एक उलझन सी मन में

एक उलझन सी मन में हुई आज फिर ,आज फिर मैं पूरी रात सो न सका ,
जिससे बे-इन्तहां है मोहब्बत हुई ,खुद को उसकी अदा में भिगो न सका,
जब भी सोया हूँ रातों की हदबंदी में ,है छलक जाता यादों का एक साज़ फिर

धीरे-धीरे चलो री पवन आज फिर, देखो पतवार भी आज प् न सका..
उसकी मौजूदगी के हर एहसास में प्यार की बांसुरी मैं बजा न सका..
चाँद तू भी बढ़ा रौशनी खुद की तो !
 उसकी वेड़ी में जो फूल गूंथा था मैं ,गिर गया हो कहीं भूल से आज फिर..
आज फिर मैं उसे ढूढ़ने चल पड़ा..आज फिर मैं पूरी रात सो न सका ।

   ✍ विनय इस तिवारी ©

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