नवीं के ठीक बाद,
..जुलाई से हमारी कक्षाएँ आरम्भ हो चुकी थीं । हमारा सेक्शन सी ही था
और सबसे दिलचस्प बात ये थी कि हमारे क्लास टीचर श्री आई.एस. डी. सर थे । क्लास की दिनचर्या वही थी कि प्रार्थना के बाद क्लास में अटेंडेंस ली जाती थी, फिर क्लासेस शुरू ।
जैसा पहले ही बता चुका हूँ कि हम पूरी पीरियड नहीं अटेंड करते थे । ये परंपरा हमने नहीं बल्कि हमारे सीनियर्स ने आरम्भ की थी ।
हमें ये लगता था कि श्री आई एस डी सर को मेरा नाम तो न ही पता होगा क्योंकि न तो हम इंग्लिश के टॉपर थे और न ही इतने वाचाल किस्म के थे ।
लेकिन आश्चर्य मुझे उस दिन हुआ जब मैं रफ से खुद को हवा कर रहा था तो सर ने कहा " विनय इतनी गर्मी नहीं लग रही क्लास में !!"
मेरे लिए क्लास रुक गई थी क्लास ही क्या पूरी सृष्टि रुक गई थी उस पल...।
कितना सुखद आश्चर्य होता है न ,जब आपको आपके पसंदीदा व्यक्ति आपके नाम से पुकारें !!
फिर मैं अपनी बेतरतीबी कम करने लगा था ।
दूसरी पीरियड होती थी विज्ञान की । विज्ञान हमें श्री राजेन्द्र मिश्रा सर पढ़ाते थे ।
लेकिन पहले ही दिन उन्होंने कहा कि ' मैं जो भी पढ़ाऊंगा वो अगले दिन बोर्ड में लिखना पड़ेगा और जो भी नहीं लिखा उसकी धुनाई शुरू !!'
पूरी क्लास सन्न !!
लेकिन मुझे पता नहीं क्यों बहुत खुशी हुई ।
खुशी इस बात से नहीं कि मुझसे बन जाएगा , खुशी इस बात से हुई कि मेरे क्लास के लड़के जो बड़े पढोकर बन रहे हैं सबको अपनी जमीन दिखेगी !
क्योंकि बहुतेरे इस भ्रम में जी रहे थे कि वो बड़े तेज हैं । यद्यपि उनमेसे कुछ अवश्य तेज थे ।
दूसरे दिन जाते जाते सर ने कहा था कि कल मैं दर्पण पूछूँगा !
क्योंकि उस दिन उन्होंने पढ़ाया था ।
दूसरे दिन जब सर ने कहा कि कौन कौन बताना चाहता है तो कई ने हाँथ उठाया, लेकिन मैंने नहीं ।
क्योंकि मेरा मानना था कि जिसका जबाब सबके पास हो उसे देने में कोई सार्थकता नहीं जब कोई न हो तब बताया जाए ।
दूसरी जो बड़ी वजह रही मेरी शर्म और मेरी ज्यादा न बोलने की आदत जो संभवतः आज भी है ।
तो मैंने हाँथ नहीं उठाया लेकिन जब किसी ने सर की मर्जी मुताबिक न बताया तब आखिरी में मैंने हाँथ उठाया । मैं कैसा समझाया ये मुझे तब एहसास हुआ जैसे ही मैंने अपना लेक्चर बन्द किया और पूरी क्लास तालियों से गूँज गई ।
लेकिन इन्हीं तालियों के बीच मैने सर की ओर देखा क्योंकि मुझे लग रहा था कि अगर उन्हें न जँचा तो पिटाई तय ।
लेकिन जैसे ही मैंने उनके चेहरे में खुशी की झलक देखी मैं नाच उठा ।
उस दिन मुझे एहसास हुआ कि मैं एक टीचर बन सकता हूँ । मेरा आत्मविश्वास लौट आया ।
बात कुछ दिन बाद की है जब हमारे बोर्ड के फॉर्म आने वाले थे तब श्री आई एस डी सर प्रिंटेड बायो-डाटा मँगा रहे थे ।
उन्होंने एक हफ्ते का टाइम दिया और लगभग आधे बच्चों ने दो-तीन दिन में ही जमा कर दिया ।
मैं भी अगर खुद से बनवाता तो दूसरे दिन ही जमा कर दिया होता लेकिन वीरेंद्र ( जो नवीं में आखिरी में दोस्त बना था ) ने कहा की मेरे पड़ोस में एक बनाते हैं उनसे बनवा दूँगा । मैंने भी सोचा चलो ये बनवा लेगा तो क्यों परेशान हों मैंने भी दे दिया ।
लेकिन वो रोज बहाने बना देता मुझे नहीं पता वो बहाने सच थे या झूठ ।
लेकिन आखिरी दिन जब सर ने कहा कि किस किस ने बायो डाटा नहीं जमा किया तो लगभग मेरे साथ आधी क्लास खड़ी हो गई ।
और सर ने पिटाई शुरू की मैं सबसे दाहिनी रो में था सो मेरा आखिरी नंबर था
लेकिन जब एक लड़का पिट रहा था ( स्मरण नहीं हो रहा कौन था ) तो हर डंडे पर उसकी जीभ निकल आती जिससे मुझे हँसी आ जाती , इसका आलम ये हुआ कि सर ने मुझे देख लिया हँसते और इत्तेफ़ाक़न मेरे तक पहुँचते पहुँचते लता की बेंत टूट चुकी थी ।
और परिणीति में मुझे हाँथ से दो चाटे पड़े ।
