(बरदहा घाट )
डभौरा, मध्यप्रदेश के उत्तर पूर्वी सीमांत की ओर से तथा रीवा जिले का पहला रेलवे स्टेशन है ।
पहला दोनों आयामों में । यानी एक तो रीवा राज्य ( वर्तमान रीवा जिले ) का सबसे पहला स्टेशन , दूसरा मध्यप्रदेश के उत्तर पश्चिमी सीमा का पहला स्टेशन ( सीमा में ) ।
इसी डभौरा से बस चलना शुरू करती है तो बरहुला,अतरैला होते हुए लगभग आधी दूरी तय करते ही सीना तान कर बाहें फैलाए दिखाई देता है 'बरदहा घाट' ।
बरदहा घाट रीवा-पन्ना के पठार का पूर्वी छोर है । जिसकी प्राकृतिक लावण्यता देखते ही मानवी नेत्र विस्मय और आनंद से सराबोर हो जाते हैं । जिसकी हरीतिमा देखते ही मंत्रमुग्ध हो जाता है मानव मन ।
वर्षा काल में प्रस्फुटित अस्थाई झरनों की अनगिनत श्रृंखलाओं के कोलाहलिक संगीत नव स्फूर्ति से भर देता है मानवी देह को ।
शताब्दियों का साक्षी 'बरदहा घाट'
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यथा मुम्बई से पुणे को जोड़ता है 'भोर घाट' , केरल से तमिलनाडु को जोड़ता है 'पाल घाट' ।
जैसे स्लोवाकिया को पोलैंड से जोड़ता है ' टाट्रा पर्वत श्रृंखला ' ठीक वैसे ही डभौरा को रीवा से जोड़ता है 'बरदहा घाट' ।
जैसे स्लोवाकिया को पोलैंड से जोड़ता है ' टाट्रा पर्वत श्रृंखला ' ठीक वैसे ही डभौरा को रीवा से जोड़ता है 'बरदहा घाट' ।
डभौरा, मध्यप्रदेश के उत्तर पूर्वी सीमांत की ओर से तथा रीवा जिले का पहला रेलवे स्टेशन है ।
पहला दोनों आयामों में । यानी एक तो रीवा राज्य ( वर्तमान रीवा जिले ) का सबसे पहला स्टेशन , दूसरा मध्यप्रदेश के उत्तर पश्चिमी सीमा का पहला स्टेशन ( सीमा में ) ।
जो इलाहाबाद ( प्रयाग ) से मुम्बई रुट की सभी चिघाड़ती रेलगाड़ियों का बाहें फैलाए स्वागत करता है मध्यप्रदेश में ।जो आगे बढ़ते हुए प्रदेश पार पहुंचती है महाराष्ट्र ।
इसी डभौरा से बस चलना शुरू करती है तो बरहुला,अतरैला होते हुए लगभग आधी दूरी तय करते ही सीना तान कर बाहें फैलाए दिखाई देता है 'बरदहा घाट' ।
बरदहा घाट रीवा-पन्ना के पठार का पूर्वी छोर है । जिसकी प्राकृतिक लावण्यता देखते ही मानवी नेत्र विस्मय और आनंद से सराबोर हो जाते हैं । जिसकी हरीतिमा देखते ही मंत्रमुग्ध हो जाता है मानव मन ।
वर्षा काल में प्रस्फुटित अस्थाई झरनों की अनगिनत श्रृंखलाओं के कोलाहलिक संगीत नव स्फूर्ति से भर देता है मानवी देह को ।
और जब गर्मियों की तपन इसकी हरियाली को पतझड़ में रूपांतरित करती है तब भी पलास के लाल फूलों से स्वागत करता है ये घाट ।
इसके आसपास टमस (टोंस) नदी की दुग्ध धारा , चचाई जलप्रपात, पावन घिनौची धाम ( लघु झरनों की दुनियाँ )
आदि हैं । मूलतः प्राकृतिक धनाढ्य है विंध्य का ये अंश ।
श्रुतियाँ कहती हैं कि वनवास काल में भगवान राम इन्हीं पर्वत श्रृंखलाओं को पार करते बढ़ गए थे दंडकारण्य ।
आदि हैं । मूलतः प्राकृतिक धनाढ्य है विंध्य का ये अंश ।
श्रुतियाँ कहती हैं कि वनवास काल में भगवान राम इन्हीं पर्वत श्रृंखलाओं को पार करते बढ़ गए थे दंडकारण्य ।
लोग आए गए , सदियाँ आई गईं, किन्तु यह घाट आज भी वही सुरभित हवा, प्राकृतिक लावण्यता समेटे दोनो बाहें फैलाए, वही चिर-परिचित अल्हड़पन से हृदयंगम के लिए आतुर है हमेशा की तरह ।
इति ।
विनय एस तिवारी

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