याज्ञक (भाग-1)



हज़ारों साल पुरानी गंगा अपनी पवित्रता और शून्यता समाए हुए उस दिन भी बह रही थीं..।

समय ईसा के पाँच सौ साल पहले का है.. प्रयाग की पुण्य भूमि और माँ गंगा के तट पर शिष्य 'याज्ञक' अपने गुरु की दीक्षा के अनुसार गंगा की लहरों को महसूस करने की कोशिश कर रहा था.., बार-बार उसे उसके गुरु ऋषि श्रेष्ठ भारद्वाज के शब्द याद आ रहे थे कि " इतने शून्य हो जाओ कि स्वयं के अस्तित्व को महसूस कर सको, शून्य में होना ही विराट में होना है , जब तुम्हारी आवृत्ति गंगा की आवृत्ति से मेल करेगी तब तुम स्वयं में महसूस कर सकोगे गंगा को.., और तुम्हारी आत्मा पवित्र हो सकेगी.., और यहीं से शुरू होगा तुम्हारी नियति तक पहुँचने का मार्ग ।



         शिष्य बैठा रहा ध्यानमग्न होकर सुबह के बैठे सांझ हो गई, सूर्य अस्ताचल की सीमा तक पहुंच गया और हवाएँ एक लय से बहने लगी थी ।
गुरुदेव ठीक कहा करते थे कि "जब तुम प्राकृतिक होने लगते हो तो समूची प्रकृति तुम्हारे साथ हो जाती है..।"
वह अब पूरी तरह शांत हो चुका था, गंगा के कलरव को स्वयं में महसूस करने लगा था । जैसे वह भी आंदोलित हो उठा था वह एक स्वर्गीय आनंद में खो गया ।
उसे दिखाई देने लगा एक गाँव जो चारों ओर से जंगलों से घिरा है.. कुछ विशेष आकृतियों वाले मृदभांड ।
और सुनाई थी एक लड़की के हँसने की आवाज़ !!

.......क्या यही उसकी नियति है..? या वहाँ तक पहुँचने के सफर में उसकी नियति है !!!
यही सवाल लेकर याज्ञक चल पड़ता है अपने गुरु के पास....।
क्रमशः
--- विनय एस तिवारी

Comments

  1. प्रकृति के हम जितना निकट जाते है उतनी ही सुहावनी लगती है...इसका प्रबंधन अचार्यजनक लगता है...और हमें शांति का अहसास होता है।

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  2. अति सुंदर..👍👌

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  3. अतिसुंदर सराहनीय रचना तिवारी जी

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