इस वकया से मुझे जो सबसे बड़ी सीख मिली वो ये की अपना काम खुद करो तभी समय में होगा ।
फिर मुझे याद आई वो कहानी " जिसमें किसी गेंहूँ के खेत में एक चिड़िया अंडे देती है कुछ दिन बाद जब उसके बच्चे थोड़े बड़े होते हैं तो एक दिन मालिक आता है और कहता है कि गेंहू कटवा दो, फिर कहता है कल मजदूर बुला कर कटवा दो जिसे सुनकर चिड़िया के बच्चे कहते हैं कि वो गेहूँ कटवा देगा चलो
तिस पर उनकी माँ कहती है गेहूँ कल नहीं कटेंगे अगले दिन किसान फिर आता है और कहता है कल हम खुद काटेंगे तब चिड़िया अपने बच्चे लेकर उड़ जाती है ।"
दसवीं में ही कुलदीप मेरे साथ आया । वो मुझसे एक साल पीछे था , छोटी छोटी और कहानियाँ हुई उन पर चर्चा विस्तार से फिर कभी ।
दसवीं में ही मैं थ्रो-बॉल में स्टेट गया और इसमें पी टी आई सर श्री शिष्टधर शर्मा सर का आशीर्वाद और स्नेह था ।
हम फिर क्लास में आते हैं , दूसरी पीरियड के बाद दस मिनट का ब्रेक होता था फिर संस्कृत की पीरियड और इसके बाद गणित की ।
संस्कृत हमें श्री उमाकांत द्विवेदी सर पढ़ाते थे मैं उनसे पहले से परिचित था क्योंकि वो मेरे रिश्ते में लगते थे , गणित मुझे श्री नीरज पांडे सर पढ़ाते थे ।
शुरू में मैं इनके ज्यादा नजदीक नहीं था बल्कि मैं ही नहीं लगभग पूरी क्लास ।
कारण ये था कि गणित की पीरियड हमारे क्लास में अंग्रेजी मीडियम के स्टूडेंट भी आते थे चूंकि उनकी संख्या कम थी तो एक पीरियड हमारे साथ आते थे तो पाण्डेय सर उन्हें कुछ ज्यादा ही मानते थे उनके मन में संभवतः ये धारणा थी कि अंग्रेजी माध्यम का कमजोर बच्चा भी हिंदी माध्यम के बच्चों से ज्यादा पढ़ाकू होता है ।
ठीक वैसे जैसे " अखाड़े का पिटइया भी बाहर वालों से मजबूत होता है ।"
इसके लिए उन्होंने उनके लिए एक पूरी रो (row ) ही छुड़वा दिए जिससे हमें पीछे बैठना पड़ता था या हम उस रो में बैठें तो जब वो आए तो बैग नीचे फेंक दें ।
उस समय श्री आई एस डी सर के पैर में चोट आ गई थी या शायद एक्सीडेंट हो गया था मुझे स्पष्ट स्मरण नहीं है किंतु जब हमने शिकायत की तो सर क्लास आए मैथ की पीरियड में और निराकरण हुआ कि लड़कियों की दो सीट छोड़ कर जो बाद में आए वो जहाँ सीट पाए वहाँ बैठे ।
हालाँकि हम दो सीट छोड़ कर ही बैठते थे सो फैसला हमारे पक्ष में हुआ ।
बाद में नीरज सर हम लोगों को भी मानने लगे ।
लंच के बाद लगती थी शोभा मेम की क्लास जो हमे सोशल साइंस पढ़ाती थीं । आरम्भ में मैं उनकी क्लास किया किन्तु एकबार जब उन्होंने मुझसे पूंछा दोहरी नागरिकता के बारे में तो मैंने उन्हें बताया तिस पर उन्होंने कहा कि किताब रट के बता रहे और बेवजह दो छड़ी मार दीं सो उस दिन से हम शुरू के चार पीरियड पढ़ के खेल की प्रैक्टिस में लग जाते थे । हालाँकि बाद में वो भी मुझे मानने लगीं थीं कैसे ! ये फिर कभी ।
इस तरह हमारी दशवीं भी समाप्त हो गई ।
इस दशवीं में कुछ लोग जो मेरे बेहद करीब आए उनमें मेरे क्लास टीचर और साइंस टीचर मेरे दोस्तों में शुभम , अर्पित , और कुछ कुछ वेरेन्द्र , देवेंद्र ।
अस्तु, मेरी ज़िंदगी मेरे अपने बलबूते पर नहीं खड़ी है इसमें मेरे माता-पिता , भाई-बहन से लेकर गुरुजनो और मित्रों तक का अमूल्य सहयोग है सो सबका कोटि कोटि धन्यवाद ।
"जीवन के इस पग तक आने में कितनों की इच्छाएँ टूटीं ,
कितनों के उर तक पहुँच सका, ये तो कहना मुश्किल है ।
मुझे बड़ी उम्मीद बंधीं है और संभलती जाती है,
कितनो का है प्रेम मेरे तक, कितनों की अभिलाषाएँ हैं,
किन्तु कहाँ तक पहुँच सकूँगा ये तो कहना मुश्किल है ।"

क्या वर्णन है। सब कुछ याद आ गया स्कूल के समय का।
ReplyDeleteसधन्यवाद।।।।
यार मै c section मे तो नही था पर पूरा अहसास किया दिल से।
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