मानव ने जितना विकास भौतिक विज्ञान का किया है उतना वैचारिक विज्ञान का नहीं ।
सोलहवीं सदी के बाद भौतिक विज्ञान ने अभूतपूर्व प्रगति की । प्रत्युत जो भी मानवीय साम्य वैदिक युग या उसके समकक्ष की संस्कृतियों में था और निरंतर चला आ रहा था, वह बौना रह गया । क्योंकि हमने साधन का तो उत्कट विकास किया किन्तु साधन को साधने वाले के मानसिक या वैचारिक विज्ञान पर रंच मात्र भी दृष्टि नहीं डाला, परिणामतः हम भौतिक साधनों और उससे प्राप्य सुखों के हाँथों नाचने वाली कठपुतली बनते दृष्टिगोचर हो रहे हैं ।
किसी भी मानवीय क्रिया का बीज विचार में ही छुपा होता है । और जब भी वैचारिक विज्ञान को गौण बना कर मात्र भौतिक विज्ञान पर विमर्श किया जाए और उसे पोषित किया जाए तो अवश्य ही यह यात्रा मानव के यंत्र होने की प्रक्रिया का आरंभ है ।
यही उत्तरदायी है हमारी मानसिक रुग्णता पर ।
समाज में जिस कदर अनैतिक क्रियाकलापों की उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है, दिनों-दिन छोटी-छोटी बातों पर आत्महत्या में वृद्धि, बलात्कार जैसी कुत्सित क्रियाएँ हो रही हैं, इन सब घटनाओं के गर्भ में कहीं न कहीं यह प्रश्न आकर ठहर जाता है कि, आखिर श्रेष्ठ सभ्यता के नाम पर क्या उपलब्धि हासिल की हमने ?
हमारे मानवीय लक्ष्य क्या हैं ? और उसके लिए क्या कदम उठाए गए ?
वस्तुतः ये घटनाएँ हमारी सामाजिक उन्नति पर ही प्रश्न चिन्ह लगा रही हैं तथा उन्नति के मापदंडों के पुनरावलोकन के लिए आगाह कर रही हैं कि क्या वास्तव में हमने प्रगति की है ?
क्या हमने सभ्यता का विकास किया है ?
मैं तो स्वयं को निरुत्तर पाता हूँ, जब मैं दर्शनशास्त्र जैसे विषय, जिसे सुकरात और अरस्तु कहते हैं कि यह सभी विषयों का विषय है का अध्ययन करता हूँ तो उसमें हमारे दार्शनिक इसे भौतिकी और गणित बनाने पर तुले हैं !!
वैचारिक ज्ञान को भौतिक विज्ञान बनाने में संघर्षरत हैं ।
वो नही जानते कि वो समष्टि को व्यष्टि बनाने की कोशिश में हैं ।
कहा जाता है कि इसे गणित जैसा निश्चित और शुद्ध शास्त्र बनाना है !
जिस शास्त्र की गणित खुद उपज रही हो वो अब गणित बनेगा ?
और वो गणित जो स्वयं के प्रश्नों पर निरुत्तर हो जाता है ? वह गणित जो स्वयं अनिश्चितताओं का भंडार है !
