मुझे समुद्र तट में बैठना ज्यादा सुकूनभरा होगा पर्वत के अपेक्षाकृत ।
मैं ज्यादा समय वहाँ बिता सकूँगा पर्वत की तुलना में ।
इसके कई कारण हैं, किंतु, सबसे बड़ा कारण ये है कि समुद्र तट में एक तरह का स्वाभाविक खुलापन होता है जो पर्वत में नहीं, पर्वत लैंड लॉक्ड सरीखे होता है । इसलिए आप समुद्र में ज्यादा तरोताज़ा महसूस करेंगें ।
और पर्वत में सबसे कमी ये है कि ये आपको जमीन से दूर कर देता है जिससे जमीन पर आने की प्रवृत्ति बलवती होती जाती है ।
समुद्रतटीय शहर जैसे लंदन, जैसे न्यूयॉर्क, जैसे इंदिरा पॉइन्ट ( अंडमान निकोबार द्वीपसमूह ) अधिक आनंदप्रद होते हैं ।
वहाँ बयार खुलेपन से आकर आपको स्पर्श करेगी जबकि पहाड़ों में हवा बँधी बँधी सी लगती है ।
पहाड़ी हवाओं में किसी दूसरे देश से संदेश लाने का अनुभव भी नहीं है ।
जैसे किसी दूर देश से सदियों पहले समुद्री व्यापारियों का प्रेम संदेशा आया करता था ,
कभी हवाओं से तो कभी समुद्र से आने वाले समुद्री जहाजों से ।
पहाड़ में उतार है चढ़ाव है, जबकि समुद्र तट दोनों ओर समतल ।
इसीलिए मन ज्यादा देर पहाड़ में नहीं रह सकता ।
पहाड़ अल्पकालिक सुकूनी जगह है जबकि समुद्र तट दीर्घ कालिक ।
आप समुद्र तट में एक झोपड़ी लगाकर बैठ जाइए तो जो सुकून मिलेगा, वो पहाड़ पर बनी जगह नहीं दे सकती ।
हाँ, जब जी भर जाता है समतल से तो फिर चाह उठती है पहाड़ की ।
फिर पसंद आते हैं उतार-चढ़ाव ।
फिर आप निकल लेते हैं देखने गगनचुम्बी चोटियों की ऊँचाई और चढ़ाई को महसूस करने ।
विनय एस तिवारी

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