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“..क्योंकि जिंदगी अपने निकृष्टतम रूप में भी मौत के सर्वश्रेष्ठ ढंग से बेहतर होती है”- कैसे?


मैंने अनुराग भइया का लेख पढ़ा । जिसमें उन्होंने लिखा था, 
“जिंदगी अपने निकृष्टतम रूप में भी मौत के सर्वश्रेष्ठ ढंग से बेहतर होती है ।” 


आइए देखते हैं कैसे? 
सर्वप्रथम जीवन के मूल्य को समझते हैं, तत्पश्चात मृत्यु के उस पार की सूक्ष्म दुनियाँ के बारे में जानते हैं, आखिर क्या होता है मृत्यु के उस पार!

अर्नाल्ड बेनेट ने एक जगह लिखा है कि, ‛सांसारिक सुख जिसे कहते हैं उसका न मिलना ज्यादा श्रेयस्कर है मृत्यु के समय आत्मा की यह धिक्कार सुनने से कि तुममें हिम्मत की कमी थी, तुम ठीक उस समय भाग खड़े हुए जब तुम्हें सर्वाधिक हिम्मत दिखानी थी ।’

डॉ रामधारी सिंह 'दिनकर' “ हिम्मत और ज़िन्दगी” में लिखते हैं कि, ‛ज़िन्दगी के असली मज़े उनके लिए नही हैं जो फूलों की छाँव में सोते हैं. बल्कि फूलों की छाँव के नीचे अगर जीवन का कोई स्वाद छिपा है तो वह भी उन्ही के लिए है जो दूर रेगिस्तान से आ रहे हैं जिनका कंठ सूखा हुआ, होंठ फटे हुए और सारा बदन पसीने से तर है. पानी में जो अमृत वाला तत्व है, उसे वह जानता है जो धूप में खूब सूख चूका है, वह नही जो रेगिस्तान में कभी पड़ा ही नहीं है ।’



याद रखिये, जीवन में आभ्यन्तरिक और समष्टि-कल्याण के विषय में ‛साधन’ से ज्यादा मूल्यवान ‛साध्य’ होता है ।
जैसे हम बिस्तर कीमती से कीमती क्रय कर सकते हैं किंतु नींद हम पैसे से नहीं खरीद सकते ।
 निद्रा का मूल्य कागजों के नोट हो ही नहीं सकते क्योंकि मुद्रा मानवीय कृति है नैसर्गिक नहीं । फिर इसका मूल्य नैसर्गिक ही होना चाहिए ।

एक व्यक्ति के लिए अधिक मूल्यवान बिस्तर नहीं है, बल्कि, मूल्यवान है नींद । सुन्दर पकवान मूल्यवान नहीं है, मूल्य है स्वास्थ्य का ।
मूल्य संचय का नहीं, त्याग का है ।
त्याग की अवधारणा काल्पनिक नहीं है, यदि आप में त्याग का गुण है तो आप प्राप्ति को उत्कर्ष से भोग सकते हैं ।

जीवन किसी लक्ष्य का नाम नहीं है वरन यह तो उम्रभर चलने में है ।
जीवन है ही चलने का नाम । 
इस दृश्य जगत में हर किसी का अपना पथ है, केवल इतना होता है कि कभी कुछ व्यक्तियों की राहें कुछ समय के लिए एक हो जाती हैं । यह समय कितना भी हो सकता है, किंतु, रास्तों का अलग होना तय है ।

जो बात हमारे स्मृतियों में भी कही गई है वही कौटिल्य ने अपने ग्रंथ अर्थशास्त्र में कहा है-

“ आयु कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च
  पंचैतानि ही सृजयन्ते गर्भस्थैव देहिनः ।”

तात्पर्य यह है कि, आयु,कर्म,धन,विद्या और निधन ये पाँच चीजें व्यक्ति की नैसर्गिक रूप से निश्चित हो जाती हैं ।