कैसे, मैं आपको बताता हूँ । √-25 ( करणीगत ऋणात्मक पच्चीस) का मान निकालने में गणित अनिश्चित हो जाता है । सौ में तीन का भाग देने पर निश्चितताओं से भरा गणित अनिश्चित हो जाता है, ऐसे अनेकेन उदाहरण भरे पड़े हैं ।
पुनश्च, यदि वैचारिक विज्ञान को पुष्ट न किया गया तो निश्चित ही हम पूर्णरूपेण मानसिक रुग्णता से ग्रस्त हो जाएंगे । हम अपनी जीवंतता को खो देंगे । और पूर्णरूपेण वशीभूत हो जायेंगे भौतिक सुख देने वाली मशीनों के ।।
इति ।
विनय एस तिवारी
सोलहवीं सदी के बाद भौतिक विज्ञान ने अभूतपूर्व प्रगति की । प्रत्युत जो भी मानवीय साम्य वैदिक युग या उसके समकक्ष की संस्कृतियों में था और निरंतर चला आ रहा था, वह बौना रह गया । क्योंकि हमने साधन का तो उत्कट विकास किया किन्तु साधन को साधने वाले के मानसिक या वैचारिक विज्ञान पर रंच मात्र भी दृष्टि नहीं डाला, परिणामतः हम भौतिक साधनों और उससे प्राप्य सुखों के हाँथों नाचने वाली कठपुतली बनते दृष्टिगोचर हो रहे हैं ।
किसी भी मानवीय क्रिया का बीज विचार में ही छुपा होता है । और जब भी वैचारिक विज्ञान को गौण बना कर मात्र भौतिक विज्ञान पर विमर्श किया जाए और उसे पोषित किया जाए तो अवश्य ही यह यात्रा मानव के यंत्र होने की प्रक्रिया का आरंभ है ।
यही उत्तरदायी है हमारी मानसिक रुग्णता पर ।
समाज में जिस कदर अनैतिक क्रियाकलापों की उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है, दिनों-दिन छोटी-छोटी बातों पर आत्महत्या में वृद्धि, बलात्कार जैसी कुत्सित क्रियाएँ हो रही हैं, इन सब घटनाओं के गर्भ में कहीं न कहीं यह प्रश्न आकर ठहर जाता है कि, आखिर श्रेष्ठ सभ्यता के नाम पर क्या उपलब्धि हासिल की हमने ?
हमारे मानवीय लक्ष्य क्या हैं ? और उसके लिए क्या कदम उठाए गए ?
वस्तुतः ये घटनाएँ हमारी सामाजिक उन्नति पर ही प्रश्न चिन्ह लगा रही हैं तथा उन्नति के मापदंडों के पुनरावलोकन के लिए आगाह कर रही हैं कि क्या वास्तव में हमने प्रगति की है ?
क्या हमने सभ्यता का विकास किया है ?
मैं तो स्वयं को निरुत्तर पाता हूँ, जब मैं दर्शनशास्त्र जैसे विषय, जिसे सुकरात और अरस्तु कहते हैं कि यह सभी विषयों का विषय है का अध्ययन करता हूँ तो उसमें हमारे दार्शनिक इसे भौतिकी और गणित बनाने पर तुले हैं !!
वैचारिक ज्ञान को भौतिक विज्ञान बनाने में संघर्षरत हैं ।
वो नही जानते कि वो समष्टि को व्यष्टि बनाने की कोशिश में हैं ।
कहा जाता है कि इसे गणित जैसा निश्चित और शुद्ध शास्त्र बनाना है !
जिस शास्त्र की गणित खुद उपज रही हो वो अब गणित बनेगा ?
और वो गणित जो स्वयं के प्रश्नों पर निरुत्तर हो जाता है ? वह गणित जो स्वयं अनिश्चितताओं का भंडार है !
कैसे, मैं आपको बताता हूँ । √-25 ( करणीगत ऋणात्मक पच्चीस) का मान निकालने में गणित अनिश्चित हो जाता है । सौ में तीन का भाग देने पर निश्चितताओं से भरा गणित अनिश्चित हो जाता है, ऐसे अनेकेन उदाहरण भरे पड़े हैं ।
पुनश्च, यदि वैचारिक विज्ञान को पुष्ट न किया गया तो निश्चित ही हम पूर्णरूपेण मानसिक रुग्णता से ग्रस्त हो जाएंगे । हम अपनी जीवंतता को खो देंगे । और पूर्णरूपेण वशीभूत हो जायेंगे भौतिक सुख देने वाली मशीनों के ।।
इति ।
विनय एस तिवारी
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