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नरगिस के फूल सरीखे, सुन्दर आंखों वाली लड़की के जन्मदिवस पर!





मुझे वह पहली कक्षा में नहीं मिली थी। दरअसल ‛पहली कक्षा’ मैंने उस स्कूल में पढ़ा ही नहीं, उस स्कूल में तो मैं ‛दूसरी’ में गया था।
वह, दूसरी और तीसरी कक्षा में भी नहीं आई थी, वह तो आई चौथी में ।
अक्सर मैं स्कूल-सत्र शुरू होने के काफी दिन बाद स्कूल जाता था । ये जुलाई 2005 का मध्य था, और मेरा कक्षा चौथी के सेसन का पहला दिन, जब मुझे पता चला कि क्लास में एक बेहद खूबसूरत सी दिखने वाली एक लड़की आई है, मैं क्लास में गया तो वाकई एक ‛क्यूट’ सी दिखने वाली लड़की, लड़कियों के बेंच में दूसरे नम्बर की सीट पर ठीक बीच में बैठी थी ।
मैंने गौर से देखा तो उसके बाल महज़ उसके कंधों को छू रहे थे, कंधे को छूते उसके सुलझे बालों में मैं उलझ गया था पहली बार!
जिसे देख कर मुझे पहली बार लगा कि मुझे इससे बात करनी चाहिए, पर अक्सर मेरा शर्मीला स्वभाव रोड़ा बन जाता था, उससे बात करने में ।

फिर एक दिन! जब वो स्कूल आ रही थी, तो उससे पहली बार मैंने अपने रूम और स्कूल के पास वाले मैदान में मैंने बात की । क्या बात की ये तो याद नहीं लेकिन हाँ, उस दिन से मेरी उससे यदा कदा बात होने लगी ।

ऐ संदेशवाहक मेघ! जैसे तुमने कालिदास की मेघदूतम् में यक्ष का संदेश अलकापुरी तक पहुँचाया था, वैसे ही मेरा संदेश भी पहुँचा सकोगे?

ओ मेंहदी की हरी पत्तियों! क्या तुम उसकी कमल सी कोमल हथेलियों को ठीक वैसे ही रच सकोगी?
जैसे तुमने रचा था दुष्यन्तला का कोमल हस्त!
या जैसे जानकी का मृदुल हस्त! इसी मेंहदी से रची हथेलियों से गुजरे कंगनों के नगों में देखा था जानकी ने, भगवान राम की छवि ।


और फिर, ये तो जगजाहिर है न! कि, “पहला हमेशा पहला होता है, आखिरी आखिरी कभी नहीं!”
और तुम मेरे ज़िंदगी की पहली हो!

एक साल के बाद ही मेरी स्कूल से बदली हो गई, मेरा स्कूल, मेरे दोस्त सब पीछे छूट गए, लेकिन उनकी उजली यादें मेरे जेहन में थीं और उन यादों में सबसे उजला चेहरा तुम्हारा था । फिर एक रोज मैंने तुम्हें देखा अखबार के पन्ने पर, उस स्कूल की दसवीं कक्षा में अव्वल आने वाले तीन विद्याथियों की सूची में। मेरा दिल जोर से धड़कने लगा एकबार फिर!

लेकिन वक्त की धूल ने मेरे जेहन से उस वक्त का हर एक चेहरा ढक दिया और शेष रह गए सिर्फ नाम!
ये सच ही है, कि समय की धूल, स्मृतियों में छपे चित्रों को धूमिल कर देती है, और यदि स्मृतियों का पुनःदृश्यांकन न हो तो ये चित्र, विदा हो जाते हैं हमेशा के लिए, और खण्डहर में बचते हैं, सिर्फ आरेख!
वो नाम,जिनसे मेरा बचपना पूर्ण था, ये वो नाम थे जिनका जिक्र आते ही मैं कितने ही अकेलेपन क्षणों में भी मुस्कुरा उठता, और फिर तुम्हारी एक मीठी मुस्कान जो यादों में कैद थी, मुझे अकेलेपन के थपेड़ों से बाहर ला देती, और मैं मुस्कुरा देता ।

सुनो! नरगिस के फूल सरीखे सुन्दर आंखों वाली लड़की,
“हैप्पी बर्थडे टू यू!”




- विनय एस तिवारी

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