फिर भी व्यक्ति यदि अवधि के पूर्व ही प्राणान्त करता है समस्या तब और भी विकराल रूप धारण करती है,
सनद रहे प्राणान्त और मृत्यु एक नहीं है ।
आइए इसे हम एक सरल उदाहरण से समझते हैं,
जैसे कोई दवा है, जिसकी एक्सपायरी डेट मान लिया 2022 है, अब यदि यह दवा डिब्बे से गिर जाए तो यह निरर्थक हो जाएगी!, किन्तु एक्सपायर नहीं ।
यही बात प्राणियों के संदर्भ में भी है । और मानव के अतिरिक्त कोई भी प्राणी आत्महत्या नहीं करता क्योंकि यह नैसर्गिक क्रिया है ही नही ।
केवल मानव है, जो नियति के विधानों को अपने सीमित क्षेत्र में विपर्यस्त करता है और उसका परिणाम भोगते हैं समस्त जीव । यह आत्ममूल्यांकन का प्रश्न है मानव समाज के लिए कि क्या यह न्यायोचित है?


अमूमन आत्मा का शरीर से पृथक होना ही मृत्यु कहलाती है । यानी जब आत्मा का शरीर से जुड़ाव खत्म हो जाता है तो मृत्यु घटित होती है, किन्तु विचारणीय बात ये है कि क्या हम सिर्फ आत्मा और शरीर से बने हैं ? तो नहीं एक और घटक है जो इन दोनों की लगभग मध्यस्थता करता है वो है ‛मन' ।

यूँ तो मन अचेतन है यह बात साँख्य आदि भारतीय दर्शनों में भी कही गई है , तब प्रश्न ये उठता है कि फिर मन में चेतना आती कहाँ से है ?
इसका उत्तर साँख्य ही देता है, " मन (बुद्धि) पुरुष (चैतन्य) को स्वच्छ दर्पण की भांति प्रतिबिंबित कर लेता है प्रत्युत वह भी चैतन्य की भांति व्यवहार करने लगता है ।" 

मूलतः हम तीन प्रमुख अवयवों से मिलकर बने हैं जिनमें प्रथम अवयव ‛आत्मा' है, द्वितीय ‛मन' और तृतीय हमारा भौतिक शरीर ।
जिनमें आत्मा और मन परस्पर जुड़े हुए होते हैं जिन्हें एक-दूसरे से पृथक करने के लिए साधना कि आवश्यकता होती है चाहे फिर वह ध्यान हो या योग या फिर कोई और । यह समाधि की आरंभिक अवस्थिति है ।

शरीर मन से जुड़ा होता है इसीलिए बहुधा जब मृत्यु घटित होती है तो आत्मा और मन का संपर्क शरीर से टूट जाता है जिसे हम मृत्यु कहते हैं लेकिन इस प्रकार की मृत्यु में आत्मा और मन जुड़े हुए होते हैं जिससे आत्मा को प्रतिबिंबित करने के कारण मन अब भी चैतन्य बना रहता है जिससे उसकी विषयों को भोगने की इच्छा बलवती होती रहती है किन्तु वह इच्छा बिना इंद्रियों के पूरी नहीं हो सकती यही कारण है कि मन शरीर में प्रवेश करना चाहता है और जिसका मन कमजोर हुआ उसमें आधिपत्य स्थापित कर लेता है यही जगत में प्रेत कहलाता है ।
उसका मकसद किसी को हानि पहुँचाना नहीं होता वरन उसका लक्ष्य इन्द्रिय सुख भोगना है किन्तु इसके परिणामस्वरूप उक्त व्यक्ति को जिसके मन में यह अतृप्त मन प्रवेश करता है उसे होती है ।

इस प्रकार के कष्ट से ही बचने के लिए योगेश्वर श्री कृष्ण ने दिया है ‛निष्काम कर्म’ की अवधारणा ।

इसके बारे में हम अगली कड़ी में चर्चा करेंगे ...।

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