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इफ ट्रुथ बी टोल्ड

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परमहंस योगानन्द कृत 'योगी कथामृत' और आंशिक रूप से रॉबिन शर्मा की ' द मॉन्क सोल्ड हिज फेरारी ' ( सन्यासी जिसने अपनी संपत्ति बेंच दी ) के बाद अगर कोई पुस्तक मुझे पराभौतिक रस का रसास्वादन कराई है तो वह है ओम स्वामी कृत " इफ ट्रुथ बी टोल्ड " ( यदि सत्य कहूँ तो..) । इत्तेफाकन एक ही पुस्तक बची थी यह उस दुकान में, मानो मेरे लिए ही रखी थी ।       यह एक गृहस्थ व्यक्ति के सन्यस्त होने की कहानी है, मूलतः यह संस्मरण है जिसका आरम्भ वाराणसी में किसी शांतिप्रिय घाट खोजने से होता है जहाँ एकांत मिल सके , जो लेखक को नहीं मिलते । कदाचित ओम स्वामी प्रयाग आए होते तो उन्हें मन पसंद घाट मिलता "राम घाट" मेरा स्वयं प्रिय घाट है जहाँ बड़ी आसानी से ध्यान लगाया जा सकता है , माँ गंगा को महसूस किया जा सकता है अपने अंदर ।                    निश्चित ही मनुष्य के विचित्र प्रजाति है क्योंकि हमें जो भी प्राप्त होता है हम उससे भिन्न प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं । इस संस्मरण का एक गद्यांश मुझे जँचा जब वो तैलंग स्वामी के मठ जाते हैं तो वहाँ उनके शिष...

याज्ञक (भाग-2)

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..गुरुदेव तब से याज्ञक के मन को पढ़ रहे थे जब से वह ध्यान में बैठा था । उसकी अनुभूति भारद्वाज मुनि ने भी महसूस की थी इसीलिए याज्ञक के संभावित प्रश्नों के उत्तर की खोज में ध्यानमग्न हो गए । हे गुरुदेव ! मैंने आपके कहे अनुसार गंगा की चंचलता , पवित्रता और आवृत्ति को महसूस किया है, मुझे दिखाई दिया है ' जंगलों के बीच एक गाँव कुछ मृद्भाण्ड और एक लड़की की आवाज़ । " क्या मेरी नियति ने मुझे यही उपलब्धि लिखी है..? क्या मेरी मंजिल यही है..?" -- यह कहकर याज्ञक विस्मयकारी नेत्रों से गुरुदेव की ओर देखा । तब ऋषिश्रेष्ठ ने आंखें खोलते हुए कहा. " मूल्य मंज़िल का या मिलने वाली उपलब्धि का नहीं होता वत्स, मूल्य रास्तों का है..मूल्य यात्राओं का है.., यात्राओं से मिलने वाले अनुभव का है, उपलब्धि तो प्रतीक मात्र है उन यात्राओं से पार होने का ।" ".. तो क्या मुझे भी यात्रा करनी चाहिए ?" - गुरुदेव के संकेत को समझते हुए याज्ञक ने पूँछा । " निःसंदेह ! तुम देवप्रयाग जाओ वहाँ मेरे गुरुभाई देवयादृ के आश्रम में जाना , वही तुम्हारी नियति बताएँगे । " पंद्रह दिन बाद यात्...

प्रेम का सौदागर

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 किसी दार्शनिक ने कहा है कि, "दो भाई एक ही पिण्ड के तत्वों से बने होते हैं ,यही कारण है कि वो एकदूसरे की मनःस्थिति को  एक नज़र में ही समझ लेते हैं ।" मैं मानता हूँ कि अगर टेलीपैथी का अस्तित्व है तो उसका इससे बेहतरीन Example कुछ और नहीं हो सकता ।     ये जुलाई के फर्स्ट वीक की बात है मैं फर्स्ट स्टैंडर्ड पास करके सेकण्ड में जाने वाला था, मेरे भइया जो उस वक्त 9th स्टैंडर्ड में थे उन्होंने मेरे लिए होस्टल देख रखा था । उनके हॉस्टल से मेरे होस्टल की दूरी लगभग डेढ़ घंटे की थी । उन्होंने बताया । मुझे अब गांव छोड़ कर शहर जाना था and it was 10 AM when we had to got bus for city.                            मैं मम्मी को छोड़ कर जा रहा था उस समय मेरे मन में दो बातें एक साथ थीं पहली की मैं रोना चाह रहा था और दूसरी होस्टल की अंजानियत का भय । Because whenever I thought about hostel my mind white washed, because I didn't know anything about Hostel. And also it was the moment when I realized why Brides are w...

उफ़्फ़ ! बड़ी वाचाल होती हैं किताबें

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जमानेभर के किस्सों का गवाह अगर कोई है, तो वो हैं  किताबें । अगर पढ़ने का सिलसिला शुरू कर दिया जाए तो इनकी बातें ख़तम ही नहीं होती.. एक कारवाँ सा चल पड़ता है किस्सों का, कहानियों का । किताबें आपके किसी प्रश्न का उत्तर नहीं देतीं वरन् आपको उस कहानी में साक्षी की भाँति प्रस्तुत कर देंगी फिर ये निर्णय आप पर छोड़ देती हैं कि आप अनुभव क्या करते हैं..! और उस अनुभव से क्या सीखते हैं यह आप पर निर्भर है..। किताबें ही हैं जो आपको समय के पार पहुँचा देती हैं.. इससे दिलचस्प बात क्या होगी कि कहानी, किताब किसी भी  समय की सुनाए, आपको उस काल, परिस्थिति में ज्यों का त्यों उतार देती है..। किताबें एक जगह बैठे बैठे कितने ही दिलचस्प स्थानों में पहुँचा देती हैं, और हम महसूस करते हैं कि हम उस स्थान में बैठ कर उस अमर कहानी का हिस्सा हैं । हाँ.. अमर कहानी ! क्योंकि जिस कहानी को किताबों ने आत्मसात कर लिया, फिर अमर हो जाती है वो कहानी । किताबें बारिश की पहली बूँदों के उस अभिनवपन को घर बैठे  महसूस करा देती हैं.. जिसे आप कभी न कभी महसूस कर चुके होते हैं । उन्मुक्त आकाश में चाँद की सहचरी चाँदनी ...

