हर पूर्ववर्ती वर्ष की तरह सामयिक वर्ष में 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मानते हैं और खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं ,ऐसे शिक्षकों से शिक्षा प्राप्त कर जिनकी शिक्षण पद्धति साक्षरता से एक कदम आगे बढ़ कर विद्यार्थियों को शिक्षित करने की है । उनका यह कदम अत्यंत महत्वपूर्ण है भारत के शैक्षिणिक विकास के लिए ।
किन्तु, क्या हम एक कदम और आगे नहीं बढ़ सकते ?
क्या हम लोगों में पुस्तकें पढ़ने की अभिरूचि पैदा नहीं कर सकते ?
मैंने सुना है रूस में हर गांव में पब्लिक लाइब्रेरी है जिसमें जब भी लोग काम से फुर्सत होते हैं तो जा कर अध्ययन करते हैं...।
और हमारे यहाँ गांव में तो दूर शहरों तक में लोग काम के बाद अपना सारा समय हास-परिहास और उपहास में गुजारते हैं ।
मैं रीवा के सेंट्रल लाइब्रेरी में अपने विद्यालयीन दिनों में जाता था और मुझे इस बात से आश्चर्य होता था कि लोग उसका नाम तक नहीं जानते थे ..!
एक जर्जर भवन जिस पर छोटे से उपेक्षित पड़े बोर्ड पर 'केंद्रीय पुस्तकालय ' लिखा था जिसके केन् और पुस्त मिट चुका था । और उसमें जाते भी चन्द गिने चुने लोग थे । बहुधा उसके कर्मचारी ही पाठक भी हुआ करते थे ।
अगर हम सच में शिक्षा की क्रांति चाहते हैं तो लोगों में किताबों के प्रति रूचि पैदा करनी होगी ,एक अभीप्सा एक कौतूहल पैदा करनी होगी ।
हम इस बात से संतुष्ट रहते हैं कि हमारा बेटा अपने कक्षा की पुस्तकें पढ़ ले बस । यह नितांत तौर पर आवश्यक है पर क्या इन किताबों से इतर कोई और किताब खाली समय में नहीं पढ़ सकता ।
थोड़ा बड़े होने पर हमारा रुख एक और पुस्तक तरफ होता है तुलसीदास जी की 'रामचरित मानस' । लोग उसकी चौपाइयों का क्या खूब उद्धरण करते हैं कि स्वयं तुलसीदास जी भी शरमा जाएं । लेकिन हम समझते नहीं ,जीवन में उतारते नहीं ।
ठीक उसी तरह जैसे शहद मीठी है कहने से स्वाद नहीं मिलता , उसे चखना पड़ता है ।
जो खुद को थोड़ा बड़े बुद्धिजीवी मानते हैं वो 'श्रीमद्भागवत '
को पढ़ते हैं । ध्यान देने वाली बात ये है उनकी भी यह पढ़ने की प्रवृत्ति नैसर्गिक नहीं है एक दिखावा है बस कुछ विद्वज्जनों को छोड़ कर जो यथार्थ में जिज्ञासावश अध्ययन करते हैं...
जबकि उनका उद्देश्य लोगों के बीच चौपाइयों ,श्लोकों को बांच कर अपना प्रभुत्व स्थापित करना होता है ।
तो इस शिक्षक दिवस क्यों न हम रूचि पैदा करें पढ़ने के प्रति और इसकी शुरुआत विद्यालय से ही संभव है ।
अस्तु , आप सभी को शिक्षक दिवस की कोटि-कोटि शुभकामनाएँ ।
किन्तु, क्या हम एक कदम और आगे नहीं बढ़ सकते ?
क्या हम लोगों में पुस्तकें पढ़ने की अभिरूचि पैदा नहीं कर सकते ?
मैंने सुना है रूस में हर गांव में पब्लिक लाइब्रेरी है जिसमें जब भी लोग काम से फुर्सत होते हैं तो जा कर अध्ययन करते हैं...।
और हमारे यहाँ गांव में तो दूर शहरों तक में लोग काम के बाद अपना सारा समय हास-परिहास और उपहास में गुजारते हैं ।
मैं रीवा के सेंट्रल लाइब्रेरी में अपने विद्यालयीन दिनों में जाता था और मुझे इस बात से आश्चर्य होता था कि लोग उसका नाम तक नहीं जानते थे ..!
एक जर्जर भवन जिस पर छोटे से उपेक्षित पड़े बोर्ड पर 'केंद्रीय पुस्तकालय ' लिखा था जिसके केन् और पुस्त मिट चुका था । और उसमें जाते भी चन्द गिने चुने लोग थे । बहुधा उसके कर्मचारी ही पाठक भी हुआ करते थे ।
अगर हम सच में शिक्षा की क्रांति चाहते हैं तो लोगों में किताबों के प्रति रूचि पैदा करनी होगी ,एक अभीप्सा एक कौतूहल पैदा करनी होगी ।
हम इस बात से संतुष्ट रहते हैं कि हमारा बेटा अपने कक्षा की पुस्तकें पढ़ ले बस । यह नितांत तौर पर आवश्यक है पर क्या इन किताबों से इतर कोई और किताब खाली समय में नहीं पढ़ सकता ।
थोड़ा बड़े होने पर हमारा रुख एक और पुस्तक तरफ होता है तुलसीदास जी की 'रामचरित मानस' । लोग उसकी चौपाइयों का क्या खूब उद्धरण करते हैं कि स्वयं तुलसीदास जी भी शरमा जाएं । लेकिन हम समझते नहीं ,जीवन में उतारते नहीं ।
ठीक उसी तरह जैसे शहद मीठी है कहने से स्वाद नहीं मिलता , उसे चखना पड़ता है ।
जो खुद को थोड़ा बड़े बुद्धिजीवी मानते हैं वो 'श्रीमद्भागवत '
को पढ़ते हैं । ध्यान देने वाली बात ये है उनकी भी यह पढ़ने की प्रवृत्ति नैसर्गिक नहीं है एक दिखावा है बस कुछ विद्वज्जनों को छोड़ कर जो यथार्थ में जिज्ञासावश अध्ययन करते हैं...
जबकि उनका उद्देश्य लोगों के बीच चौपाइयों ,श्लोकों को बांच कर अपना प्रभुत्व स्थापित करना होता है ।
तो इस शिक्षक दिवस क्यों न हम रूचि पैदा करें पढ़ने के प्रति और इसकी शुरुआत विद्यालय से ही संभव है ।
अस्तु , आप सभी को शिक्षक दिवस की कोटि-कोटि शुभकामनाएँ ।
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