किया है मानव ने । इसलिए मैं तुम्हारी उपमा करता हूँ, ‛पलास के फूल से!’ जैसे गर्मी की तपन में भी, दिलाते हैं- मन को सुकून ये पलास के सुन्दर पुष्प-गुच्छ । इनकी लालिमा, तुम्हारे रक्तवर्णी चेहरे का प्रतीक है । इनकी शीतलता, तुम्हारी मधुरता का प्रतीक है । इसीलिए मुझे प्रिय हैं दोनों- तुम्हारा पलासी-मुख औ पलास-वृक्ष । - विनय एस तिवारी