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ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग-दर्शन

                        ओम्कारेश्वर मंदिर से लावण्यमयी प्रकृति का सौंदर्य

ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग जाने के बाद मेरे मन में मलाल रहा कि, मैं यहाँ वर्षाकाल या उसके अल्प उपरांत क्यों नहीं आया ?
क्योंकि ग्रीष्म की तपन में जब अतींद्रिय अनुभूति है, तो जब प्रसूता प्रकृति अपने वत्सलता और सौभाग्य  के वसंतावस्था में होती होंगी, तो वो परिदृश्य कितना मुग्धकारी होगा! कितना अतींद्रिय होगा, इसकी अनुभूति मात्र की जा सकती है ।
माँ नर्मदा से श्री ओम्कारेश्वर मंदिर 

और तिस पर या तो सभी तीर्थों के जल, या तीर्थराज के जल से अभिषेक यूँ प्रतीत होता है जैसे प्रभु स्वयंभू के शिखर पर स्थित चंद्रमा की दीप्ति और नवल हो गई हो ! या जैसे प्रकृति-सुता नर्मदा के साथ माँ गँगा का मिलन उन्हें पवित्रता की सीमा के पार ले गया हो ।

ये तो प्रभु की मर्जी थी कि बिना पूर्व-योजना के मैं इंदौर गया और वहाँ से ओम्कारेश्वर महादेव ।
हम कार से वहाँ गए थे । पहुँचने के बाद सबसे पहले स्नान करना था माँ नर्मदा में । हमें तो कोई जानकारी थी नहीं तो हम कहीं भी स्नान कर सकते थे किन्तु, महराज ( मिश्रा के जीजा) पहले भी आ चुके थे सो उन्हें पता था कि ‛नागर घाट' स्नान के दृष्टिकोण से श्रेष्ठ घाट है सो हम नाव के द्वारा उस घाट तक गए, रास्ता पैदल भी रहा होगा किन्तु हमें तो सांझ तक लौटना था सो हम नाव के द्वारा ही गए ।

उस घाट की एक बड़ी विशेषता है कि स्नान के लिए नर्मदा के ठीक किनारे घाट से लगी एक दीवाल उठा दी गई और उस पर तीन-चार पाइप लगे हैं जिनसे उस स्नान घाट पर पानी आता है और दूसरे छोर से पाइप से ही निकल जाता है । यह एक प्रकार से सुरक्षित घाट है ।
स्नानोपरांत इस घाट से स्वयंभू के दर्शन को हम नाव से निकल पड़े जो नर्मदा माँ के दूसरे छोर में है । यद्यपि जाने का रास्ता प्रशासन ने पुल के द्वारा भी बनवाया है किंतु स्नान के उपरांत पर्वत पर ऊपर चढ़ना ग्रीष्म ऋतु में तो कठिन है ।

                                   मंदिर की दीवालों पर शिल्प

अहा! मंदिर की शिल्पकला ही मन मोह लेती है एक पहाड़ पर इतनी कुशलता से बना ये मंदिर कई हज़ार साल पुराना हो सकता है ।
इस मंदिर का भी गर्भगृह छोटा ही बना है जैसा बहुधा ज्योतिर्लिंगों में होता है ।
मंदिर ऊपर तल में है तथा नीचे तल में शिव-पूजा यानी महामृत्युंजय पाठ, भगवान शिव का अभिषेक होता है ।

हमने प्रभु का तीर्थराज प्रयाग के जल से अभिषेक किया, मैं मांगना कुछ भी नहीं चाहता था किंतु फिर भी अनायास समाधि की लालसा उठ गई। प्रभु के प्रांगण में पहुँचने मात्र से रोम-रोम रोमांचित हो उठते हैं ।
विदा के पल मन में एक लालसा फिर उभर आती है कि प्रभु फिर बुलाना मुझे ।

- विनय एस तिवारी

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