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ग्रीष्म ऋतु की रात्रि का आकाश

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                 ग्रीष्म ऋतु की रात्रि का दृश्य ग्रीष्म ऋतु शब्द आते ही उमड़ पड़ती है एक हवा यादों की । ऐसे लगता है जैसे एक-एक याद हवा बनकर किसी झील के पानी को छूते हुए मुझ तक आ रही है क्योंकि मैं महसूस कर रहा हूँ यादों में ठंडक । मुझे सबसे पहले याद आती हैं छुटपन में ग्रीष्म की छुट्टियों में शहर से घर आगमन, फिर ग्रीष्म में ही कहीं 'टूर' पर  दोस्तों संग बिताई गई रातें और श्रृंखला बन पड़ती है यादों की । तो मैं कहने जा रहा था कि ग्रीष्म ऋतु की रात्रि का आकाश इतना आकर्षक होता है कि लगभग हर कोई आकर्षित होता ही है भले ही कौतूहलवश या फिर सौंदर्यवश । ग्रीष्म की रात्रि का आकाश अक्सर साफ होता है यदा कदा कुछ छुट-पुट बादल मिल जाते हैं किन्तु बहुधा साफ ही होता है तिस पर चाँदनी रात का चाँद और उसके बेहद करीब रहने वाला सितारा  उस पर चार चाँद लगा देते हैं । सितारा चाँद से इतना दूर होता है जितना किसी छोटे लड़के का सौंदर्य और उसके डिठौने की दूरी, इतना कि किताब के शब्द और पाठक के आनंद के बीच की दूरी, इतना कि किसी प्रेमिका के सौंदर्य और उसके दाएँ ग...

कहा न मुझे नहीं रास आतीं दीवारें

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कहा न ! मुझे नहीं रास आतीं नक्काशी से सुसज्जित दीवारें । मुझे तो रास आती हैं प्रकृति की लावण्यमयी सौंदर्यता । मुझे रास आते हैं ऐसे शहर जो प्रकृति की गोद में समाए होते हैं जैसे सतपुड़ा की गोद में ' पचमढ़ी ' , जैसे पहाड़ों से घिरा सीधी ,और जैसे मेरा गाँव । जैसे अमरकंटक, जहाँ चौबीसों घंटे नर्मदा की कल-कल का सप्तसुरी संगीत तारतम्यता से बजता हुआ आपके कर्णपटलों में पहुँचता है और आप अनायास एक स्वर्गीय संगीत में सुधि खोकर खो जाते हैं । जहाँ पहुँचते ही कल्पनाओं से जेहन में उतरकर सच लगने लगती है नर्मदा और सोन की कहानी । जहाँ प्रेम यथार्थ में परिणित होकर दिला जाता है राधा कृष्ण के प्रेम की मधुर याद । जहाँ जनश्रुतियाँ साँस लेती दंतकथाओं के यथार्थ से ऐसे रूबरू होती हैं जैसे हमने भी तो देखा हो इन्हें हूबहू इन्ही कहानियों की तरह । वस्तुतः हम समा जाते हैं इन जनश्रुतियों के किरदारों में या ये कहूँ की हम किरदारों में जीने लगते हैं । दीवारें तो बस गवाह होती हैं किसी कहानी की किन्तु ऐसी जगहों में आप किरदारों को स्वयं में जीवित पाते हैं । आप स्वयं के करीब होते हैं , सौंदर्य के नित नए प्रतिमा...

समुद्र तट और पहाड़ में प्रिय

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मुझे समुद्र तट में बैठना ज्यादा सुकूनभरा होगा पर्वत के अपेक्षाकृत । मैं ज्यादा समय वहाँ बिता सकूँगा पर्वत की तुलना में । इसके कई कारण हैं, किंतु, सबसे बड़ा कारण ये है कि समुद्र तट में एक तरह का स्वाभाविक खुलापन होता है जो पर्वत में नहीं, पर्वत लैंड लॉक्ड सरीखे होता है । इसलिए आप समुद्र में ज्यादा तरोताज़ा महसूस करेंगें । और पर्वत में सबसे कमी ये है कि ये आपको जमीन से दूर कर देता है जिससे जमीन पर आने की प्रवृत्ति बलवती होती जाती है । समुद्रतटीय शहर जैसे लंदन, जैसे न्यूयॉर्क, जैसे इंदिरा पॉइन्ट ( अंडमान निकोबार द्वीपसमूह ) अधिक आनंदप्रद होते हैं । वहाँ बयार खुलेपन से आकर आपको स्पर्श करेगी जबकि पहाड़ों में हवा बँधी बँधी सी लगती है । पहाड़ी हवाओं में किसी दूसरे देश से संदेश लाने का अनुभव भी नहीं है । जैसे किसी दूर देश से सदियों पहले समुद्री व्यापारियों का प्रेम संदेशा आया करता था , कभी हवाओं से तो कभी समुद्र से आने वाले समुद्री जहाजों से । पहाड़ में उतार है चढ़ाव है, जबकि समुद्र तट दोनों ओर समतल । इसीलिए मन ज्यादा देर पहाड़ में नहीं रह सकता । पहाड़ अल्पकालिक सुकूनी जगह है जबकि सम...

