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मेरे ही व्यक्तित्व-पथ के सहयात्री-- ‛अज्ञेय’


जिसका जन्म होता है उसका मृत्यु भी वरण करती है किन्तु
ऐसा तो कम ही होता है!

दुनियाँ के हर संस्कृति, सभ्यता और नैसर्ग की अनेकेन अभिव्यंजनाओं के सौंदर्य के पारखी, साहित्य के दैदीप्यमान सितारे,
जिनका मैं सह-पथिक, मेरे सर्वप्रिय कवि-लेखक सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन ‛अज्ञेय’ दुनियाँ की तमाम जगहों को पार करते-करते अपने जन्मदिवस 07 मार्च को भी पार कर के ही स्वर्गलोक की यात्रा 04 अप्रैल को आरम्भ किये ।

जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यु भी होती है किन्तु
ऐसा तो कम ही होता है न!!
कि कोई दुनियाँ की यात्रा करते-करते अपने जन्म दिनाङ्क को पार करके ही स्वर्ग की यात्रा आरम्भ करे ।
मेरे सह-पथिक, सह-व्यक्तित्व अज्ञेय को पुण्यतिथि पर नमन ।

अज्ञेय की पसंदीदा अंग्रेजी रचनाओं में एक, जिसे अनूदित किया है मैंने हिन्दी में अज्ञेय ख़ातिर--

"My candle burns at both ends
It will not last the night;
But ah, my foes, and oh, my friends -
It gives a lovely light."

“मेरे जीवन की दीप्ति ज्वलित है दोनों छोरों से,
ये समूची रात नहीं जल पाएगी;
किन्तु आह! ओ शत्रु मेरे,
और ओह! मित्र मेरे,
यह दीप्ति बड़ी प्यारी लगती है ।”
-- Edna St. Vincent Millay


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उस शाम

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