विदा!


 
क्या बस शरीर के दूर हुए जाने में छिपी विदा है?
या फिर मन के टूटने और जुड़ने में छिपी विदा है?
यदि शरीर के दूर हुए जाने से उदित विदा है!
तो दिनेश से इतनी दूर भी, कैसे जुड़ी विभा है?
कुछ तो है सूक्ष्म, जो नग्न नयन की हद से दूर खड़ा है!
जिस तरह सूर्य-शशि को विलोक,खिंच जाता जलधि सदा है!
- विनय एस तिवारी

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