शताब्दियों का साक्षी 'बरदहाघाट '

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                            (बरदहा घाट ) शताब्दियों का साक्षी 'बरदहा घाट' __________________________________ यथा मुम्बई से पुणे को जोड़ता है 'भोर घाट' , केरल से तमिलनाडु को जोड़ता है 'पाल घाट' । जैसे स्लोवाकिया को पोलैंड से जोड़ता है ' टाट्रा पर्वत श्रृंखला ' ठीक वैसे ही डभौरा को रीवा से जोड़ता है 'बरदहा घाट' । डभौरा, मध्यप्रदेश के उत्तर पूर्वी सीमांत की ओर से तथा रीवा जिले का पहला रेलवे स्टेशन है । पहला दोनों आयामों में । यानी एक तो रीवा राज्य ( वर्तमान रीवा जिले ) का सबसे पहला स्टेशन , दूसरा मध्यप्रदेश के उत्तर पश्चिमी सीमा का पहला स्टेशन ( सीमा में ) । जो इलाहाबाद ( प्रयाग ) से मुम्बई रुट की सभी चिघाड़ती रेलगाड़ियों का बाहें फैलाए स्वागत करता है मध्यप्रदेश में ।जो आगे बढ़ते हुए प्रदेश पार पहुंचती है महाराष्ट्र । इसी डभौरा से बस चलना शुरू करती है तो बरहुला,अतरैला होते हुए लगभग आधी दूरी तय करते ही सीना तान कर बाहें फैलाए दिखाई देता है 'बरदहा घाट'  । बरदहा घाट रीवा-पन्ना के पठार का पूर्वी छोर है...

With the some of precious person of my life

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"When we all get togather it feels like blend of tea and I reached the place of book where ocean meet to sky." I think we all r the character of a book which is just writing now by the writer. I think someone is just right the story of our and we play role. Role has decided by writer as like Maharshi Valmiki written Ramayana before the birth of Lord Ram and other. Just see we all are from many states, many district but we met !! It's not coincidence it's definitely define by the writer. You all know ? I think we just move togather in one way but the stope will be come and we all move on own's way. That time I miss you all. But we have a time for get together till then let's enjoy every moment. Your's Vinay S Tiwari

तुम्हारे लिए उस रेस्तरां में चाय, जब तुम नहीं थे ।

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मैंने एकबारगी तुम्हारे बगैर भी चाय पिया था उस रेस्तरां में । तुम्हारे लिए ही , ये जानने कि, जब तुम्हें लाऊँगा तो इसकी चाय तुम्हें पसंद आएगी न !! किसी ने कहा था, कि तुम चाय सबसे लज़ीज़ बनाती हो । तुम्हें बड़ा शौक है चाय पीने का । और ये भी कि तुम अपनी बनाई चाय सिर्फ उन्हें पिलाती हो जिनसे मोहब्बत होती है तुम्हें । इसी फेहरिस्त में शामिल होने के लिए मैं सोचता था कि मैं तुम्हें चाय पे इनवाइट करूँ और जब तुम रेस्तरां की चाय पियो तो कह दो, कि मैं चाय पिलाऊँगी तुम्हें अपने हांथों से बना कर तब कहना चाय कैसी होती है ? और इस तरह शायद मैं उस फेहरिस्त में शामिल हो जाऊँ जिनसे तुम्हें प्यार है । फिर मैंने कॉफी भी पी लिया था इस अंदेशा से कि कहीं तुम चाय के एवज में कॉफी पीना चाहो तो !! मैंने कॉफी भी पिया । फिर कॉफी नहीं पसंद आई तो मैं गया इंडियन कॉफी हाउस की शायद , तुम्हारे इच्छित स्वाद के तकरीबन तो रहे इन कॉफियों का स्वाद । फिर मैं हो आया था थिएटर ! और घूम कर सारी सीटें परख ली थी कि कौन सी सीट तुम्हें सबसे ज्यादा आरामदेह लगेगी । लेकिन इत्तेफ़ाक़ तो देखो तुम मिली भी मुझे तो बस में । वो भी ऐ...

बात उनदिनों की जब मैं दसवीं में था

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नवीं के ठीक बाद, ..जुलाई से हमारी कक्षाएँ आरम्भ हो चुकी थीं । हमारा सेक्शन सी ही था और सबसे दिलचस्प बात ये थी कि हमारे क्लास टीचर श्री आई.एस. डी. सर थे । क्लास की दिनचर्या वही थी कि प्रार्थना के बाद क्लास में अटेंडेंस ली जाती थी, फिर क्लासेस शुरू । जैसा पहले ही बता चुका हूँ कि हम पूरी पीरियड नहीं अटेंड करते थे । ये परंपरा हमने नहीं बल्कि हमारे सीनियर्स ने आरम्भ की थी । हमें ये लगता था कि श्री आई एस डी सर को मेरा नाम तो न ही पता होगा क्योंकि न तो हम इंग्लिश के टॉपर थे और न ही इतने वाचाल किस्म के थे । लेकिन आश्चर्य मुझे उस दिन हुआ जब मैं रफ से खुद को हवा कर रहा था तो सर ने कहा " विनय इतनी गर्मी नहीं लग रही क्लास में !!" मेरे लिए क्लास रुक गई थी क्लास ही क्या पूरी सृष्टि रुक गई थी उस पल...। कितना सुखद आश्चर्य होता है न ,जब आपको आपके पसंदीदा व्यक्ति आपके नाम से पुकारें !! फिर मैं अपनी बेतरतीबी कम करने लगा था । दूसरी पीरियड होती थी विज्ञान की । विज्ञान हमें श्री राजेन्द्र मिश्रा सर पढ़ाते थे । लेकिन पहले ही दिन उन्होंने कहा कि ' मैं जो भी पढ़ाऊंगा वो अगले दिन बो...