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चाँदनी रात हो एक नदी पास हो । chandni rat ho ek nadi pas ho

चाँदनी रात हो, एक नदी पास हो ,
और तुम साथ में हो तो क्या बात हो !
आसमाँ चाँदनी, वो नदी चाँदनी,
और तुम चाँदनी हो तो क्या बात हो !

चाँदनी का गमन, बालों से लौट कर,
देह से ज्यों लगे चाँदनी लौट कर,
तुम लगो चंद्रमा सी तो क्या बात हो !
बालियों से प्रकीर्णित हुई चाँदनी,
तुम्हारी शोखी तुम्हारा हर एक कृत्य भी,
शशि-कला जो दिखाए तो क्या बात हो !
चाँदनी रात हो, एक नदी पास हो ,
और तुम साथ में हो तो क्या बात हो !

पूर्णिमा की अनघ चाँदनी सा बदन,
ज्यों किताबों में बनता है शब्दों से तन,
तुम्हारी पायल का रुन-झुन सा स्वर सुरमयी,
शोर हो बारिशों का यथा मधुमयी,
चाँदनी रात में गाँव से दौड़ कर,
फिर नदी पर तुम आओ तो क्या बात हो !
चाँदनी रात हो, एक नदी पास हो ,
और तुम साथ में हो तो क्या बात हो !
-- विनय एस तिवारी

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