फाफामऊ- दो संस्कृतियों का मिश्रण



तस्वीर: फाफामऊ पुल से माँ गङ्गा और उनसे विदा लेता सूर्य



फाफामऊ, एक मध्यवर्ती कस्बा है । मध्यवर्ती, ग्रामीण और शहरी संस्कृति का । ग्रामीण संस्कृति जहाँ लोग ज्यादा प्राकृतिक रवैये को अपनाते हैं, वहीं, शहरी बनावटी नयनाभिराम जीवन ।

दोनों में ठीक उतना ही अंतर है, जितना वन और उद्यान में है, जितना हिमालय, विंध्याचल या सतपुड़ा के वनों और राष्ट्रपति भवन के उद्यान में है । एक प्राकृतिक दूसरा मानवीय शिल्पता से युक्त ।
दरअसल इसमें समायोजन है, दो जीवन निर्वाह करने के रास्तों का, यह मिलाप बिंदु है इन दोनों जीवननिर्वाह के तरीकों का ।
जैसे संध्या, (समय में) दिन और रात के बीच की स्थिति है, इसमें दिन का उजाला भी है और रात का अँधेरा भी ।

फाफामऊ और प्रयागराज को जोड़ता लॉर्ड कर्जन पुल

फाफामऊ, गँगा पार करने के बाद पहला बाज़ारीय कस्बा है,जहाँ दूर गाँव से भी और शहर से भी लोग आते हैं अपने आवश्यता की वस्तुएँ खरीदने साथ ही साथ ग्रामीण आते हैं अपनी उत्पादित सामग्रियों को समर्पित करने जनकल्याण के लिए । पाल-पोष कर उत्पादित करके समर्पित कर जाते हैं ये कृषक और ले जाते हैं इसके स्थान पर नई जीवन निर्वाह की सामग्रियाँ ।

ठीक ऐसे, जैसे इतसिंग ( ई-तिसङ्ग-की) 674 ईस्वी में जब भारत यात्रा की ओर आते हुए जावा-सुमात्रा से आगे बढ़ते हैं, तो बताते हैं ‛नग्न लोगों के देश’, ‛लो-जेन-कुओ’ के बारे में । वर्तमान ‛अंडमान निकोबार द्वीपसमूह’ जिसे अरबी लोग ‛लंजवालूस’ के नाम से जानते थे ।

मार्कोपोलो उसके बारे में लिखते हैं कि, “ जब, जावा-सुमात्रा को छोड़ कर उत्तर की ओर बढ़ते हैं तो दो द्वीप मिलते हैं, जिनमें से एक ‛नीकूवेरण’ कहलाता है, यहाँ न कोई राजा है और न ही मुखिया । लोग मूर्तिपूजक हैं, यहाँ रक्त-चंदन, सुपाड़ी, लौंग और अन्य गरम मसाले मिलते हैं ।” इसी के बारे में ई-तिसङ्ग-की बताते हैं, कि ये लोग यहाँ नारियल और त्रिणमणि( ambeigris) देकर लोहा ले जाते हैं ।

 ऐसे ही इस कस्बे ‛फाफामऊ’ में खाने-पीने के व्यञ्जन, कीमत स्तर पर तो शहरी हैं किंतु भोज्यपदार्थ शुद्धता से परिपूर्ण ।
और इसी के किनारे बहती हैं पुण्यमयी गङ्गा जो इसे सुदृढ़ता और सौंदर्यता से भर देती हैं ।


--विनय एस तिवारी





 

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