याज्ञक (भाग-1)

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हज़ारों साल पुरानी गंगा अपनी पवित्रता और शून्यता समाए हुए उस दिन भी बह रही थीं..। समय ईसा के पाँच सौ साल पहले का है.. प्रयाग की पुण्य भूमि और माँ गंगा के तट पर शिष्य 'याज्ञक' अपने गुरु की दीक्षा के अनुसार गंगा की लहरों को महसूस करने की कोशिश कर रहा था.., बार-बार उसे उसके गुरु ऋषि श्रेष्ठ भारद्वाज के शब्द याद आ रहे थे कि " इतने शून्य हो जाओ कि स्वयं के अस्तित्व को महसूस कर सको, शून्य में होना ही विराट में होना है , जब तुम्हारी आवृत्ति गंगा की आवृत्ति से मेल करेगी तब तुम स्वयं में महसूस कर सकोगे गंगा को.., और तुम्हारी आत्मा पवित्र हो सकेगी.., और यहीं से शुरू होगा तुम्हारी नियति तक पहुँचने का मार्ग ।          शिष्य बैठा रहा ध्यानमग्न होकर सुबह के बैठे सांझ हो गई, सूर्य अस्ताचल की सीमा तक पहुंच गया और हवाएँ एक लय से बहने लगी थी । गुरुदेव ठीक कहा करते थे कि "जब तुम प्राकृतिक होने लगते हो तो समूची प्रकृति तुम्हारे साथ हो जाती है..।" वह अब पूरी तरह शांत हो चुका था, गंगा के कलरव को स्वयं में महसूस करने लगा था । जैसे वह भी आंदोलित हो उठा था वह एक स्वर्गीय आनंद में ...

एक रात में, जब मैं भी था.. और तुम भी थी

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उस दिन अपने घर के सामने वाले पार्क में देर रात तक बैठे थे हम-दोनों । कदाचित पता होता ये हमारी आखिरी मुलाकात है..! जब देर रात घरों की रोशनी बुझ चुकी थी तब चाँदनी पूरे शहर के साथ अपने पार्क में भी दस्तक दे चुकी थी और मन के कहीं आखिरी छोर में दबा विषाद उभर आया था । चाँदी सी फैली ये चाँदनी तारों के अस्तित्व को ओझल न कर सकी थी.. । उस दिन सितारों की ओर देखते हुए तुमने कहा था, ' ये वही आसमान है जो कई अरब साल से है लेकिन इसकी ज़द में आने वाले कितने सितारे टूट चुके थे और न जाने कितने सितारे उन सितारों की जगह ले चुके थे । लेकिन इनमें होने वाली बदलाहट हम नहीं देख सकते न..?' इस गतिशील और नश्वर संसार में कदाचित हम जिस परमाणु से बने हैं वो उन टूटे सितारों का हिस्सा हो ! ' हाँ..। मैने गहरी सांस लेते हुए कहा । और क्या पता, हम दोनों का अस्तित्व एक ही पदार्थ से हुआ हो ! तभी तो हम एक दूसरे के करीब हैं..एक दूसरे के अंतर्भाव को समझ पा रहे हैं । तुम्हें पता है...? बहुधा हम जो देखते हैं उसे ही सच मानते हैं , लेकिन जरूरी नहीं कि हम जो देख रहे हैं वही सच हो । जैसे ऊपर सितारो...

उस दिन की तरह

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हर  साल की तरह आज भी ऑफिस क्रिसमस पर बन्द थी सो आज आठ बजे सो के उठा जितनी गहरी नींद सुबह के तीन घंटे लगती है अच्छा थका होने पर भी उतनी अच्छी नींद नहीं लगती... अगर खिड़की से सूरज कमरे में दाखिल न होता तो शायद दस या ग्यारह बज गए होते.... खैर..!अब फ्रेश हो कर चाय बनाने जा रहा हूँ...खाना बनाने के लिए तो मैंने बाई लगाई है.. लेकिन चाय मैं सिर्फ अपने हाँथ की बनाई पीता हूँ या फिर मम्मी की...। हाँ..एक समय था जब एक और हाँथ की बनाई चाय मैं पीता था..। धीरे धीरे चाय खौल कर लाल हो रही थी.. कि अचानक डोर वेल बजने लगी.... कम्बख्त कौन आ टपका...! मैं बुदबुदाते हुए दरवाजे की और लपका । सर व्योमेश चंद्र आप ही हैं..? हाँ...' आपका लेटर आया है यहाँ साइन कर दीजिए.. .......तो कॉलेज में एल्युमिनी मीट है...इसी तीस तारीख को..? मैं व्हाट्सएप् के कॉलेज फ्रेंड्स ग्रुप में देखने लगा की कौन कौन आ रहे हैं.. 😶😶 ओ तेरी....!! चाय तो पूरी छनक गई होगी.. कहते कहते मैं दौड़ा... बैठे बैठे मैं एक एक चेहरे को याद कर रहा था.. पुनीत जो खुद से लंबी गर्लफ्रेंड बनाया था... ए से शुरू होने वाले नाम गिन रहा 'अ...